विजय बनाम स्टालिन: तमिलनाडु की सियासत में ‘कर्ज’ और ‘वादों’ पर छिड़ा वाकयुद्ध

चेन्नई।तमिलनाडु की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत के साथ ही सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बयानबाजी तेज हो गई है। मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद थलापति विजय द्वारा किए गए बड़े ऐलानों और राज्य के आर्थिक हालात पर दिए गए बयान ने पूर्व मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन को हमलावर होने का मौका दे दिया है।

पदभार संभालते ही थलापति विजय ने अपनी चुनावी गारंटियों को अमलीजामा पहनाने की दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं। उनके प्रमुख ऐलानों में शामिल हैं:

  • 200 यूनिट मुफ्त बिजली: आम जनता को बड़ी राहत देने का प्रयास।
  • महिला सुरक्षा टास्क फोर्स: राज्य में महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए विशेष बल का गठन।
  • आर्थिक श्वेत पत्र की मांग: विजय ने दावा किया कि तमिलनाडु पर 10 लाख करोड़ रुपये का कर्ज है और खजाना खाली है।

विजय के ‘खाली खजाने’ वाले बयान पर पलटवार करते हुए डीएमके (DMK) प्रमुख एम.के. स्टालिन ने उन्हें आड़े हाथों लिया। स्टालिन ने तंज कसते हुए कहा कि शासन चलाने के लिए केवल वादे नहीं, बल्कि दृढ़ इच्छाशक्ति की जरूरत होती है।

  1. बजट की जानकारी पर सवाल: स्टालिन ने कहा कि हमने फरवरी के बजट में ही वित्तीय स्थिति साफ कर दी थी। क्या विजय को इसकी जानकारी नहीं थी या उन्होंने बिना होमवर्क किए जनता से वादे किए?
  2. कर्ज का गणित: स्टालिन ने स्पष्ट किया कि तमिलनाडु का ऋण स्तर तय सीमा के भीतर है। उन्होंने आरोप लगाया कि विजय ’10 लाख करोड़’ का हौवा खड़ा कर जनता को गुमराह कर रहे हैं।
  3. अनुभव का पाठ: स्टालिन ने अपनी सरकार की उपलब्धियां गिनाते हुए कहा कि कोविड और केंद्र की उपेक्षा के बावजूद उन्होंने कल्याणकारी योजनाएं चलाईं। उन्होंने उम्मीद जताई कि विजय जल्द ही “वादों को निभाने के तौर-तरीके” सीख लेंगे।

स्टालिन ने अपनी प्रतिक्रिया के अंत में तीखा प्रहार करते हुए कहा कि विजय उन लोगों को धोखा न दें जिन्होंने उन्हें वोट दिया है। उन्होंने कहा, “मुद्दे को भटकाने की कोशिश न करें। आपने कहा था कि आप वही वादा करेंगे जो पूरा कर सकें, अब उसे निभाने का वक्त है।”

हालाँकि, इस तल्खी के बीच स्टालिन ने विजय को मुख्यमंत्री बनने पर शुभकामनाएं भी दीं और उम्मीद जताई कि तमिलनाडु की विकास यात्रा रुकनी नहीं चाहिए।

तमिलनाडु की राजनीति अब एक दिलचस्प मोड़ पर है। एक तरफ विजय अपनी ‘नई राजनीति’ के साथ जनहित के वादे पूरे करने के दबाव में हैं, तो दूसरी तरफ अनुभवी स्टालिन उन्हें आर्थिक मोर्चे पर घेरने की कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। अब देखना यह होगा कि मुख्यमंत्री विजय इन वित्तीय चुनौतियों से कैसे निपटते हैं।

Related Articles

Back to top button