जुबिली स्पेशल डेस्क
1 फरवरी को पेश होने वाले बजट से पहले देश की सत्ता और वित्त मंत्री के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। यह चुनौती यूपीआई पेमेंट सिस्टम से जुड़ी खामियों और पेमेंट एग्रीगेटर्स को हो रहे लगातार नुकसान की है।
रिकॉर्ड स्तर पर ट्रांजेक्शन होने के बावजूद पेमेंट एग्रीगेटर्स की आर्थिक सेहत चिंता का विषय बनी हुई है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इस बजट में सरकार डिजिटल इंडिया की इस रीढ़ को मजबूत करने का कोई ठोस समाधान पेश कर पाएगी?
क्या सरकार के पास ऐसा व्यावहारिक प्लान है, जिससे डिजिटल क्रांति बिना रुकावट आगे बढ़ती रहे और इससे जुड़े प्लेटफॉर्म्स को नुकसान भी न उठाना पड़े? अब सभी की निगाहें 1 फरवरी के बजट पर टिकी हैं।
वास्तविकता यह है कि 10 रुपये की चाय से लेकर 50 हजार रुपये के स्मार्टफोन तक, बिजली बिल हो या मकान का किराया—प्लास्टिक कार्ड और कागजी करेंसी अब धीरे-धीरे चलन से बाहर होती जा रही है।
गूगल पे, फोनपे और अन्य यूपीआई आधारित प्लेटफॉर्म आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुके हैं। खासतौर पर नोटबंदी और कोरोना महामारी के बाद देश तेजी से कैशलेस और कॉन्टैक्टलेस लेनदेन की ओर बढ़ा है।
हालांकि, इस सफलता की चमक के पीछे एक गहरी चिंता भी छिपी हुई है। उद्योग जगत के नेताओं का मानना है कि यूपीआई इकोसिस्टम से जुड़ी यह बेचैनी अब उस स्तर पर पहुंच चुकी है, जिसे नीति निर्माताओं के लिए नजरअंदाज करना मुश्किल होता जा रहा है।
तेज़ी से विकास के दावों के बावजूद यूपीआई के व्यापारी नेटवर्क में ठहराव के संकेत साफ़ दिखने लगे हैं। एक विश्लेषक के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले तीन वर्षों में सक्रिय मर्चेंट क्यूआर नेटवर्क की वृद्धि दर महज़ करीब 5 प्रतिशत सीएजीआर रही है, जो अपेक्षाओं से काफी कम है।
हैरानी की बात यह है कि देशभर में यूपीआई का पूर्ण विस्तार अब भी नहीं हो पाया है। मौजूदा समय में भारत के लगभग 45 प्रतिशत व्यापारी ही ऐसे हैं, जो नियमित रूप से मासिक आधार पर यूपीआई भुगतान स्वीकार कर रहे हैं।
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