प्रो. अशोक कुमार
जब मैंने”शिक्षा प्रदूषण” (Education Pollution) जैसे गंभीर विषयों पर अपनी अंतर्दृष्टि साझा की तो उम्मीद थी कि समाज के प्रबुद्ध वर्ग और हितधारक (stakeholders) उस पर सार्थक चर्चा करेंगे।
लेकिन सोशल मीडिया का वर्तमान ढांचा और मनोविज्ञान कुछ ऐसा हो गया है कि गंभीर लेखन अक्सर “मौन” रह जाता है। मेरे विचार से इसके विभिन्न मुख्य कारण हैं:
- एल्गोरिदम की मार (The Algorithm Barrier)
फेसबुक और ट्विटर जैसे प्लेटफॉर्म्स के एल्गोरिदम अब केवल उसी सामग्री को आगे बढ़ाते हैं जो “विवादास्पद” हो या “मनोरंजक” (Short-form content)।
लंबा लेख बनाम फोटो: एल्गोरिदम लंबे लेखों की तुलना में तस्वीरों या छोटे वीडियो को प्राथमिकता देता है। आपका गहरा विश्लेषण “रीडिंग टाइम” मांगता है, जबकि औसत यूजर केवल 2-3 सेकंड में स्क्रॉल कर देता है।
- हितधारकों की “चुप्पी” (Fear of Reaction)
शिक्षा विभाग के अधिकारी, शिक्षक या अन्य सरकारी स्टेकहोल्डर्स अक्सर सार्वजनिक रूप से प्रतिक्रिया देने से बचते हैं।
नौकरी और अनुशासन का डर: कई सरकारी कर्मचारी सोशल मीडिया गाइडलाइंस (CCS Conduct Rules) के कारण नीतिगत विषयों पर पक्ष या विपक्ष में कुछ भी लिखने से डरते हैं कि कहीं इसे अनुशासनहीनता” न मान लिया जाए।
बौद्धिक मेहनत से बचना: गंभीर विषय पर प्रतिक्रिया देने के लिए उसे गहराई से पढ़ना और सोचना पड़ता है। आजकल अधिकांश लोग “Like” या “Share” करके अपनी जिम्मेदारी खत्म मान लेते हैं।
- “इको चैंबर” और ध्रुवीकरण (Polarization)
आजकल लोग केवल वही सुनना या पढ़ना चाहते हैं जो उनके अपने विचारों की पुष्टि करे।
यदि कोई लेख निष्पक्ष है और व्यवस्था की कमियों को उजागर करता है, तो लोग उसे साझा करने से कतराते हैं क्योंकि वे किसी एक पक्ष (राजनीतिक या संस्थागत) के साथ खड़े दिखने का जोखिम नहीं लेना चाहते।
- ध्यान की कमी (Short Attention Span)
डिजिटल युग में Attention Economy चल रही है। लोग गंभीर नीतिगत विमर्श (Policy Discourse) के बजाय सतही खबरों पर तुरंत प्रतिक्रिया देते हैं।
मेरे द्वारा उठाए गए “Medical Fees” या “Zero Percentile” जैसे मुद्दे जटिल हैं, जिन्हें समझने के लिए धैर्य चाहिए, जिसका सोशल मीडिया पर अभाव है।
(लेखक पूर्व कुलपति कानपूर एवं गोरखपुर विश्वविद्यालय हैं )
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