NEET का डिजिटल कवच: पेपर लीक पर अंतिम प्रहार ?


प्रोफेसर अशोक कुमार
भारत में प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता और निष्पक्षता बनाए रखना देश के भविष्य के लिए अत्यंत संवेदनशील और महत्वपूर्ण विषय है ! हाल ही में केंद्रीय शिक्षा मंत्री द्वारा यह घोषणा की गई कि अगले वर्ष से मेडिकल प्रवेश परीक्षा को ‘पेन-पेपर’ मोड से बदलकर ‘कंप्यूटर आधारित परीक्षा’ मोड में आयोजित किया जाएगा। सरकार का तर्क है कि इस कदम से परीक्षा की शुचिता बढ़ेगी, पेपर लीक जैसी घटनाओं पर अंकुश लगेगा और मूल्यांकन प्रक्रिया तेज होगी। तकनीकी दृष्टि से यह एक प्रगतिशील कदम प्रतीत होता है ! नीट परीक्षा में लगभग 25 लाख छात्र बैठते हैं। वर्तमान में यह परीक्षा ऑफलाइन (पेन-एंड-पेपर और ओएमआर शीट) मोड में एक ही दिन, एक ही समय पर आयोजित की जाती है। इतनी विशाल संख्या में भौतिक प्रश्नपत्रों की छपाई, उनका परिवहन और देश भर के हजारों सुदूर केंद्रों पर उनकी सुरक्षा करना ‘पेपर लीक’ के जोखिम को अत्यधिक बढ़ा देता है।
यदि हम जेईई की तर्ज पर नीट को भी कंप्यूटर आधारित परीक्षा सीबीटी प्रणाली में परिवर्तित कर दें, तो 25 लाख छात्रों की शुचिता पूर्ण (पारदर्शी और सुरक्षित) परीक्षा न केवल संभव है, बल्कि यह वर्तमान संकट का सबसे वैज्ञानिक समाधान भी है।
नीचे विस्तार से विश्लेषण किया गया है कि इसे कैसे और किन चरणों में पूरी तरह सुरक्षित रूप से लागू किया जा सकता है
1. बहु-सत्र और बहु-दिवसीय प्रारूप
25 लाख छात्रों की ऑनलाइन परीक्षा एक ही दिन में कराना तकनीकी और बुनियादी ढांचे के लिहाज से असंभव है। इसके लिए परीक्षा को 10 से 12 दिनों के चक्र में विभाजित करना होगा।
प्रतिदिन दो शिफ्ट: यदि परीक्षा 10 दिनों तक चलती है और प्रतिदिन 2 शिफ्ट (सुबह और शाम) आयोजित की जाती हैं, तो कुल 20 सत्र होंगे।
प्रति सत्र छात्र संख्या: 25 लाख छात्रों को 20 सत्रों में बांटने पर प्रति सत्र केवल 1.25 लाख छात्र परीक्षा देंगे। भारत के पास वर्तमान में टीसीएस आयन और अन्य सरकारी व निजी केंद्रों को मिलाकर प्रति शिफ्ट 2 से 3 लाख कंप्यूटर नोड्स की क्षमता आसानी से उपलब्ध है।
2. प्रश्नपत्रों का विविधीकरण और ‘साइकोमेट्रिक नॉर्मलाइजेशन’
जब परीक्षा 20 अलग-अलग सत्रों में होगी, तो सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या सभी छात्रों को एक जैसा पेपर मिलेगा? और यदि पेपर अलग होंगे, तो निष्पक्षता कैसे तय होगी?
