UP भाजपा में जारी है संगठन, मंत्रिमंडल विस्तार के लिए आंतरिक घमासान

जुबिली न्यूज ब्यूरो
उत्तर प्रदेश में भाजपा 2024 लोकसभा चुनावों के झटके के बाद लगातार संगठनात्मक पुनर्गठन और मंत्रिमंडल विस्तार की चुनौतियों से जूझ रही है। पार्टी कार्यकर्ताओं में बढ़ता असंतोष और आंतरिक कलह एक ओर जहां चिंता का विषय बन गया है, वहीं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपनी रणनीति के जरिए पार्टी में एकता और अनुशासन बहाल करने की कोशिशें तेज कर रहे हैं। 2027 विधानसभा चुनावों से पहले यह घमासान भाजपा की जमीनी ताकत को प्रभावित कर सकता है।
प्रादेशिक संगठन में देरी के कारण पार्टी की रफ़्तार सुस्त पड़ रही है। ओबीसी चेहरा पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया, लेकिन जिलाध्यक्षों और अन्य महत्वपूर्ण पदों पर जातीय-क्षेत्रीय संतुलन साधने में काफी विलंब हो रहा है। 98 जिलों में से अभी केवल 84 जिलाध्यक्षों की घोषणा हो पाई है। पूरा संगठनात्मक ढांचा 2026-27 के चुनावी कार्यक्रम तक अधर में लटका हुआ है, जिससे बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं में निराशा फैल रही है।
मंत्रिमंडल विस्तार पर भी ठहराव जारी है। योगी आदित्यनाथ की कैबिनेट में फिलहाल 6 पद खाली पड़े हैं। विस्तार की कयासें जनवरी 2026 से ही चल रही थीं, लेकिन फरवरी के बाद भी यह प्रक्रिया अधर में लटकी हुई है। चर्चा है कि पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी को मंत्रिमंडल में जगह मिल सकती है, जबकि कुछ मौजूदा मंत्रियों को संगठन में भेजा जा सकता है। RSS, भाजपा की कोर कमेटी और योगी की दिल्ली में हुई बैठकों में जाति समीकरण खासकर ओबीसी और दलित वर्गों का संतुलन साधने पर विशेष जोर दिया जा रहा है।
योगी आदित्यनाथ समर्थक गुट और केशव प्रसाद मौर्य गुट के बीच टकराहट पुरानी है। 2024 लोकसभा चुनाव में वोट शेयर में आई गिरावट के बाद यह कलह और उजागर हो गई। प्रदेश अध्यक्ष और मुख्यमंत्री के बीच कथित दूरी की चर्चाएं बजट सत्र के बाद और तेज हो गई हैं। संगठन और सरकार के बीच समन्वय की कमी से जमीनी स्तर के कार्यकर्ता नाराज हैं। कई कार्यकर्ता मानते हैं कि मंत्रिमंडल विस्तार में देरी से ओबीसी-दलित समीकरण बिगड़ रहा है, जो भविष्य में पार्टी के वोट बैंक को नुकसान पहुंचा सकता है।
इस आंतरिक घमासान में कई नेता अपनी गोटियां चला रहे हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ क्षेत्रीय समन्वय बैठकों के माध्यम से असंतोष कम करने और 2027 चुनाव पर फोकस करने की कोशिश कर रहे हैं। वे नए चेहरों को तरजीह दे रहे हैं और पुरानी कलह को कम करने पर जोर दे रहे हैं। केंद्रीय नेतृत्व यानी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह RSS के साथ निरंतर मंथन कर ओबीसी-दलित संतुलन साधने का प्रयास कर रहे हैं। केशव प्रसाद मौर्य गुट संगठन पदों पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन योगी की नई टीम में इस गुट को ज्यादा जगह नहीं मिल रही है। वहीं भूपेंद्र चौधरी मंत्रिमंडल में वापसी की दौड़ में हैं और संगठन से सरकार में शिफ्ट होने की संभावना जताई जा रही है।
जनप्रतिनिधि और अधिकारी के बीच टकराव भी बढ़ता जा रहा है। महोबा में कैबिनेट मंत्री स्वतंत्र देव सिंह और विधायक बृजभूषण राजस्व के बीच सड़क पर खुला विवाद सार्वजनिक हो गया। लोनी में विधायक नंद किशोर गुर्जर पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे, जबकि दिनेश खटीक जैसे नेताओं ने इस्तीफा दे दिया। 2024 लोकसभा चुनाव में संगीत सोम और संजीव बालियान के विवाद ने कई सीटों पर असर डाला था। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह जनप्रतिनिधि-अधिकारी टकराव 2027 तक जारी रहा तो पार्टी को काफी नुकसान हो सकता है।
सरकार और संगठन के बीच खींचतान भी साफ दिख रही है। योगी सरकार और नए प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी के बीच समन्वय की कमी से जमीनी कार्यकर्ता नाराज हैं। मंत्रिमंडल विस्तार में देरी ने जातीय असंतुलन को जन्म दिया है, जिससे पार्टी का वोट शेयर प्रभावित हो सकता है। 2022 के 41 प्रतिशत वोट शेयर को बनाए रखना 2027 में चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
2027 विधानसभा चुनाव पर इस आंतरिक कलह का गहरा असर पड़ सकता है। विलंब से कार्यकर्ताओं में असंतोष बढ़ा है, लेकिन योगी आदित्यनाथ की सूझबूझ और केंद्रीय नेतृत्व के हस्तक्षेप से एकता बहाल करने की कोशिशें जारी हैं। पंचायत चुनाव 2026 और विधानसभा चुनाव 2027 से पहले भाजपा संगठन को मजबूत करने की होड़ मची हुई है। यदि कलह बढ़ी तो समाजवादी पार्टी (SP) के PDA फॉर्मूले को फायदा हो सकता है और भाजपा का वोट शेयर घट सकता है।
कुल मिलाकर उत्तर प्रदेश भाजपा में संगठन, मंत्रिमंडल और आंतरिक घमासान एक साथ चल रहे हैं। योगी आदित्यनाथ की मजबूत इच्छाशक्ति और केंद्रीय नेतृत्व की सक्रियता से पार्टी इस चुनौती से उबर सकती है, लेकिन यदि असंतोष और कलह पर काबू नहीं पाया गया तो 2027 के चुनाव में भाजपा को कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।



