बालेन शाह की अगुवाई में नेपाल, भारत के साथ संबंधों की चुनौतियाँ

डा.उत्कर्ष सिन्हा

नेपाल के 2026 के आम चुनावों के नतीजे आ चुके हैं, और ये नतीजे न केवल हिमालयी राष्ट्र की राजनीति में एक क्रांतिकारी मोड़ का संकेत देते हैं, बल्कि दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक समीकरण को भी नया आकार देने की क्षमता रखते हैं। 5 मार्च को संपन्न हुए मतदान के बाद 6 मार्च को जारी प्रारंभिक परिणामों में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) ने जबरदस्त प्रदर्शन किया है। बालेन  शाह के नेतृत्व वाली इस युवा-केंद्रित पार्टी ने 275 सदस्यीय प्रतिनिधि सभा में 94 सीटों पर बढ़त बना ली है, जो बहुमत के आंकड़े (137) को पार करने की दिशा में मजबूत संकेत है। नेपाली कांग्रेस (एनसी) और सीपीएन-यूएमएल जैसी पारंपरिक पार्टियां पीछे छूट गई हैं—एनसी को मुश्किल से दोहरी अंकों तक पहुंचने की उम्मीद है, जबकि केपी शर्मा ओली की यूएमएल को भारी नुकसान हुआ है। यह जीत 2025 के जेन-जेड प्रदर्शनों की विरासत है, जिन्होंने भ्रष्टाचार-विरोधी लहर को जन्म दिया और पुरानी सत्ता को उखाड़ फेंका।

लेकिन सवाल यह है कि क्या यह नया दौर नेपाल को स्थिरता और समृद्धि की ओर ले जाएगा? और बालेन शाह की भारत-नीति, जो विवादास्पद रही है, हमारे द्विपक्षीय संबंधों पर क्या छाया डालेगी?

नेपाल के लिए क्या हैं मायने ?

पहले तो समझें कि ये नतीजे नेपाल के लिए क्या मायने रखते हैं। नेपाल की राजनीति लंबे समय से अस्थिरता का शिकार रही है—2015 के संविधान के बाद से सात प्रधानमंत्री बदले, और आर्थिक संकट ने युवाओं को देश से बाहर धकेल दिया। 2025 के प्रदर्शनों में 77 मौतें हुईं, लेकिन उन्होंने एक नई पीढ़ी को जन्म दिया, जो भ्रष्टाचार, nepotism और विदेशी हस्तक्षेप से तंग आ चुकी थी। आरएसपी का उदय इसी असंतोष का प्रतीक है। पार्टी ने 165 प्रत्यक्ष सीटों में से 60 से अधिक पर बढ़त बनाई है, जबकि अनुपातिक प्रतिनिधित्व (पीआर) में भी 35-40 सीटें उनके पक्ष में हैं। बालेन  शाह, जो काठमांडू के मेयर के रूप में पहले ही लोकप्रिय हो चुके हैं, अब प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदार हैं। एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार, आरएसपी की लैंडस्लाइड जीत युवा मतदाताओं (10 लाख नए वोटरों) की 80% भागीदारी से संभव हुई, जो एंटी-इनकंबेंसी वेव का परिणाम है।

भावी परिदृश्य की बात करें तो नेपाल एक ‘युवा क्रांति’ के दौर में प्रवेश कर रहा है। बालेन  शाह की सरकार यदि बनी, तो प्राथमिकताएं स्पष्ट हैं: भ्रष्टाचार-रोधी सुधार, रोजगार सृजन और इंफ्रास्ट्रक्चर। आरएसपी का मेनिफेस्टो ‘नागरिक करारपत्र’ में हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स, सड़क नेटवर्क विस्तार और पर्यावरण संरक्षण पर जोर है। अर्थव्यवस्था, जो कोविड के बाद 4% ग्रोथ पर अटकी है, को 7-9% तक ले जाने का वादा है। लेकिन चुनौतियां कम नहीं। उन्हें गठबंधन की जरूरत पड़ेगी तो नेपाली कांग्रेस या मधेशी पार्टियों से समर्थन लेना पड़ सकता है, जो स्थिरता को प्रभावित करेगा। यदि आरएसपी अकेले बहुमत हासिल कर लेती है, तो नेपाल पहली बार एक ‘नॉन-डाइनास्टी’ सरकार देखेगा, जो लंबे समय तक टिक सकती है। बीबीसी के अनुसार, यह चुनाव ‘ओल्ड गार्ड’ का अंतिम परीक्षण था, और युवा नेतृत्व अब स्थिरता ला सकता है। लेकिन यदि आंतरिक कलह हुआ, तो 2027 तक नई अस्थिरता का खतरा है। कुल मिलाकर, नेपाल का भविष्य आशावादी है—युवा ऊर्जा से समृद्धि की राह, लेकिन शासन अनुभव की कमी से जोखिम भरा।

भारत के लिए क्या मायने है ?

