कोविड-19 वैक्सीन के दुष्प्रभावों पर उठने लगे हैं गंभीर प्रश्न

संपादकीय

डा. उत्कर्ष सिन्हा
बीते कुछ दिनों से कोविड 19 के वैक्सीन के प्रभाव और दुष्प्रभावो पर चर्चा तेज होने लगी है, आम आदमी की समझ से दूर इस विषय पर मेडिकल साईंस और जीव विज्ञानियों के बीच भी अब एक बड़ी बहस शुरू हो चुकी है.
हाल के वर्षों में कोविड-19 महामारी ने पूरी दुनिया को बदल दिया।मान जाता है कि वैक्सीनेशन अभियान ने लाखों जानें बचाईं, लेकिन अब जब महामारी के बाद का दौर चल रहा है, तो कई प्रतिष्ठित वैज्ञानिक, शोधकर्ता और डॉक्टरों के लेख, बयान तथा साक्षात्कार सामने आ रहे हैं जो वैक्सीन की लंबे समय तक की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं। खासकर कैंसर (विशेष रूप से ‘टर्बो कैंसर’ या तेजी से बढ़ने वाले कैंसर) और रक्त में थक्के जमने (थ्रोम्बोसिस) की घटनाओं को लेकर ये चिंताएं तेज होने लगी हैं।
दक्षिण कोरिया की एक बड़ी जनसंख्या-आधारित स्टडी, ऑन्कोटारगेट जर्नल में प्रकाशित समीक्षा, और प्रसिद्ध जीवविज्ञानी डॉ. ब्रेट वेनस्टीन का हालिया इंटरव्यू – ये सब मिलकर एक चिंताजनक चित्र प्रस्तुत कर रहे हैं। यह लेख ऐसी तमाम स्टडीज , रिपोर्ट्स और वैज्ञानिको के पाडकास्ट को सुन कर तैयार किया गया है, जिसके भीतर कुछ अन्तर्निहित सवाल मौजूद है, जैसे क्या हमने पर्याप्त जांच के बिना अरबों लोगों को एक नई तकनीक वाली वैक्सीन दी? क्या पारदर्शिता की कमी ने संभावित जोखिमों को छुपाया?
सबसे पहले रक्त थक्कों की बात। कोविड-19 वैक्सीन, खासकर एडेनोवायरस वेक्टर वाली (जैसे एस्ट्राजेनेका और जॉनसन एंड जॉनसन) के बाद वैक्सीन-इंड्यूस्ड इम्यून थ्रोम्बोसाइटोपेनिया एंड थ्रोम्बोसिस (VITT) नामक दुर्लभ लेकिन जानलेवा स्थिति सामने आई। 2021-22 में हजारों मामलों की रिपोर्ट आई, जिसमें प्लेटलेट्स कम होने के साथ मस्तिष्क, पेट और फेफड़ों में असामान्य जगहों पर थक्के जमने लगे । न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में फरवरी 2026 की एक स्टडी ने इसका कारण स्पष्ट किया: एडेनोवायरस प्रोटीन और एक जेनेटिक म्यूटेशन (K31E) जो एंटीबॉडी को प्लेटलेट फैक्टर 4 (PF4) पर हमला करने के लिए उकसाता है। यह दुर्लभ है (लगभग 1 में 2 लाख), लेकिन वैक्सीनेशन के बाद 5-10 दिनों में होता है।
प्रतिष्ठित शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी कि संक्रमण का खतरा थक्के के खतरे से ज्यादा है, लेकिन वैक्सीन का दुष्प्रभाव भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 2024 की एक स्टडी में पाया गया कि वैक्सीनेशन के बाद ब्लड क्लॉट का रिस्क 1.13-1.23 गुना बढ़ जाता है, हालांकि संक्रमण से बचाव का फायदा यहाँ भी ज्यादा है। लेकिन समस्या यह है कि mRNA वैक्सीन (Pfizer, Moderna) में भी कुछ मामलों में पल्मोनरी एम्बोलिज्म के सिग्नल मिले। FDA और Medicare डेटा पर आधारित स्टडीज ने वृद्धों में कुछ बढ़ोत्तरी दिखाई दे रही है। डॉक्टरों के बयान जैसे कि ऑस्ट्रेलिया और कनाडा के हेमेटोलॉजिस्ट्स ने कहा कि VITT को पहले समझा नहीं गया था, और यह वैक्सीन की डिजाइन से जुड़ा है।
