इफ्तार में खजूर,बिरयानी और अखिलेश !

नवेद शिकोह

सपा मुखिया अखिलेश यादव अपने सबसे बड़े जनाधार वाले मुस्लिम समाज को कम तवज्जो देते हैं। ये धारणा टूट रही है। अब अखिलेश मुस्लिम समाज को अधिक से अधिक समय दे रहे हैं।
अपने पिता स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव की तरह वो मुस्लिम महफ़िलों-शादियों में ख़ूब शिरकत कर रहे हैं। बताया जा रहा है कि इस रमज़ान में उन्होंने रोजा इफ्तार पार्टियों में शरीक होने का रिकार्ड बनाया है। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव अपने राजनीतिक करियर में जितनी मुस्लिम शादियों और रोजा इफ्तार पार्टियों में सम्मिलित हुए होंगे इतनी शिरकत इन्होंने चंद सप्ताह में कर ली।
लखनऊ के ला प्लास कॉलोनी ग्राउंड में एक इफ्तार पार्टी में ब्लैक कमांडो के घेरे में घिरे अखिलेश यादव की तरफ बढ़ती भीड़ का रेला देखकर एक रोजदार का जुमला दिलचस्प था- यहां रोजदार कम पार्टी कार्यकर्ताओं और टिकटार्थी (चुनावी टिकट की सिफारिश करने वाले), ज्यादा हैं। भीड़ के मंजर पर तंज करते हुए दूसरे रोजदार बोले- इस रमजान भव्य,शाही और सियासी इफ्तार पार्टियों की बहार आ गई। जिस तरह इफ्तार में खजूर जरुर होती है वैसे ही हर बड़ी इफ्तार पार्टी में अखिलेश यादव जी जरुर पाए जा रहे हैं।
सपा मुखिया की मुस्लिम महफिलों में बढ़ती दिलचस्पी पर राजनीति पंडितों का मानना है कि हालिया बिहार और महाराष्ट्र निकाय चुनावी नतीजों में एआईएमआईएम की सफलता के बाद अखिलेश असद्दुदीन औवेसी की यूपी दस्तक को गंभीरता से ले रहे हैं।
भाजपा द्वारा तुष्टिकरण के आरोपों और ध्रुवीकरण से बचने के अलावा अधिक से अधिक हिन्दू समाज के वोट हासिल करने के लिए वो मुस्लिम समाज से सीमित ही रिश्ता रखने व इनके मसलों पर ज्यादा मुखर ना होना ही मुनासिब समझ रहे थे। क्योंकि चाह कर भी वो अपने पिता मुलायम सिंह यादव की तरह अकलियत के मुद्दों पर अधिक मुखर नहीं हो सकते थे।
एक जमाना था जब उत्तर प्रदेश में चार दलों का वजूद था इसलिए मुलायम के जमाने वाली सपा एम वाई (मुस्लिम-यादव) समीकरण से सरकार बना सकती थी । किंतु अब समाजवादी पार्टी का लक्ष्य भाजपा के तकरीबन चालीस से पचास फीसद जनाधार के मुकाबले इतना ही जनाधार हासिल करना है।
जो एम वाई समीकरण से संभल नहीं। यही कारण है कि पीडीए बनाकर दलित-पिछड़ों को विश्वास में लेने सपा की मुख्य रणनीति है।
बसपा हाशिए पर हैं और कांग्रेस साथ है इसलिए सपा मुखिया अखिलेश का ये समझ लेना कि मुस्लिम जाएगा तो कहां जाएगा ! भाजपा को हराने के लिए सपा इकलौता दल है इसलिए मुस्लिम समाज सपा को नजरंदाज नहीं कर सकता भले ही सपा मुसलमानों को कितना भी नजरंदाज कर लें।
लेकिन बिहार विधानसभा चुनाव और महाराष्ट्र निकाय चुनाव में ओवेशी की तरफ बढ़ते मुस्लिम रुझान से अखिलेश अपनी रणनीति को परिवर्धित करते हुए अकलियत के नजदीक जा रहे हैं।
ये सच है कि दुनिया की तरह वक्त भी गैल है, जहां से शुरू होता है वहीं आ जाता है। घूम फिरकर हम वहीं आ जाते हैं जिसे छोड़कर निकले थे। औवेसी सपा को पुराने स्वरूप में लाने पर मजबूर कर रहे हैं।
यूपी में भाजपा की भगवा संस्कृति की हुकूमत के नौ बरसों के दौरान रमजान की इबादत में सियासत का अतिक्रमण कम हो गया था। समाजवादी पार्टी मुखिया भी मुस्लिम महफ़िलों और मसले मिसाइलों में एक लिमिट तक ही नजर आ रहे थे। लेकिन बिहार और फिर महाराष्ट्र निकाय चुनावी नतीजों का असर यूपी में दिखने लगा है। संभावित 2027की शुरुआत में होने वाले विधानसभा चुनाव का चुनावी वर्ष 2026 ही माना जा रहा है।
माह-ए- रमज़ान में इसका असर दिखा। बहुत अर्से से सूनी पड़ी लखनऊ की गंगा जमुनी तहजीब ने अंगड़ाई ली। भव्य रोजा इफ्तार पार्टियों में हिन्दू-मुस्लिम सद्भावना के मंजर दिखाई दिए।
सद्भावना और गंगा जमुनी तहजीब को बहाल करने या पुनः इबादत में सियासत के रंग घोलने में समाजवादियों का बड़ा योगदान रहा। सफेद जाली टोपियां इफ्तार पार्टियों की शान रहती हैं लेकिन समाजवादी लाल टोपियां भी इफ्तार पार्टियों में खूब नजर आ रही हैं। सियासी इफ्तार पार्टियों पर मशहूर शायर राहत इंदौरी ने लिखा था-
“सियासत में ज़रूरी है रवादारी, समझता है।
वो रोज़ा तो नहीं रखता, पर इफ्तारी समझता है।



