बालेन शाह के नए नेपाल में कैसे होंगे भारत से रिश्ते

नेपाल के चुनावो में एक एतिहासिक जीत के बाद बालेन शाह अगले शुक्रवार के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने वाले हैं । नेपाल में इस बड़े राजनितिक परिवर्तन को ले कर भारत की अपनी चिंताएं भी हैं और नए अवसरों की संभावना की तरह निगाहें भी।

बालेन शाह की सरकार का रुख क्या होगा इसका विश्लेषण करना जरुरी है.   

बालेन शाह की जीत को लेकर भारत‑नेपाल संबंधों पर विशेषज्ञ दो खेमों में बटे दिखते हैं—एक इसे बड़ा अवसर मान रहा है, दूसरा इसे अनिश्चितता और नए जोखिमों की शुरुआत समझ रहा है। दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हैं कि यह बदलाव “स्टेटस क्वो” खत्म कर रहा है, इसलिए अगले कुछ साल बहुत संवेदनशील होंगे।

सकारात्मक उम्मीदें क्या हैं?

कई भारतीय और नेपाली विश्लेषक मानते हैं कि कम्युनिस्ट दलों की करारी हार और आरएसपी‑बालेन शाह का उभार चीन की पुरानी रणनीति के लिए झटका है, जिससे भारत के लिए काठमांडू में दोबारा जगह बनाने की खिड़की खुल सकती है। ब्रह्मा चेलानी जैसे रणनीतिक विशेषज्ञों ने लिखा है कि कम्युनिस्ट पार्टियों की “रूट” चीन‑समर्थक स्थायी सरकार की उसकी योजना को चोट पहुँचाती है और भारत यदि समझदारी से खेले तो नई सरकार के साथ प्रभावी साझेदारी कर सकता है।

कई विश्लेषक यह भी याद दिलाते हैं कि “रोटी‑बेटी” के रिश्ते, खुली सीमा, रोज़गार‑शिक्षा के लिए भारत आने वाले नेपाली और साझा संस्कृति जैसी बुनियादी बातें किसी भी सरकार के आने‑जाने से नहीं बदलतीं, इसलिए संरचनात्मक आधार मज़बूत बना रहेगा। साउथ एशिया के कुछ विशेषज्ञों का तर्क है कि चाहे नेपाल में कोई भी सरकार हो, उसे अपनी अर्थव्यवस्था और भू‑राजनीतिक ज़रूरतों के लिए भारत के साथ काम करना ही पड़ेगा।

शंकाएँ और मतभेद कहाँ हैं?

दूसरा खेमा़ खास तौर पर बालेन शाह के अतीत के व्यवहार और बयानों को लेकर सतर्क है—जैसे काठमांडू मेयर रहते हुए “ग्रेटर नेपाल” का विवादित नक्शा लगाना, जिसमें भारत के कुछ हिस्सों को नेपाल का भाग दिखाया गया था, और 2025 की वह फेसबुक पोस्ट जिसमें उन्होंने भारत, चीन और अमेरिका पर बेहद तीखी भाषा में निशाना साधा था। आलोचकों का कहना है कि उनकी “नेपाल फर्स्ट” शैली और सोशल‑मीडिया‑ड्रिवन राजनीति  में एक आवेग  है, जिससे अचानक कदम या बयान दोनों देशों के बीच भावनात्मक और राजनीतिक संकट पैदा कर सकते हैं।

कुछ विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि जहां पहले काठमांडू की राजनीति में यह अनुमान लगाना आसान था कि कांग्रेस, ओली या प्रचंड की सरकार भारत के प्रति कैसा रुख रखेगी, वहीं बालेन शाह जैसी नई पीढ़ी के नेतृत्व के साथ यह “प्रीडिक्टेबिलिटी” कम हो जाएगी। विशेषग्य  चेतावनी देते हैं कि अभी यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाज़ी होगा कि शाह भारत‑समर्थक होंगे या विरोधी—वो युवा हैं, नई टीम के साथ आए हैं, और उनका अंतिम रुख उनकी कैबिनेट, गठबंधन तथा घरेलू दबावों पर भी निर्भर करेगा।