अब सबसे चिंताजनक – कैंसर का लिंक। हाल के दिनों में कई रिसर्च ने इसकी चर्चा बढ़ाई है। सितंबर 2025 में बायोमार्कर रिसर्च जर्नल में प्रकाशित दक्षिण कोरिया की स्टडी (Kim et al.) ने 84 लाख लोगों का डेटा विश्लेषित किया। वैक्सीनेशन के एक साल बाद थायरॉइड कैंसर का हेजार्ड रेशियो 1.35, गैस्ट्रिक 1.33, कोलोरेक्टल 1.28, लंग 1.53, ब्रेस्ट 1.19 और प्रोस्टेट 1.68 पाया गया। cDNA वैक्सीन से थायरॉइड, गैस्ट्रिक, कोलोरेक्टल, लंग और प्रोस्टेट; mRNA से थायरॉइड, कोलोरेक्टल, लंग और ब्रेस्ट कैंसर का रिस्क बढ़ा। स्टडी के लेखकों ने लिखा कि यह “एपिडेमियोलॉजिकल एसोसिएशन विदाउट कजुअल रिलेशनशिप” है, लेकिन उम्र, सेक्स और वैक्सीन टाइप के आधार पर एसोसिएशन स्पष्ट है। उन्होंने आगे रिसर्च की मांग की है ।
यह स्टडी अकेली नहीं। जनवरी 2026 में ऑन्कोटारगेट जर्नल में कुपरवासर और एल-डेयरी की समीक्षा ने 2020-2025 के 69 प्रकाशनों का विश्लेषण किया – जिसमे 333 मरीजों के केस रिपोर्ट्स शामिल की गई। हेमेटोलॉजिक मेलिग्नेंसी (नॉन-हॉजकिन लिम्फोमा, ल्यूकेमिया), ब्रेस्ट, लंग, मेलानोमा, सर्कोमा, पैंक्रियाटिक और ग्लियोब्लास्टोमा जैसे सॉलिड ट्यूमर, साथ ही वायरस-असोसिएटेड कैंसर (कापोसी, मर्केल सेल) आदि शामिल थे । इसके पैटर्न में असामान्य तेज प्रोग्रेशन, रेकरेंस या डॉर्मेंट ट्यूमर का एक्टिवेशन, वैक्सीन इंजेक्शन साइट या लिम्फ नोड्स में इन्वॉल्वमेंट देखा गया। लेखकों ने लिखा कि यह “अर्ली फेज ऑफ पोटेंशियल सेफ्टी सिग्नल डिटेक्शन” है। इम्यूनोलॉजिक लिंक – वैक्सीन या इंफेक्शन से इम्यून एस्केप या माइक्रोएनवायरनमेंट चेंज संभावित है ।
ये केस रिपोर्ट्स अकेले प्रमाण नहीं, लेकिन इतनी संख्या में (27 देशों से) और पॉपुलेशन-लेवल डेटा (इटली -3 लाख, कोरिया -84 लाख) के साथ चिंता बढ़ाती हैं। डॉ. एंगस डालग्लिश जैसे ऑन्कोलॉजिस्ट और अन्य रिसर्चर्स ने “टर्बो कैंसर” शब्द इस्तेमाल किया यानि युवाओं में आक्रामक, तेजी से फैलने वाले कैंसर जो पहले दुर्लभ थे। प्री-पैंडेमिक ट्रेंड्स (अंडर-50 कैंसर बढ़ोतरी 2000 से) को मानते हुए भी, वैक्सीनेशन के बाद का टाइमिंग और पैटर्न अलग है।
