ऐतिहासिक इस्लामाबाद वार्ता का दुखद अंत: ‘सरेंडर’ के बजाय ईरान ने चुना संघर्ष का रास्ता, जेडी वेंस की स्वदेश वापसी

इस्लामाबाद: आधी सदी के सबसे बड़े कूटनीतिक प्रयास का अंत कड़वाहट और बड़े सैन्य खतरे के साथ हुआ है। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद पहली बार आमने-सामने बैठे अमेरिका और ईरान के बीच समझौता नहीं हो सका। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस इस्लामाबाद से खाली हाथ रवाना हो गए हैं, जिसके बाद ईरानी सेना ने दो टूक शब्दों में कह दिया है कि उन्हें ‘झुकना’ मंजूर नहीं है।

1. सरेंडर की शर्तें ठुकराईं: ‘ईरान समझौता करेगा, समझौता नहीं’

वार्ता विफल होते ही ईरान की ओर से पहली तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। ईरानी सेना (IRGC) के प्रवक्ता इब्राहिम ज़ुल्फिकारी ने साफ कर दिया कि वार्ता टूटने की वजह अमेरिका का ‘अड़ियल’ रुख था।

  • बयान: ज़ुल्फिकारी ने कहा, “हम अपनी शर्तों पर कोई समझौता नहीं करेंगे। अमेरिका हमें सरेंडर करने की शर्तें दे रहा था, जो हमें कभी स्वीकार्य नहीं हैं।”
  • ईरान का रुख: ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अपनी रक्षात्मक नीति और रणनीतिक हितों को अमेरिका की मर्जी के अनुसार नहीं बदलेगा।

2. 1979 के बाद पहला प्रत्यक्ष संवाद भी रहा बेअसर

यह वार्ता इतिहास के पन्नों में दर्ज होने वाली थी क्योंकि करीब 47 सालों बाद दोनों कट्टर दुश्मन एक मेज पर थे।

  • त्रिपक्षीय प्रयास: पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की मध्यस्थता में हुई इस बैठक में अमेरिकी टीम का नेतृत्व जेडी वेंस और ईरानी टीम का नेतृत्व संसद अध्यक्ष मोहम्मद बागेर गालिबफ कर रहे थे।
  • सेरेना होटल का ‘रेड अलर्ट’: इस्लामाबाद के सेरेना होटल को किसी किले में तब्दील कर दिया गया था। 10,000 से अधिक सुरक्षाकर्मियों और सेना की तैनाती के बीच हुई यह कोशिश अंततः नाकाम रही।

3. अब क्या? पश्चिम एशिया में और दहक सकती है आग

विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्तर की बातचीत का विफल होना बेहद खतरनाक संकेत है।

  • जंग का विस्तार: अब तक जो युद्ध सीमित था, वह अब पूरे मिडिल ईस्ट को अपनी चपेट में ले सकता है।
  • कूटनीति का अंत: जेडी वेंस की अमेरिका वापसी का मतलब है कि अब व्हाइट हाउस कूटनीति के बजाय सैन्य विकल्पों पर विचार कर सकता है।

4. पाकिस्तान की मध्यस्थता को लगा झटका

पाकिस्तान ने इस वार्ता को सफल बनाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी थी। इस्लामाबाद को उम्मीद थी कि इस डील से वह वैश्विक राजनीति में एक बड़े मध्यस्थ के रूप में उभरेगा, लेकिन अमेरिका की ‘सरेंडर शर्तों’ और ईरान के ‘प्रतिरोध’ ने इस उम्मीद पर पानी फेर दिया।

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