जुबिली न्यूज डेस्क
नई दिल्ली: दुनिया की आर्थिक और व्यापारिक राजनीति में तेज़ बदलाव देखने को मिल रहा है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की संरक्षणवादी नीतियों, ऊंचे टैरिफ और अनिश्चित व्यापार रुख के चलते अब कई बड़े देश अमेरिका पर अपनी निर्भरता कम करने की रणनीति अपना रहे हैं। इस बदलते वैश्विक समीकरण के केंद्र में भारत एक मजबूत, स्थिर और भरोसेमंद आर्थिक साझेदार के रूप में उभरकर सामने आया है।

यूरोप, एशिया और उत्तरी अमेरिका के कई देश अब पारंपरिक वेस्ट-सेंट्रिक मॉडल से हटकर पश्चिम-पूर्व आर्थिक धुरी (West-East Economic Axis) की ओर बढ़ रहे हैं, जहां भारत को दीर्घकालिक विकल्प और रणनीतिक संतुलन के रूप में देखा जा रहा है।
कीर स्टारमर का चीन दौरा क्यों अहम?
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर का प्रस्तावित चीन दौरा इस वैश्विक बदलाव का बड़ा संकेत माना जा रहा है। पिछले 8 वर्षों में यह किसी ब्रिटिश प्रधानमंत्री की पहली चीन यात्रा होगी।
इस दौरे का उद्देश्य चीन के साथ बिगड़े रिश्तों को सुधारना और व्यापारिक सहयोग को फिर से मज़बूत करना है।
स्टारमर के साथ वरिष्ठ मंत्री और बड़े कारोबारी प्रतिनिधिमंडल भी होंगे। बीजिंग में उनकी मुलाकात राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री ली कियांग से होगी, जबकि शंघाई में कई व्यापारिक बैठकें प्रस्तावित हैं।
रॉयटर्स के मुताबिक, ब्रिटेन अब अमेरिका को एक अनिश्चित व्यापारिक साझेदार के रूप में देख रहा है। फिलहाल चीन ब्रिटेन का चौथा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और 2025 के मध्य तक दोनों देशों का द्विपक्षीय व्यापार 100 अरब पाउंड के पार पहुंच चुका है।
भारत बना प्राथमिक व्यापारिक साझेदार
अमेरिका का करीबी सहयोगी रहा कनाडा भी अब अपनी विदेश और व्यापार नीति में बड़ा बदलाव कर रहा है।
कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी मार्च के पहले सप्ताह में भारत दौरे की तैयारी कर रहे हैं।
यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब डोनाल्ड ट्रंप ने कनाडा पर भारी टैरिफ लगाने की धमकी दी थी और उसे “51वां अमेरिकी राज्य” कहकर विवाद खड़ा किया था।
कनाडा की विदेश मंत्री अनिता आनंद ने दावोस में साफ कहा कि कनाडा कभी भी अमेरिका का हिस्सा नहीं बनेगा। उन्होंने यह भी ऐलान किया कि कनाडा अगले 10 वर्षों में अमेरिका के बाहर अपने निर्यात को दोगुना करना चाहता है।
इस रणनीति में भारत और चीन को प्रमुख साझेदार बनाया गया है।
ब्राज़ील को भी भारत पर भरोसा
ग्लोबल साउथ के देशों में भारत की भूमिका लगातार मज़बूत होती जा रही है। ब्राज़ील के राष्ट्रपति लुइज़ इनासियो लूला दा सिल्वा फरवरी में भारत दौरे पर आ रहे हैं। वे एक बड़े कारोबारी प्रतिनिधिमंडल के साथ भारतीय उद्योगपतियों से मुलाकात करेंगे।
यह दौरा दिखाता है कि विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाएं अब भारत को सिर्फ एक बड़ा बाजार नहीं, बल्कि रणनीतिक आर्थिक साझेदार मान रही हैं।
India-EU FTA: गेमचेंजर डील
इस वैश्विक बदलाव का सबसे बड़ा उदाहरण भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता (India-EU FTA) है, जिस पर 26 जनवरी 2026 को हस्ताक्षर हुए।
यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने इसे “Mother of All Deals” बताया है।
यह समझौता दुनिया की लगभग 25% ग्लोबल GDP और करीब 2 अरब लोगों को जोड़ता है।
FTA के बड़े फायदे:
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EU भारत को भेजे जाने वाले 97% उत्पादों पर टैरिफ घटाएगा या खत्म करेगा
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भारत चरणबद्ध तरीके से 93% यूरोपीय उत्पादों पर टैरिफ हटाएगा
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भारत में यूरोपीय कारें, वाइन, चॉकलेट और प्रोसेस्ड फूड सस्ते होंगे
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भारतीय टेक्सटाइल, फार्मा, इंजीनियरिंग और IT सेक्टर को यूरोप में बड़ा बाजार मिलेगा
रणनीतिक स्वायत्तता पर जोर
इन नए वैश्विक गठबंधनों से अमेरिका असहज दिखाई दे रहा है। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने भारत द्वारा रूस से तेल खरीद पर सवाल उठाए, वहीं कनाडा को चीन के सस्ते सामान को लेकर चेतावनी दी गई।
इसके बावजूद देशों का रुख साफ है—वे अब रणनीतिक स्वायत्तता चाहते हैं और किसी एक महाशक्ति पर निर्भर नहीं रहना चाहते।
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भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने साफ शब्दों में कहा है कि कोई भी देश यह उम्मीद नहीं कर सकता कि वह भारत के वैश्विक रिश्तों पर वीटो लगाए।
आज भारत केवल उभरती अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक आर्थिक व्यवस्था का केंद्रबिंदु बन चुका है। अमेरिका-केंद्रित मॉडल से हटकर दुनिया अब भारत को एक स्थिर, संतुलित और दीर्घकालिक साझेदार के रूप में देख रही है।
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