नई किताब – “काशी”: अदृश्य शहर की आवाज़

काशी कोई साधारण शहर नहीं है। यह भारत की सभ्यतागत चेतना का धड़कता हुआ दिल है—जहाँ हिंदू, बौद्ध, जैन, सिख और इस्लामी परंपराओं ने सदियों से एक-दूसरे से गुँथकर एक अनोखी सांस्कृतिक विरासत रची है। मुस्लिम बुनकरों, संत कबीर और रविदास, प्रेमचंद और बिस्मिल्लाह खान जैसे सांस्कृतिक व्यक्तित्वों ने काशी की बहुलवादी आत्मा को आकार दिया। लेकिन आज यह बहुलवादी आत्मा सांप्रदायिकता और वाणिज्यीकरण की चपेट में है।

एक नई किताब काशी का ‘जन-कथा’ रूप प्रस्तुत करती है—इसकी परतदार इतिहास, आध्यात्मिक गहराई और उन अनगिनत लोगों की जिंदगी जो चुपचाप और साहस के साथ इस शहर को जीवित रखे हुए हैं। यह किताब महादेव की शिक्षाओं में निहित समावेशन, समानता और साझा मानवता के मूल्यों की पड़ताल करती है, जो काशी की सामूहिक स्मृति में सदियों से संरक्षित हैं।

लेकिन इस किताब की सबसे बड़ी खासियत उसकी आलोचना है। यह काशी की पवित्र छवि के नीचे छिपी हुई असमानताओं और बहिष्कार को बेनकाब करती है। लेखक दिखाते हैं कि कैसे काशी एक ‘अदृश्य शहर’ में बदलती जा रही है—जहाँ सफाई कर्मचारी सीवरों में दम घुटकर मर जाते हैं, विधवाएँ जर्जर आश्रमों में त्याग दी जाती हैं और असंख्य लोग बिना आवाज़ के इस शहर को चलाए रखते हैं।

दलित, मुस्लिम, विधवाएँ, सफाई कर्मचारी और बुनकर—ये वे लोग हैं जो काशी को दिन-रात संवारते हैं, लेकिन मुख्यधारा की कथाओं में उनकी उपस्थिति लगभग गायब है। किताब विशेष रूप से दलित महिलाओं, मुसहर माताओं और विधवाओं पर ध्यान केंद्रित करती है—वे तीनहरी बोझ (जाति, वर्ग और लिंग) तले दबी हुई महिलाएँ जो असंभव हालातों में भी जीवन को पालती और आगे बढ़ाती हैं। उनकी संघर्ष-गाथा ग्लोबल साउथ में हो रही गरीबी के स्त्रीकरण (feminisation of poverty) की दास्तान कहती है।

किताब बाजार की उस क्रूरता को भी उजागर करती है जो विरासत को मात्र तमाशा बना देती है। धार्मिक आस्था को वस्तु बनाकर बेचा जा रहा है, जबकि कारीगर और शिल्पकार अपने ही शहर से विस्थापित हो रहे हैं।

इस किताब के प्रेरणास्रोत

इस जन-कथा के केंद्र में हैं तीन समर्पित सामाजिक कार्यकर्ता और विचारक:

लेनिन रघुवंशी — एक प्रतिष्ठित आयुर्वेदिक चिकित्सक, जो पिछले कई दशकों से बंधुआ और बाल मजदूरों तथा अन्य वंचितों के अधिकारों के लिए संघर्षरत हैं। 1996 में अपनी पत्नी श्रुति के साथ उन्होंने पीपुल्स विजिलेंस कमिटी ऑन ह्यूमन राइट्स (PVCHR) की स्थापना की। यह संगठन रूढ़िवादी बस्तियों और गाँवों में व्याप्त बंद सामंती व्यवस्था को चुनौती देकर मानवाधिकारों का एक सक्रिय नेटवर्क खड़ा करने का काम करता है। अशोका फेलो रह चुके लेनिन संयुक्त राष्ट्र युवा संगठन (UNYO) उत्तर प्रदेश चैप्टर के पूर्व अध्यक्ष भी रहे हैं। वर्ष 2010 में जर्मनी के वीमार शहर की ओर से उन्हें अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। वर्तमान में वे दिल्ली स्थित इम्पैक्ट एंड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट (IMPRI) के ऑनरेरी विजिटिंग सीनियर फेलो हैं।

चंद्रा मिश्रा — ओडिशा राज्य रोजगार मिशन के मुख्य वास्तुकार और ‘एम्प्लॉयनॉमिक्स’ (Employonomics) के प्रवर्तक। ‘राइट टू वर्क’ और परिणामोन्मुखी रोजगार नीति के प्रबल समर्थक चंद्रा मिश्रा ने पाँच भारतीय राज्यों में ‘वोट फॉर एम्प्लॉयमेंट’ अभियान सफलतापूर्वक चलाया। वाराणसी में उन्होंने भिखारियों की निगम (Beggars Corporation) की स्थापना की, जिसका उद्देश्य भिखारियों को करदाता उद्यमियों में बदलना है। चंद्रा का मानना है कि मानव संसाधन अर्थव्यवस्था की नींव है और ‘हर कोई काम कर सकता है’।

श्रुति नागवंशी — पिछले तीन दशकों से न्याय और सम्मान की अटूट पैरोकार। पीपुल्स विजिलेंस कमिटी ऑन ह्यूमन राइट्स (PVCHR) की सह-संस्थापक और जन मित्र न्यास, वाराणसी की प्रबंध ट्रस्टी श्रुति नागवंशी दलित महिलाओं, बच्चों और वंचितों के अधिकारों के लिए निरंतर संघर्ष कर रही हैं। सामाजिक न्याय के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं।

यह किताब सिर्फ काशी का वर्णन नहीं है—यह एक आह्वान है। यह उन अदृश्य आवाज़ों को केंद्र में लाती है जो इस पवित्र शहर को सचमुच जीवित रखती हैं। काशी की सच्ची आत्मा उसके मंदिरों, घाटों या गलियों में नहीं, बल्कि उन लोगों के संघर्ष, साहस और उम्मीद में बसती है जो जाति, लिंग और वर्ग की दीवारों के बावजूद समावेशी और मानवीय मूल्यों को हर रोज़ जिंदा रखते हैं।

काशी को फिर से उसकी असली आवाज़ लौटाने का समय आ गया है—जहाँ हर व्यक्ति, चाहे वह कितना भी हाशिए पर हो, अपनी कहानी कह सके और सम्मान के साथ जी सके।

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