सहर में गांव की मस्जिद से आती…अजान की सुरीली सी आवाज…

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सहर में गांव की मस्जिद से आती…
अजान की सुरीली सी आवाज
आवाज सुनकर रोज उठ जाता हूँ नींद से..
मेरे घर के पीछे वाली सड़क के उस पर
है कलीम चचा के किराने की दुकान……
रोज करता हूँ उसकी कई बार परिक्रमा
क्यूंकि वहां मिलता है मुझे मेरा अली
चचा का भतीजा,मेरा साथी…….
अली के साथ गांव की पगडंडियों पर
हर गली,हर कूचों में दौड़ता है मेरा बचपन
मेरे हसरतों का सावन……
शाहिदा चाची के हाथ से खाना खाकर
हम दोनों निकल जाते है गांव की सैर पर…..
चार आने मेरे,चार आने अली के
आठ आने में हम दोनों खरीद लेते है
हमारी सारी जरूरते,मुकम्मल खुशियाँ…..
मुझे नहीँ आती है उर्दू की आयतें
पर अली को याद है पूरी गीता का सार…
मेरा प्यार,उसकी तकरार दोनों खूबसूरत है
बिल्कुल हमारी दोस्ती की तरह……
दुकान के पीछे अली और मैंने
बनाया है एक प्यार का घरौंदा..
अहसास की मिटटी में
हसरतों का रंग डाला है हम दोनों ने
अपने घरौंदे में…..
अली मेरा विश्वास है,मै उसका भरोसा……..
ठिठुरती रात में हर रोज
कलीम चचा आते है मेरे घर….
नीम के पेड़ के नीचे अलाव सेंकते हुए
बाबा से करते है सारे जहाँ की बातें…..
किस्तो में करते है,रिश्तों की बातें….
चचा के कंधो पर बैठकर
अली हर रात लौट जाता है अपने घर…..
माँ बताती है चचा के घर रखे है हिफाज़त से
मेरे घर के जरूरी कागज़ात….
और बाबा के पास महफूज है
चचा की ज़िन्दगी भर की कमाई…
अली के जाने के बाद देखता हूँ…
पूरे चाँद को,आधी रात में…..
सो जाता हूँ फिर,अर्धमुकम्मल नींद में
अचानक…..

एकाएक……
             सूबे का माहौल बदलता है,
            और बदल जाता है,शहर का मिजाज…..
              आने लगती है तलवार और चाकू से
                  किसी इंसान के कटने की आवाज….
सड़क पर उगी घास भी आज शहर की तरह
बदल देती है अपनी फ़ितरत
और हो जाती है हरी से लाल……
तिलक और टोपी वाले टूटते है एक दूसरे पर
फ़िज़ा में बज रहा रहा है
औरतो के चीखने का संगीत…..
चचा अचेतन पड़े है उसी दुकान पर
मौत के दामन में….
कोई सदा नहीँ आती अब उनकी सादगी से
मेरे कानो में,वो मर चुके है….
माँ ने बताया चचा की मौत बाबा के तलवार से
हुई है…
मेरे बाबा की तलवार से ढह गया मेरा घरौंदा
माफ़ करना…मेरा और अली का घरौंदा…..
हसरतों के रंग पर अब खून की छीटें है…
मै ख़ामोशी से देख रहा हूँ ये मंज़र
बिना किसी भाव के….
प्रतिशोध की आग में अली उतार देता है
मेरे सीने में अपना पूरा चाकू
और कर लेता है कलीम चचा का हिसाब बराबर……

अचानक से
एक झटके में मेरी नींद टूटती है….
देखता हूँ अपनी नग्न आँखों से
माँ की गोद में बैठे अली को…..
कलीम चचा बाबा का हाथ थामे
ले जा रहे उन्हें मंदिर…..
फिर
हाँ फिर
मंद -मंद मुस्कुरा कर सोचता हूँ….
जब तक मै और अली जिंदा है…
ये सपना सपना ही रहेंगे…..
क्यूंकि घरौंदे कभी गिरते नही….
रवि और अली कभी विछड़ते नहीँ…..
हम एक थे,एक है,एक रहेंगे……..

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         रवि सिंह रैकवार

             

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