व्यापक प्रश्न बैंक और एआई का उपयोग
राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी को विषय विशेषज्ञों की मदद से एक विशाल, कूटबद्ध और अत्यंत सुरक्षित ‘क्वेश्चन बैंक’ तैयार करना होगा।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एल्गोरिदम का उपयोग करके परीक्षा शुरू होने से मात्र आधा घंटा पहले हर सत्र के लिए एक नया प्रश्नपत्र स्वचालित रूप से तैयार होगा। इसमें प्रश्नों के कठिनाई स्तर का अनुपात (सरल, मध्यम, कठिन) हर पेपर में समान रखा जाएगा।
परसेंटाइल और नॉर्मलाइजेशन पद्धति
चूंकि अलग-अलग शिफ्ट के प्रश्नपत्रों के कठिनाई स्तर में आंशिक अंतर हो सकता है, इसलिए अंकों के बजाय परसेंटाइल स्कोर का उपयोग किया जाएगा, जैसा कि वर्तमान में जेईई में होता है।
इसे ‘यूनीफाइड नॉर्मलाइजेशन फॉर्मूला’ कहते हैं, जो यह सुनिश्चित करता है कि यदि किसी शिफ्ट का पेपर कठिन था, तो उस शिफ्ट के छात्रों को नुकसान न हो।
3. सीबीटी प्रणाली में ‘पेपर लीक’ का पूर्ण उन्मूलन कैसे होगा?
पारंपरिक परीक्षा में पेपर लीक इसलिए होता है क्योंकि भौतिक प्रश्नपत्र परीक्षा से कई दिन पहले छपकर ट्रक, ट्रेजरी और स्ट्रांग-रूम के रास्ते केंद्रों तक पहुंचते हैं। सीबीटी इस पूरी शृंखला को ही समाप्त कर देता है।
शून्य भौतिक परिवहन : कोई प्रिंटिंग प्रेस नहीं होगी, कोई बक्से नहीं होंगे और न ही कोई गाड़ी पेपर लेकर सड़क पर जाएगी। लीक होने का मुख्य जरिया ही खत्म हो जाएगा।
अंतिम समय पर डिजिटल डिलीवरी : प्रश्नपत्र पूरी तरह से ‘एंड-टू-एंड एनक्रिप्टेड’ सर्वर पर रहेगा। परीक्षा शुरू होने से ठीक 15-30 मिनट पहले परीक्षा केंद्र के लोकल सर्वर पर इसे डाउनलोड करने की अनुमति मिलेगी।
स्क्रीन रैंडमाइजेशन : यदि किसी केंद्र पर कोई अनधिकृत प्रयास करके पेपर देख भी लेता है, तो कंप्यूटर स्क्रीन पर हर छात्र के लिए प्रश्नों का क्रम और विकल्पों का क्रम पूरी तरह अलग होगा। छात्र क्रमांक 1 का पहला प्रश्न, छात्र क्रमांक 2 का 45वां प्रश्न हो सकता है। इससे सामूहिक नकल पूरी तरह असंभव हो जाएगी।
4. डिजिटल युग के ‘अनफेयर मीन्स’ और छद्मवेष पर रोक
ऑनलाइन परीक्षा में हैकिंग, स्क्रीन शेयरिंग और डमी कैंडिडेट के रूप में नई चुनौतियां आती हैं। इन्हें रोकने के लिए निम्नलिखित आधुनिक तकनीकी कवच आवश्यक हैं:
अभेद्य सॉफ्टवेयर और ‘लॉक्ड ब्राउज़र’
परीक्षा के लिए उपयोग होने वाले कंप्यूटरों में आइसोलेटेड लोकल एरिया नेटवर्क’ का उपयोग होना चाहिए, जिसका बाहरी इंटरनेट से कोई संबंध न हो।
कंप्यूटरों में ऐसे लॉक्ड ब्राउज़र कॉन्फ़िगर होने चाहिए जो परीक्षा के दौरान किसी भी अन्य बैकग्राउंड सॉफ़्टवेयर, रिमोट डेस्कटॉप शेयरिंग या यूएसबी पोर्ट को पूरी तरह ब्लॉक कर दें।