अब आते हैं बालेन  शाह की भारत-नीति पर, जो नेपाल के परिदृश्य को सबसे ज्यादा प्रभावित करेगी। बालेन  शाह की छवि एक राष्ट्रवादी नेता की है, जो नेपाल की ‘स्वतंत्रता’ पर जोर देते हैं। काठमांडू मेयर रहते उन्होंने कई कदम उठाए जो भारत-विरोधी माने गए। सितंबर 2025 में, उन्होंने हिंदी फिल्मों की रिलीज पर अनौपचारिक बैन लगाया, जिसे ‘सांस्कृतिक घुसपैठ’ के खिलाफ बताया। इसके अलावा, ‘ग्रेटर नेपाल’ मैप को प्रमोट करने के आरोप लगे, जो नेपाल के पुराने दावों (कुमाऊ -गढ़वाल क्षेत्र) को जिंदा करता है। डब्ल्यूआईओएन की रिपोर्ट में इन्हें ‘एंटी-इंडिया’ स्टांस कहा गया, जो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ।

बालेन  शाह ने कर्नाटक के बेलगाम में इंजीनियरिंग की पढ़ाई की, लेकिन उनकी नीति ‘नेपाल फर्स्ट’ है—भारतीय निवेश को सीमित करने और चीन से बैलेंस करने पर जोर। 2025 के प्रदर्शनों में, उन्होंने ओली सरकार को ‘भारतीय प्रभाव’ का दोषी ठहराया, जो सीमा विवाद (लिपुलेख-पास) से जुड़ा था।

हालांकि, यह नीति पूरी तरह एंटी-इंडिया नहीं है; बल्कि प्रैग्मेटिक राष्ट्रवाद है। बालेन  शाह ने कभी खुले तौर पर भारत का विरोध नहीं किया और उनके बैन को स्थानीय कलाकारों के समर्थन में बताया गया। मनीकंट्रोल की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, आरएसपी की जीत भारत के लिए मिश्रित स्थिति है: एक ओर, बालेन  शाह की युवा अपील द्विपक्षीय युवा समबन्ध बढ़ा सकती है; दूसरी ओर, राष्ट्रवादी एजेंडा बॉर्डर ट्रेड (90% व्यापार भारत से) को प्रभावित कर सकता। यदि वह पीएम बने, तो लिपुलेख जैसे मुद्दों पर कड़ा रुख अपनाना पड़ सकता है, जो 2019 के नक्शा विवाद को जिंदा कर देगा। लेकिन आर्थिक निर्भरता (भारतीय सहायता 1 बिलियन डॉलर सालाना) उन्हें संयम बरतने पर मजबूर करेगी।

इन प्रभावों का विश्लेषण करें तो भारत-नेपाल संबंधों पर गहरा असर पड़ेगा। सकारात्मक पक्ष यह है कि बालेन  शाह की सरकार पर्यटन और हाइड्रोपावर में भारतीय निवेश को आमंत्रित कर सकती है—आरएसपी का मेनिफेस्टो ‘मेगा इंफ्रा’ पर फोकस करता है, जहां भारत पार्टनर हो सकता है। 2025 के प्रदर्शनों के बाद, अंतरिम पीएम सुशीला कार्की ने भारत से सहयोग मांगा था; बालेन  शाह इसे जारी रख सकते हैं।

नकारात्मक पक्ष यह है कि ‘ग्रेटर नेपाल’ नरेटिव यदि मजबूत हुआ, तो सीमा तनाव बढ़ेगा। भारत को अब ‘नेबरहुड फर्स्ट’ पॉलिसी को रिफ्रेश करना होगा—युवा डिप्लोमेसी, कल्चरल एक्सचेंज और आर्थिक एड से। यदि बालेन  शाह प्रो-इंडिया टर्न लेते हैं, तो संबंध मजबूत होंगे; अन्यथा, नेपाल ‘बफर स्टेट’ की बजाय ‘कंपीटिटिव बैलेंस’ का मैदान बनेगा।

कुल मिलाकर, नेपाल का भावी परिदृश्य एक दोधारी तलवार है। आरएसपी की जीत लोकतंत्र की जीत है—युवा शक्ति ने सत्ता को हिला दिया, और यदि बालेन  शाह स्थिर सरकार बनाते हैं, तो नेपाल आर्थिक उछाल देख सकता है। लेकिन भारत के संदर्भ में, उनकी नीति चुनौतीपूर्ण रहेगी।

दक्षिण एशिया में शांति तभी संभव है जब पड़ोसी एक-दूसरे की आकांक्षाओं को समझें। बालेन  शाह का दौर नेपाल को नए बदलाव की और ले जा सकता है, लेकिन भारत को स्मार्ट डिप्लोमेसी से इसका लाभ उठाना होगा।

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