बांग्लादेश : जमात का पुनरुत्थान, हिंदू उत्पीड़न और भारतीय मीडिया का खतरनाक खेल

डा. उत्कर्ष सिन्हा

बांग्लादेश में जमात-ए-इस्लामी की बढ़ती ताकत और हिंदुओं के खिलाफ हिंसा के सिलसिले ने भारत-बांग्लादेश संबंधों को नाजुक मोड़ दिया है। भारतीय टीवी मीडिया का सांप्रदायिक रंग वाली कवरेज इस तनाव को और गहरा रहा है, जो कूटनीति के मोर्चे पर नुकसानदेह साबित हो रहा है। इस संदर्भ में दोनों पक्षों के बीच संवादहीनता और आपसी अविश्वास के बीच संबंध सुधारने के रास्ते तलाशना आवश्यक है।​

जमात की उभरती ताकत

जमात-ए-इस्लामी की बांग्लादेश में बढ़ती ताकत शेख हसीना सरकार के पतन के बाद की राजनीतिक शून्यता और विभिन्न सामाजिक-आर्थिक कारकों का परिणाम है।बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद जमात-ए-इस्लामी ने तेजी से राजनीतिक जमीन हासिल की है। 2024 के अगस्त से शुरू हुए बदलावों में अंतरिम सरकार ने जमात पर लगे प्रतिबंध हटा दिए, जिसके फलस्वरूप यह पार्टी अब राष्ट्रीय नागरिक पार्टी (एनसीपी) और लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी (एलडीपी) जैसे दलों के साथ गठबंधन बना चुकी है।

फरवरी 2026 के संसदीय चुनावों से पहले जमात ने 10 दलों का गठजोड़ तैयार किया है, जिसमें छात्र आंदोलन से जुड़े समूह भी शामिल हैं, जो इसकी बढ़ती प्रभावशालीता दर्शाता है। पाकिस्तान की आईएसआई द्वारा कथित समर्थन और चीन, तुर्की जैसे देशों के राजदूतों के जमात नेताओं से संपर्क ने इसे अंतरराष्ट्रीय पटल पर भी मजबूत बनाया है।

यह सब 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान जमात के पाकिस्तान समर्थन वाले इतिहास के बावजूद हो रहा है, जो बांग्लादेश की लोकतांत्रिक संरचना के लिए खतरा पैदा कर रहा है।​

क्यों बढ़ रही है जमात की ताकत

हालिया दिनों में कवामी मदरसे की संख्या बढ़ी है , जो राज्य नियंत्रण से बाहर हैं और धार्मिक कट्टरता फैला रहे है । पाठ्यक्रम से धर्मनिरपेक्षता हटी और सोशल मीडिया के जरिये इस्लामी नैरेटिव फैलाए गए । हिफाजत-ए-इस्लाम के साथ गठजोड़ ने युवाओं और महिलाओं में आधार बढ़ाया।​

इसके साथ ही जमात इस्लामी बैंक और 14 अन्य ग्रामीण बैंकों पर नियंत्रित करती है, जो आर्थिक प्रभाव बनाता है। सामाजिक संस्थाओं का नेटवर्क ग्रामीण क्षेत्रों में मजबूत है।

अल्पसंख्यकों पर हिंसा का सिलसिला

हाल के महीनों में बांग्लादेश में हिंदू समुदाय के खिलाफ हिंसा की घटनाएं बढ़ी हैं, जो चिंताजनक हैं। दिसंबर 2025 से जनवरी 2026 के बीच चार हिंदू पुरुषों की हत्या हुई, जिनमें एक को ईशनिंदा के आरोप में भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला और उसके शव को जला दिया। चटगांव और पिरोजपुर में हिंदू घरों पर आगजनी की खबरें आईं, जबकि सरकार ने 88 हिंसा की घटनाओं को स्वीकार किया है।

