नेपाल की नई सरकार: न्याय का नाम, बदले की गंध?

डॉ उत्कर्ष सिन्हा

नेपाल में नई सरकार ने सत्ता संभालने के बाद जिस तरह से विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारियां शुरू कर एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सत्ता बदलने का मतलब सचमुच व्यवस्था बदलना होता है, या फिर बस कुर्सियों की अदला-बदली होती है।
पूर्व प्रधानमंत्री के. पी. शर्मा ओली की गिरफ्तारी के बाद सोशल मीडिया पर जो बहस छिड़ी है, वह सिर्फ एक राजनीतिक घटना की प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि जनता के भरोसे, गुस्से और अविश्वास का खुला प्रदर्शन है। यह बहस इस बात की गवाह है कि नेपाल में सत्ता अब केवल संसद या सड़क पर नहीं, बल्कि मोबाइल स्क्रीन पर भी जाँची जा रही है।
ओली की गिरफ्तारी को नई सरकार ने 2025 के Gen Z प्रदर्शनों में हुई मौतों से जुड़े एक गंभीर मामले की कानूनी कार्रवाई के रूप में पेश किया है।
लेकिन सोशल मीडिया पर यह कहानी इतनी सीधी नहीं है। एक बड़ा तबका इसे देर से आई सही, लेकिन जरूरी जवाबदेही मान रहा है। युवा यूज़र, छात्र, कार्यकर्ता और मानवाधिकार समर्थक लगातार यह लिख रहे हैं कि अगर सत्ता में रहे लोगों से सवाल नहीं पूछे जाएंगे, तो लोकतंत्र सिर्फ भाषणों का खेल बनकर रह जाएगा।
लेकिन यही सोशल मीडिया दूसरी तरफ एक और सच्चाई भी उगल रहा है। समर्थकों और आलोचकों का बड़ा समूह इसे न्याय नहीं, प्रतिशोध बता रहा है।
ओली ने खुद इस कार्रवाई को “प्रतिशोधात्मक” बताया है, और उनके शब्दों ने उनके समर्थकों में यह भावना और मजबूत कर दी है कि नई सरकार कानून से नहीं, राजनीतिक बदले की भावना से काम कर रही है। यही वह बिंदु है जहाँ मामला नैतिकता से निकलकर सत्ता की विश्वसनीयता पर आ जाता है। यदि सरकार हर विरोधी कदम को न्याय के नाम पर पेश करेगी, तो जनता बहुत जल्दी पूछेगी: क्या यह कानून है, या सिर्फ नया सत्ता-नाटक?
नेपाल का सोशल मीडिया आज किसी समाचार मंच से कम नहीं, बल्कि जनता की अदालत बन चुका है।
X, फेसबुक, टिकटॉक और इंस्टाग्राम पर चल रही बहसें यह तय कर रही हैं कि कौन जवाबदेह है, कौन पीड़ित है, और कौन सत्ता के दुरुपयोग में शामिल रहा। यही वजह है कि ओली की गिरफ्तारी पर प्रतिक्रियाएँ केवल राजनीतिक नहीं, भावनात्मक भी हैं। सितंबर 2025 के Gen Z प्रदर्शनों में जो गुस्सा फूटा था, वही अब डिजिटल रूप में लौट आया है।
युवा वर्ग के लिए यह मामला इसलिए भी व्यक्तिगत है क्योंकि वे उसे उस दौर की हिंसा, असुरक्षा और निराशा से जोड़कर देख रहे हैं, जब उनकी आवाज़ सुनने के बजाय दबाने की कोशिश की गई थी।
पर सवाल यह है कि क्या सिर्फ गिरफ्तारी से न्याय हो जाएगा? सोशल मीडिया पर यही सबसे तीखा सवाल बार-बार लौट रहा है। लोग यह भी देख रहे हैं कि क्या नई सरकार की कार्रवाई निष्पक्ष है, क्या जांच पारदर्शी है, क्या कानून सबके लिए समान रूप से लागू हो रहा है, या फिर यह भी उन्हीं पुराने सत्ता-संरचनाओं का नया संस्करण है, जिनमें विरोधी के लिए कानून सख्त और अपने लोगों के लिए नरम होता है। जनता अब सिर्फ गिरफ्तारी नहीं चाहती, वह प्रक्रिया चाहती है। वह चिल्लाए गए नारों से नहीं, ठोस जवाबों से संतुष्ट होगी।
असल में नेपाल की यह बहस सिर्फ ओली बनाम नई सरकार की नहीं है। यह उस पीढ़ी की बहस है जो सत्ता से डरती नहीं, सवाल करती है। यही वजह है कि सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा शेयर होने वाली पोस्टें वही हैं, जिनमें साफ कहा गया है कि लोकतंत्र का मतलब नेताओं की पूजा नहीं, उनकी जवाबदेही है। मगर उसी समय दूसरे लोग यह भी चेतावनी दे रहे हैं कि बदले की राजनीति लोकतंत्र को बचाती नहीं, कमजोर करती है। यह दोहरी बेचैनी ही नेपाल के डिजिटल माहौल की असली तस्वीर है। एक ओर न्याय की उम्मीद, दूसरी ओर सत्ता के दुरुपयोग का डर।
यह संकट नेपाल की राजनीतिक संस्कृति के लिए एक परीक्षा है। अगर नई सरकार इस मौके को केवल पुराने विरोधियों को निपटाने के औज़ार की तरह इस्तेमाल करती है, तो उसका नैतिक आधार कमजोर होगा।
सोशल मीडिया फिलहाल उस भरोसे को अभी भी पूरी तरह देने को तैयार नहीं दिखता। जनता ने बहुत कुछ देखा है, बहुत वादे सुने हैं, और बहुत बार निराशा झेली है। इसलिए इस बार उसकी प्रतिक्रिया अधिक तीखी, अधिक तेज और अधिक संदिग्ध है।
नेपाल की नई सरकार को समझना होगा कि आज की जनता को सिर्फ गिरफ्तारी नहीं, जवाब चाहिए। और सोशल मीडिया की दुनिया में जवाब देर से आता है तो शक पहले आता है। यही वजह है कि यह मामला अब एक नेता की गिरफ्तारी भर नहीं रह गया; यह जनता के भरोसे की अग्निपरीक्षा बन चुका है। अगर सत्ता सचमुच न्याय चाहती है, तो उसे यह साबित करना होगा कि कानून सब पर एक जैसा लागू होता है। वरना डिजिटल जनता बहुत जल्दी अपना फैसला सुना देगी — और वह फैसला राजनीतिक भाषणों से नहीं, भरोसे की कमी से लिखा जाएगा।


