जुबिली न्यूज डेस्क
नई दिल्ली। यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) के नए नियमों को लेकर जारी विवाद अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। शीर्ष अदालत ने इन नियमों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति जता दी है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि नए रेगुलेशन में जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा गैर-समावेशी है और यह कुछ वर्गों को सुरक्षा के दायरे से बाहर कर देती है।

सामान्य वर्ग के खिलाफ भेदभाव की आशंका
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने एक वकील की दलीलों पर गौर किया। याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया— “इस रेगुलेशन से सामान्य वर्ग के खिलाफ भेदभाव की संभावना बनती है। मेरा मामला ‘राहुल दीवान और अन्य बनाम भारत संघ’ है।”
इस पर CJI सूर्यकांत ने टिप्पणी करते हुए कहा— “हमें पता है कि क्या हो रहा है। सुनिश्चित करें कि कमियां दूर की जाएं, हम इस मामले को सूचीबद्ध करेंगे।”
इक्विटी कमेटियों को लेकर विवाद
UGC द्वारा 13 जनवरी 2026 को जारी किए गए इन नए नियमों के तहत सभी उच्च शिक्षा संस्थानों को ‘इक्विटी कमेटी’ गठित करने का निर्देश दिया गया है। इन कमेटियों का उद्देश्य संस्थानों में भेदभाव की शिकायतों का निपटारा करना और समानता को बढ़ावा देना बताया गया है। हालांकि, इन्हीं कमेटियों की संरचना को लेकर सबसे अधिक विवाद खड़ा हो गया है।
जनरल कैटेगरी के लिए जगह नहीं
UGC रेगुलेशन 2026 के अनुसार, इक्विटी कमेटियों में
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अनुसूचित जाति (SC)
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अनुसूचित जनजाति (ST)
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अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC)
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दिव्यांग व्यक्ति
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महिलाएं
को शामिल करना अनिवार्य है। याचिका में दावा किया गया है कि सामान्य वर्ग के प्रतिनिधियों के लिए कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है, जबकि जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा को केवल SC, ST और OBC तक सीमित कर दिया गया है।
सरकार भी कर रही मंथन
UGC के नए नियमों को लेकर देशभर में विरोध तेज होता जा रहा है। हालात को देखते हुए केंद्र सरकार ने भी इस मुद्दे पर मंथन शुरू कर दिया है। सूत्रों के मुताबिक सरकार विशेषज्ञों और कानूनी जानकारों से परामर्श कर रही है और नियमों में संभावित बदलाव पर भी विचार किया जा रहा है।
दिलचस्प बात यह है कि विरोध सिर्फ विपक्ष तक सीमित नहीं है, बल्कि कई बीजेपी नेता भी इन नियमों पर सवाल उठा चुके हैं। सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक स्वर्ण समुदाय की ओर से विरोध प्रदर्शन जारी हैं।
अब सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट की आगामी सुनवाई पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि UGC के ये नियम संवैधानिक कसौटी पर कितने खरे उतरते हैं।
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