अमेरिका–ईरान टकराव गहराया, समझौते की उम्मीद कमजोर

मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव का असर अब वैश्विक तेल आपूर्ति और कीमतों पर साफ दिखाई दे रहा है। हालात संकेत दे रहे हैं कि अमेरिका और ईरान के बीच टकराव लंबा खिंच सकता है, जबकि कूटनीतिक समाधान की संभावनाएं कमजोर पड़ती नजर आ रही हैं।

हाल ही में अमेरिकी पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump द्वारा भेजे गए शांति प्रस्ताव पर ईरान की प्रतिक्रिया सामने आई, लेकिन यह जवाब अमेरिकी पक्ष की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरा। इसके बाद प्रस्ताव को खारिज कर दिया गया, जिससे समझौते की संभावना लगभग खत्म मानी जा रही है।

ईरान ने वार्ता के लिए कई शर्तें रखीं, जिनमें होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण, अमेरिकी समुद्री नाकाबंदी हटाने और जब्त संपत्तियों की वापसी शामिल है। इसके साथ ही युद्ध क्षति की भरपाई की मांग भी रखी गई।

सबसे बड़ा विवाद संवर्धित यूरेनियम को लेकर बना हुआ है। अमेरिका चाहता है कि ईरान अपना यूरेनियम कार्यक्रम पूरी तरह सीमित करे, जबकि ईरान इसके लिए तैयार नहीं दिख रहा।

अमेरिका की मांग है कि ईरान लंबी अवधि के लिए अपने परमाणु कार्यक्रम को रोक दे। वहीं ईरान सीमित अवधि के लिए ही तैयार है और अपनी परमाणु सुविधाओं को खत्म करने के पक्ष में नहीं है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान किसी भी स्थिति में अपने संवर्धित यूरेनियम पर नियंत्रण बनाए रखना चाहता है, ताकि भविष्य में जरूरत पड़ने पर उसका उपयोग किया जा सके।

अमेरिका की ओर से सख्त चेतावनी दी गई है कि ईरान के परमाणु ठिकानों पर कड़ी नजर रखी जा रही है और किसी भी संदिग्ध गतिविधि पर कार्रवाई की जाएगी। वहीं इजरायल के प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu ने भी संकेत दिए हैं कि ईरान के खिलाफ अभियान अभी खत्म नहीं हुआ है।

ईरान ने भी पलटवार करते हुए स्पष्ट किया है कि वह दबाव में आकर कोई समझौता नहीं करेगा और किसी भी हमले का जवाब देने के लिए तैयार है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान में उच्च स्तर की बैठकों का दौर जारी है, जहां सैन्य रणनीति और जवाबी कार्रवाई पर चर्चा हो रही है। वहीं अमेरिका और इजरायल संभावित सैन्य विकल्पों पर विचार कर रहे हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि हालात और बिगड़ते हैं तो एयरस्ट्राइक और ग्राउंड ऑपरेशन जैसे कदम उठाए जा सकते हैं, हालांकि यह बेहद जोखिम भरा होगा।

इस टकराव का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार पर पड़ रहा है। आपूर्ति बाधित होने की आशंका से कीमतों में अस्थिरता बनी हुई है, जिससे कई देशों की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है।

मध्य पूर्व में जारी यह तनाव सिर्फ क्षेत्रीय मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा पर भी पड़ रहा है। कूटनीतिक प्रयास जारी हैं, लेकिन फिलहाल हालात में जल्द सुधार के संकेत नहीं दिख रहे।

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