इन वैज्ञानिक रिसर्च के बीच डॉ. ब्रेट वेनस्टीन का जो रोगन एक्सपीरियंस #2408 (नवंबर 2025) इंटरव्यू सबसे तीखा है। प्रतिष्ठित जीवविज्ञानी डॉ. वेनस्टीन ने कहा कि ट्रायल्स में इस्तेमाल प्रोसेस 1 (क्लीन) और पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन के प्रोसेस 2 में अंतर था। प्रोसेस 2 में प्लास्मिड डीएनए कंटेमिनेशन और SV40 प्रमोटर (सिमियन वायरस 40) मौजूद था – जो 1960 के पोलियो वैक्सीन में कैंसर लिंक के लिए जाना जाता है। उन्होंने कहा, “यह मासिव कंटेमिनेशन है… SV40 प्रमोटर कार्सिनोजेनिक है।” वेनस्टीन ने दावा किया कि पब्लिक को दी गई वैक्सीन ट्रायल वाली से अलग थी, और यह DNA कंटेमिनेशन कैंसर रिस्क बढ़ा सकता है। उन्होंने mRNA वैक्सीन की रश्ड अप्रूवल, सेफ्टी टेस्टिंग की कमी और मैन्युफैक्चरिंग प्रोसेस की अपारदर्शिता पर हमला बोला। जो रोगन ने इसे “टेरिफाइंग” बताया है।
यह इंटरव्यू सिर्फ इकलौता नहीं है । mRNA तकनीक के इन्वेंटर डॉ. रॉबर्ट मेलोन, डॉ. पीटर मैककुलॉ और अन्य प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों ने भी DNA कंटेमिनेशन और स्पाइक प्रोटीन के लंबे समय के इफेक्ट्स (इम्यून सप्रेशन, ऑन्कोजेनिक पोटेंशियल) पर चिंता जताई है। डार्कहॉर्स पॉडकास्ट और अन्य प्लेटफॉर्म्स पर लेखों में इन विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई है ।
लेकिन मुख्यधारा की संस्थाएं जैसे CDC, WHO, Mayo Clinic आदि कहती हैं कि कोई मजबूत कजुअल लिंक नहीं स्थापित हो रहा है । हालाकि स्टडीज में “एसोसिएशन विदाउट कजुअल रिलेशनशिप” लिखा है – यानी और रिसर्च जरूरी। वैक्सीनेशन के बाद युवाओं में कैंसर डायग्नोसिस बढ़े, हेमेटोलॉजिक कैंसर के असामान्य केस आए, और VITT जैसी दुर्लभ लेकिन घातक स्थिति ने सैकड़ों जानें लीं।
यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि यह लेक किसी वैक्सीन-विरोधी अभियान का हिस्सा नहीं है । कोविड ने लाखों जाने ली और वैक्सीन ने जनता को बचाया। लेकिन यहाँ सवाल पारदर्शिता का है। क्या mRNA और डीएनए कंटेमिनेशन के लंबे प्रभाव (टेलोमियर, इम्यून सिस्टम, ऑन्कोजेनेसिस) पर पर्याप्त लॉन्ग-टर्म स्टडीज हुईं थी ? SV40 प्रमोटर का जेनेटिक इंटीग्रेशन कैंसर ट्रिगर कर सकता है यह लैब एनिमल्स में साबित हो चुका है । केस रिपोर्ट्स में वैक्सीन साइट पर ट्यूमर का होना क्या एक संयोग मात्र था ?
सबसे बड़ा आरोप लगते हुए डा. वेनस्टीन कहते हैं, “ट्रायल्स और पब्लिक वैक्सीन अलग थीं – यह फ्रॉड जैसा है।”
यह समय जांच का है। स्वतंत्र विशेषज्ञों द्वारा समीक्षा, लॉन्ग-टर्म डेटा, और पारदर्शी रिपोर्टिंग अब जरूरी हो गयी है । स्वास्थ्य हमारा अधिकार है, लेकिन जानकारी भी हमारा अधिकार है । अगर ये चिंताएं सही साबित हुईं, तो भविष्य की वैक्सीन पॉलिसी बदलनी होगी। अगर गलत है, तो भी सबूत सार्वजनिक करने चाहिए ।
कोविड वैक्सीन ने महामारी रोकी, लेकिन अब सच्चाई का सामना करने का समय है। यदि कैंसर और थक्कों की ऐसी रिपोर्ट्स आने लगी है तो उनकी अनदेखी नहीं की जा सकतीं। डॉ. वेनस्टीन, कोरियन स्टडी और केस समीक्षाएं हमें चेतावनी दे रही हैं – दरअसल यह और विस्तृत रिसर्च, फार्म कंपनियों की जवाबदेही और निर्णयों में सावधानी की मांग कर रही हैं।



