कांशीराम की विरासत पर बढ़ी राजनीतिक दिलचस्पी, दलित वोट बैंक को साधने की कोशिश

Kanshi Ram की राजनीतिक विरासत अब केवल Bahujan Samaj Party तक सीमित नहीं रह गई है। खासकर Uttar Pradesh की राजनीति में दलित मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए अन्य राजनीतिक दल भी कांशीराम के प्रति सम्मान प्रकट करने लगे हैं। उनके जन्मदिन पर अब केवल बसपा ही नहीं, बल्कि Indian National Congress, Samajwadi Party और Bharatiya Janata Party भी विभिन्न कार्यक्रमों के जरिए उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं और दलित समाज के लिए उनके योगदान को याद करते हैं।

हालांकि बसपा प्रमुख Mayawati का मानना है कि अन्य दल दलित समुदाय के साथ हमेशा छल करते रहे हैं और अब कांशीराम को केवल दलित वोटों के लालच में याद कर रहे हैं। दूसरी ओर अन्य दल इन आरोपों को खारिज करते हुए कांशीराम को पूरे समाज का नेता बताते हैं।

आंबेडकर के बाद बड़े दलित प्रतीक

भारतीय राजनीति में दलित वर्ग के सबसे बड़े नेता के रूप में B. R. Ambedkar का नाम लिया जाता है। पिछले कुछ दशकों में कांशीराम भी दलित समाज के बीच बेहद लोकप्रिय हुए। उन्होंने विभिन्न संगठनों के माध्यम से दलितों को जागरूक और संगठित किया तथा बसपा के जरिए बड़ी राजनीतिक ताकत खड़ी की।

उनकी रणनीति का असर यह रहा कि उत्तर प्रदेश में मायावती के नेतृत्व में न केवल गठबंधन सरकारें बनीं, बल्कि 2007 में बसपा ने पूर्ण बहुमत की सरकार भी बनाई। उस समय मायावती को प्रधानमंत्री पद तक के संभावित दावेदार के रूप में भी देखा जाने लगा था। हालांकि बाद के वर्षों में बसपा का राजनीतिक ग्राफ गिरता गया और 2022 के विधानसभा चुनाव तक पार्टी सिर्फ एक सीट पर सिमट गई, जबकि लोकसभा में उसका प्रतिनिधित्व शून्य रह गया।

बहुजन राजनीति को दिया नया आयाम

कांशीराम ने दलित राजनीति को केवल सामाजिक आंदोलन तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे राजनीतिक शक्ति में बदलने की रणनीति अपनाई। जहां आंबेडकर ने दलित आंदोलन को वैचारिक आधार दिया, वहीं कांशीराम को उस विचार को संगठन और सत्ता तक पहुंचाने वाले रणनीतिकार के रूप में देखा जाता है।

उन्होंने BAMCEF, Dalit Shoshit Samaj Sangharsh Samiti और बाद में बहुजन समाज पार्टी के माध्यम से बहुजन राजनीति को केंद्र में लाने का प्रयास किया। उनका प्रसिद्ध नारा “जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी” बहुजन आंदोलन का मुख्य आधार बना।

मायावती को बनाया राजनीतिक वारिस

कांशीराम ने मायावती को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी बनाया और उन्हें एक मजबूत नेता के रूप में स्थापित किया। 1995 में मायावती पहली बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं, जिसे दलित राजनीति की ऐतिहासिक उपलब्धि माना गया। बाद में वे चार बार राज्य की मुख्यमंत्री रहीं।

बसपा के कमजोर होने से बढ़ी विरासत की होड़

2014 के बाद से बसपा का राजनीतिक प्रभाव लगातार कम होता गया। 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों तथा 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों में पार्टी को लगातार झटके लगे। इसके बाद से अन्य दलों के बीच बसपा के पारंपरिक दलित वोट बैंक को अपनी ओर आकर्षित करने की प्रतिस्पर्धा तेज हो गई है।

इसी वजह से कांशीराम की विरासत पर दावेदारी भी बढ़ती जा रही है। उत्तर भारत की राजनीति में दलित वोट निर्णायक भूमिका निभाते हैं और कांशीराम को केवल दलित नेता ही नहीं, बल्कि बहुजन यानी दलित, पिछड़े, आदिवासी और अल्पसंख्यकों की साझा राजनीतिक पहचान बनाने वाले नेता के रूप में देखा जाता है।

इसी कारण आज Samajwadi Party उन्हें बहुजन-समाजवादी परंपरा से जोड़ने की कोशिश कर रही है, Indian National Congress सामाजिक न्याय की राजनीति के संदर्भ में उनका उल्लेख कर रही है, जबकि Bharatiya Janata Party भी दलित प्रतीकों को राष्ट्रीय सम्मान देने की अपनी रणनीति के तहत कांशीराम को प्रमुख स्थान देने लगी है।

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