भविष्य के मुख्य जोखिम

प्रतीकात्मक विवादों से वास्तविक तनाव

विशेषज्ञों ने आशंका जताई है कि नक्शे, ऐतिहासिक संधियाँ (जैसे सुगौली संधि) और सीमा‑संबंधी बयान एक बार फिर से घरेलू राजनीति में लोकप्रियता के लिए इस्तेमाल हो सकते हैं। पहले “ग्रेटर नेपाल” मैप, लिम्पियाधुरा‑कालापानी‑लिपुलेख मुद्दे और भारत‑चीन‑नेपाल त्रिकोण में व्यापार‑मार्गों को लेकर बयानबाज़ी ने दोनों देशों के रिश्तों में ज़हर घोला था, और नया राष्ट्रवादी एजेंडा इन्हें फिर हवा दे सकता है।

भारत‑चीन के बीच “टाइट रोपवॉक”

आरएसपी नेतृत्व ने “डेवलपमेंट डिप्लोमेसी” और संतुलित, नॉन‑अलाइंड विदेश नीति की बात की है—यानि भारत, चीन और पश्चिम सबके साथ निवेश‑केंद्रित रिश्ते, बिना किसी एक खेमे में साफ़ झुकाव के। लेकिन  विश्लेषकों के मुताबिक व्यावहारिक स्तर पर भारत और चीन के बीच यह संतुलन बनाना आसान नहीं होगा, चीन की बीआरआई परियोजनाएँ, संवेदनशील इलाकों (जैसे सिलीगुड़ी कॉरिडोर के पास प्रस्तावित इंडस्ट्रियल पार्क) और सीमा विवादों पर शाह का सख्त रुख, सब मिलकर दिल्ली‑बीजिंग दोनों के साथ तनाव की संभावना बढ़ाते हैं।

घरेलू अस्थिरता और “ऊँचीउम्मीदें”

आरएसपी और बालेन शाह को भारी बहुमत “एंटी‑एस्टैब्लिशमेंट” और Gen‑Z प्रोटेस्ट की लहर ने दिया है, माना जा रहा है कि लोग भ्रष्टाचार और बेरोजगारी से तंग आ चुके थे। कई विश्लेषकों का कहना है कि अगर यह नई सरकार डिलीवर न कर पाई, या आंतरिक गुटबाज़ी व अनुभवहीनता के कारण जल्द अस्थिर हो गई, तो नेपाल फिर राजनीतिक अस्थिरता में फँस सकता है—जिसका सीधा असर सीमा‑प्रबंधन, पानी, ऊर्जा और सुरक्षा सहयोग जैसे मुद्दों पर भारत को झेलना पड़ेगा।

सुरक्षा औ रभू‑राजनीतिक जोखिम

चीन की सैन्य‑रणनीतिक चिंता, खासकर हिमालयी इलाकों और भारत के उत्तर‑पूर्व के पास इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स, पहले से ही दिल्ली के लिए संवेदनशील विषय हैं। यदि नई सरकार “प्रो‑नेपाल” के नाम पर बार‑बार भारत‑चीन दोनों से टकराव की मुद्रा अपनाती है, या बड़े‑बड़े प्रोजेक्टों के जरिए किसी एक पक्ष को ज़्यादा सामरिक बढ़त मिलती दिखती है, तो भारत‑नेपाल संबंध भी सुरक्षा‑केंद्रित अविश्वास के चक्र में फँस सकते हैं।

जोखिमों के बीच संभावित रास्ता

भारत को पुरानी “पैतृक” शैली से हटकर धैर्य, संवेदनशीलता और आर्थिक‑विकास केंद्रित साझेदारी पर ज़ोर देना होगा—यानी खुले तौर पर बराबरी का रिश्ता स्वीकार करना, सार्वजनिक बयानबाज़ी में ‘डोमिनेंस’ का आभास न देना और विवादित मुद्दों को शांति से बातचीत की मेज़ पर सुलझाना। नेपाली विश्लेषकों की भी राय है कि अगर नई सरकार प्रतीकात्मक राष्ट्रवाद से ज़्यादा फोकस रोज़गार, इन्फ्रास्ट्रक्चर, ऊर्जा और पर्यटन पर रखे और इन्हीं सेक्टरों में भारत के साथ प्रोजेक्ट‑आधारित सहयोग बढ़ाए, तो दोनों देशों के रिश्ते “विन‑विन” दिशा में जा सकते हैं।

कुल मिला कर बालेन शाह की जीत को लेकर विशेषज्ञों में मतभेद “खतरा बनाम अवसर” की रेखा पर हैं—पर लगभग सब मानते हैं कि यह नया दौर रिश्तों को या तो और परिपक्व बना सकता है या और नाज़ुक, और यह दोनों तरफ की राजनीति और कूटनीति की समझदारी पर निर्भर करेगा ।

Related Articles

Back to top button