त्रिस्तरीय बायोमेट्रिक और फेस रिकग्निशन प्रवेश पर: परीक्षा केंद्र के मुख्य द्वार पर आधार-कार्ड से लिंक फिंगरप्रिंट स्कैनर और फेसिअल रिकग्निशन (चेहरे की पहचान) प्रणाली अनिवार्य हो।
परीक्षा के दौरान: परीक्षा के बीच में कंप्यूटर स्क्रीन पर अचानक एक पॉप-अप आए, जो छात्र को दोबारा अपना अंगूठा लगाने या वेबकैम के सामने चेहरा दिखाने को कहे। इससे यह सुनिश्चित होगा कि बायोमेट्रिक देकर अंदर घुसा व्यक्ति ही अंत तक परीक्षा दे रहा है।
काउंसलिंग के समय: मेडिकल कॉलेज में दाखिले के समय परीक्षा केंद्र पर लिए गए बायोमेट्रिक डेटा का पुन: मिलान किया जाए।
एआई-संचालित लाइव ई-सर्विलांस
प्रत्येक परीक्षा हॉल के सीसीटीवी कैमरों का लाइव फीड एक केंद्रीय राष्ट्रीय कमांड सेंटर (जैसे नई दिल्ली) से जोड़ा जाए।
एआई सॉफ्टवेयर छात्रों की संदिग्ध गतिविधियों (जैसे बार-बार नजरें चुराना, आपस में फुसफुसाना या स्क्रीन से ध्यान हटाना) को ट्रैक करके तुरंत स्थानीय इनविजीलेटर के पास ‘रेड अलर्ट’ भेजेगा।
5. ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों के लिए चुनौतियां और समाधान
नीट परीक्षा में एक बड़ा वर्ग ग्रामीण पृष्ठभूमि से आता है, जिन्हें कंप्यूटर चलाने का पूर्व अनुभव नहीं होता या उनके क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे की कमी होती है। इस संवेदनशीलता को दूर करने के लिए निम्नलिखित कदम उठाने होंगे:
राष्ट्रीय परीक्षा अभ्यास केंद्र : सरकार को देश के हर ब्लॉक और तहसील स्तर पर सरकारी स्कूलों या कॉमन सर्विस सेंटर्स में मुफ्त ‘मॉक टेस्ट सेंटर’ स्थापित करने चाहिए। यहाँ ग्रामीण छात्र परीक्षा से 3-4 महीने पहले जाकर कंप्यूटर पर टेस्ट देने का अभ्यास कर सकें।
सरल यूजर इंटरफेस : सीबीटी का सॉफ्टवेयर इतना सरल होना चाहिए कि छात्र को केवल ‘Next’, ‘Save’ और माउस से क्लिक करना हो। इसमें भाषा बदलने (हिंदी, अंग्रेजी और क्षेत्रीय भाषाएं) का विकल्प स्क्रीन पर हर समय उपलब्ध रहना चाहिए।
निष्कर्ष
25 लाख छात्रों की संख्या विशाल जरूर है, लेकिन आधुनिक भारत की तकनीकी क्षमता को देखते हुए यह असंभव नहीं है। जब देश में करोड़ों लोग एक ही दिन में डिजिटल भुगतान कर सकते हैं और एनटीए सफलतापूर्वक जेईई , सीयूईटी जैसी परीक्षाएं सीबीटी मोड में करा सकता है, तो नीट के लिए भी इसे पूरी तरह अपनाया जा सकता है।
परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था के मुखिया के लिए सीबीटी प्रणाली एक ऐसा ‘अभेद्य किला’ प्रदान करती है, जहां मानवीय भूल या भ्रष्टाचार की गुंजाइश खत्म हो जाती है। नीट को कंप्यूटर आधारित मोड में ले जाना न केवल चिकित्सा शिक्षा की शुचिता और गरिमा को बचाएगा, बल्कि देश के लाखों ईमानदार और प्रतिभाशाली छात्रों के भविष्य को भी सुरक्षित और अंधकारमुक्त करेगा।
(लेखक प्रख्यात शिक्षाविद हैं और पूर्व कुलपति कानपुर , गोरखपुर विश्वविद्यालय रह चुके हैं)