ये हमले धार्मिक कट्टरपंथ से प्रेरित लगते हैं, जिनमे कुछ राजनीतिक प्रतिशोध से भी जुड़े हैं। हिंदू-बौद्ध-ईसाई एकता परिषद ने पूरे देश में हमलों की पुष्टि की है, जो अल्पसंख्यकों में भय का माहौल बना रहा है। सरकार ने गिरफ्तारियां कीं, लेकिन ये घटनाएं चुनावों से पहले तनाव बढ़ा रही हैं।​​

मीडिया की सांप्रदायिक प्रस्तुति

भारतीय टीवी मीडिया ने इन घटनाओं को सांप्रदायिक रंग देकर प्रस्तुत किया है, जो अतिरंजित और भ्रामक रहा। इंडिया टीवी और टाइम्स नाउ जैसे चैनलों ने ‘हिंदुओं पर जिहाद’ जैसे शीर्षकों से खबरें चलाईं, जबकि कई वीडियो मुस्लिम घरों पर हमलों के थे। अलीगढ़ मीडिया ने इसे ‘बांग्लादेश में हिंदू नरसंहार’ बताया, जो तथ्यों से परे था।

बांग्लादेशी स्रोतों के अनुसार, अधिकांश हमले हसीना समर्थक हिंदुओं पर राजनीतिक थे, न कि धार्मिक। फिर भी, भारतीय मीडिया ने इसे साम्प्रदायिक बना दिया, जो भाजपा की घरेलू राजनीति को फायदा पहुंचा रहा है। इससे बांग्लादेश में एंटी-इंडिया भावना भड़की, जहां अंतरिम सरकार ने भारतीय मीडिया को ‘मिसइनफॉर्मेशन’ का आरोप लगाया।​

कूटनीतिक नुकसान 

भारतीय टीवी का यह कवरेज कूटनीति को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। बांग्लादेश ने भारतीय मीडिया की आलोचना करते हुए ‘दोहरी नैतिकता’ का आरोप लगाया और अल्पसंख्यक सुरक्षा पर भारत के बयानों को खारिज किया। इससे द्विपक्षीय संबंधों में अविश्वास बढ़ा, जैसे कि बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड ने 2026 टी20 वर्ल्ड कप के लिए भारत यात्रा से इनकार कर दिया। शेख हसीना को भारत में शरण देने से पहले ही तनाव था, अब मीडिया ने इसे ईंधन दे दिया। बांग्लादेशी विदेश मंत्रालय ने भारतीय दूतावास पर हमलों को मीडिया प्रचार से जोड़ा। नतीजतन, सीमा विवाद, पानी बंटवारा और व्यापार जैसे मुद्दे ठप हो गए हैं। यह पाकिस्तान और चीन को फायदा पहुंचा रहा, जो जमात को समर्थन दे रहे हैं।​

सहयोग या परस्पर लाभ?

जमात और भारतीय मीडिया के बीच प्रत्यक्ष सांठगांठ का कोई प्रमाण नहीं हो सकता , लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से दोनों पक्ष लाभान्वित हो रहे हैं। जमात को भारतीय मीडिया अतिरंजित  एंटी-इंडिया कार्ड देता है, जो चुनावों में उसे वोट जुटाने में मदद कर रहा  है। वहीं, भारतीय चैनल इसे घरेलू दर्शकों के लिए ‘हिंदू खतरे’ की कहानी बनाकर टीआरपी बटोरते हैं। और साथ ही भारत के सत्ताधारी दल के समर्थको को बिखरने से रोकते हैं ।

बांग्लादेशी प्रेस ने इसे ‘मीडिया मिसइनफॉर्मेशन नेक्सस’ कहा है , जो संबंधों को तोड़ रहा है। दोनों पक्षों की यह रणनीति बांग्लादेश की स्थिरता और भारत की पड़ोसी नीति को नुकसान पहुंचा रही। वास्तव में, यह एक खतरनाक चक्र है जहां मीडिया जमात की विचारधारा को अप्रत्यक्ष बढ़ावा दे रहा।

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