- अमेरिका-ईरान तनाव: ट्रंप के संकेतों पर सेना की चेतावनी
- इतिहास ने फिर दिलाई 1971 की याद
जुबिली स्पेशल डेस्क
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप खुले तौर पर ईरान में जारी विरोध प्रदर्शनों के समर्थन के संकेत दे रहे हैं, लेकिन अमेरिकी सैन्य नेतृत्व इस मुद्दे पर बेहद सतर्क रुख अपनाए हुए है।
वाशिंगटन में चर्चा इस बात पर नहीं है कि अमेरिका कोई कदम उठाएगा या नहीं, बल्कि इस पर है कि कार्रवाई कब और कितनी सीमित या व्यापक होगी। इसी बीच ट्रंप को अमेरिकी सेना की ओर से ऐसा ही जवाब मिला है, जैसा कभी 1971 में जनरल सैम मानेकशॉ ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को दिया था, जल्दबाजी खतरनाक हो सकती है।
प्रदर्शनकारियों के समर्थन का फैसला, लेकिन समय तय नहीं
यरुशलम पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान की सड़कों पर उतरे प्रदर्शनकारियों का समर्थन करने का मन बना लिया है।
हालांकि यह मदद किस रूप में होगी और कब दी जाएगी, इस पर अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है। सूत्रों के मुताबिक बीते कुछ दिनों से ट्रंप प्रशासन के भीतर लगातार उच्चस्तरीय बैठकों का दौर जारी है।
प्रशासन यह मान चुका है कि अमेरिका ईरानी प्रदर्शनकारियों के साथ खड़ा होगा, लेकिन रणनीति और टाइमिंग को लेकर असमंजस बना हुआ है।

ईरान में अमेरिका के विकल्प क्या हैं?
शनिवार को ट्रंप ने सोशल मीडिया पर लिखा कि ईरान आज़ादी की ओर बढ़ रहा है और अमेरिका मदद के लिए तैयार है। इसके बाद वॉशिंगटन में चर्चाएं तेज हो गईं।
इन बैठकों में सीधे सैन्य कार्रवाई से लेकर साइबर हमले, इंटरनेट सपोर्ट और स्टारलिंक जैसी सैटेलाइट सेवाएं उपलब्ध कराने तक कई विकल्पों पर विचार हुआ है।
सूत्रों का कहना है कि ट्रंप प्रशासन को नहीं लगता कि ईरानी शासन तुरंत गिरने वाला है, लेकिन बीते एक हफ्ते में ऐसे संकेत जरूर मिले हैं जो पहले नहीं दिखे थे। इंटरनेट ब्लैकआउट, भारी संख्या में प्रदर्शनकारी और सुरक्षा बलों की सख्त कार्रवाई ने अमेरिका को दोबारा रणनीति पर सोचने के लिए मजबूर कर दिया है।
इजरायल का रुख: पर्दे के पीछे तैयारी
रिपोर्ट के मुताबिक प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई में 500 से अधिक लोगों की मौत की खबरों ने भी ट्रंप प्रशासन पर दबाव बढ़ा दिया है। पहले अमेरिका को नहीं लगता था कि हालात इतने बिगड़ चुके हैं।
इसी बीच इजरायल ने भी ईरान की स्थिति को लेकर हाई-लेवल बैठक की है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने मंत्रियों और सुरक्षा अधिकारियों के साथ फैसला लिया कि इजरायल सार्वजनिक तौर पर हस्तक्षेप नहीं करेगा और अमेरिका को आगे बढ़ने देगा। साथ ही यह भी तय किया गया कि यदि ईरान ध्यान भटकाने के लिए मिसाइल हमला करता है तो पूरी सैन्य तैयारी रखी जाएगी।
1971 की गूंज: सेना ने क्यों रोका ट्रंप को?
ब्रिटिश अखबार द टेलीग्राफ के मुताबिक अमेरिकी रक्षा अधिकारियों ने ट्रंप को ईरान पर हमले की जल्दबाजी को लेकर आगाह किया है।
यह स्थिति 1971 की याद दिलाती है, जब इंदिरा गांधी पूर्वी पाकिस्तान में तुरंत सैन्य कार्रवाई चाहती थीं, लेकिन जनरल सैम मानेकशॉ ने सेना की तैयारी पूरी न होने का हवाला देकर समय मांगा था। बाद में सही समय पर भारत की कार्रवाई से बांग्लादेश एक स्वतंत्र देश बना।
रिपोर्ट के अनुसार ट्रंप भी ईरान में त्वरित कार्रवाई के पक्ष में हैं, लेकिन अमेरिकी सेना ने चेताया है कि बिना पूरी तैयारी के कोई भी सैन्य कदम ईरान की कड़ी जवाबी कार्रवाई को न्योता दे सकता है, जिससे अमेरिकी ठिकानों को भारी नुकसान हो सकता है।
ट्रंप को कथित तौर पर तेहरान में गैर-सैन्य ठिकानों और सुरक्षा एजेंसियों के शीर्ष अधिकारियों को निशाना बनाने जैसे विकल्पों पर भी ब्रीफ किया गया है।
हालांकि अमेरिका के भीतर इस पर मतभेद हैं। कुछ सांसदों का मानना है कि सैन्य हमला उल्टा असर डाल सकता है और ईरानी जनता को सरकार के पक्ष में खड़ा कर देगा। वहीं, कुछ नेता चाहते हैं कि ट्रंप खुलकर प्रदर्शनकारियों को समर्थन दें और शासन पर दबाव बढ़ाएं।
उधर ईरान ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि अगर अमेरिका ने हमला किया, तो अमेरिकी सैन्य ठिकानों को सीधे निशाना बनाया जाएगा।
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