Saturday - 29 November 2025 - 3:07 PM

पाकिस्तान: सत्ता, सेना और विखंडन की आहट

डा. उत्कर्ष सिन्हा

अपने दागदार अतीत की परछाइयों में घिरा पाकिस्तान अब उस मोड़ पर पहुँचने लगा है जहाँ से विखंडन का रास्ता उसका इंतजार कर रहा है । यह निसंदेह पाकिस्तान के इतिहास का सबसे संवेदनशील और अनिश्चित दौर है।

राजनीतिक सत्ता, जनता का विश्वास और देश की संवैधानिक संरचना—तीनों पर गहरा संकट मंडरा रहा है। जिस देश की नींव कभी ‘इस्लामिक एकता’ और ‘राष्ट्र की सुरक्षा’ के नाम पर रखी गई थी, आज वही देश अपने भीतर बिखराव और अस्थिरता के चरम पर खड़ा है। इमरान खान, जो कभी ‘नया पाकिस्तान’ के प्रतीक माने जाते थे, आज जेल की दीवारों के पीछे हैं, और उनकी गिरफ्तारी ने पाकिस्तान की लोकतांत्रिक साख को लगभग समाप्त कर दिया है। एक ओर जनता सड़कों पर उतरकर उन्हें ‘जन नेता’ मानती है, वहीं दूसरी ओर, सेना और खुफिया तंत्र उन्हें ‘राज्य विरोधी खलनायक’ के रूप में पेश कर रहे हैं।​​

इमरान का उदय और सेना से टकराव

इमरान खान का उदय पाकिस्तान की राजनीति में एक जन-लहर के रूप में हुआ था। वे भ्रष्टाचार, वंशवाद और बाहरी प्रभावों से आजाद शासन की बात करते थे। उनके समर्थक उन्हें पाकिस्तान का ‘आधुनिक सुहावी क्रांतिकारी’ मानते थे। किंतु जिस सेना ने उन्हें सत्ता की सीढ़ियाँ दीं, उसी ने उन्हें धकेलकर नीचे गिरा दिया। पाकिस्तान का इतिहास बताता है कि यहां कोई भी प्रधानमंत्री तब तक कुर्सी पर नहीं टिका जब तक सेना से उसका सीधा तालमेल न रहा हो। इमरान खान ने जब सेना की नीतियों पर सवाल उठाने शुरू किए, खासकर असीम मुनीर जैसे शीर्ष जनरलों की भूमिका पर उंगली रखी, तब से उनकी राजनीतिक समाप्ति तय हो गई थी। 9 मई 2023 को इमरान की गिरफ्तारी के बाद हुए प्रदर्शनों को पाकिस्तानी सेना ने “देश के इतिहास का काला अध्याय” करार दिया और कहा कि “planners, executors और facilitators के साथ कोई समझौता नहीं होगा”।​

असीम मुनीर का आत्मघाती रवैया

जनरल असीम मुनीर की भूमिका ने आज पाकिस्तान के भविष्य पर गहरी छाया डाल दी है। वे न केवल सेना प्रमुख हैं, बल्कि व्यवहारतः देश के ‘वास्तविक शासक’ भी बन चुके हैं। उनके कदमों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पाकिस्तान में लोकतंत्र केवल एक आवरण है, असली शक्ति अब भी ‘रावलपिंडी की बारूद गंध’ में बसती है। असीम मुनीर ने 9 मई की हिंसा पर बयान देते हुए कहा था कि वे “इस बर्बरता को अंजाम देने वालों, योजनाकारों और उकसाने वालों को नहीं छोड़ेंगे”। उनके कार्यकाल में सेना ने सीधे तौर पर मीडिया, न्यायपालिका और सियासी दलों को नियंत्रित करने की रणनीति अपनाई है। पत्रकारों पर दमन, विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी और न्यायिक निर्णयों में सैन्य हस्तक्षेप ने पाकिस्तान की लोकतांत्रिक संस्थाओं को बुरी तरह खोखला कर दिया है।​

शहबाज शरीफ की सरकार इस समय पूरी तरह से सैन्य तंत्र की कठपुतली बन चुकी है। जनता समझ चुकी है कि प्रधानमंत्री भवन में बैठा शासक केवल आदेश पालन करने वाला ‘नियंत्रित प्रशासक’ है, जिसके पास नीति-निर्माण या सुधार का कोई अधिकार नहीं है। इमरान की गिरफ्तारी के बाद हुए हिंसक प्रदर्शनों पर शाहबाज शरीफ ने इन्हें “आतंकवाद का कृत्य” बताया और कहा कि “प्रदर्शनकारियों के साथ लोहे के मुट्ठी से निपटा जाएगा”। आर्थिक संकट, महंगाई और बेरोजगारी पर किसी ठोस कदम की जगह सरकार सेना के आदेशों पर राजनीतिक प्रतिशोध में लगी है। शाहबाज ने संसद में यह भी घोषणा की कि इमरान समर्थकों को सैन्य अदालतों में ट्रायल किया जाएगा, जो नागरिक शासन के सैन्यकरण को उजागर करता है।​

पाकिस्तान की जनता, जो कभी सेना को राष्ट्रीय गर्व का प्रतीक मानती थी, आज उसी संस्था से भय और वितृष्णा महसूस करने लगी है। खासकर युवा वर्ग इस ‘दीवार के पीछे की हकीकत’ को देख चुका है। सोशल मीडिया पर इमरान खान के समर्थन में चल रही डिजिटल मुहिम उन युवाओं की आवाज है जिन्हें अब लोकतंत्र और सैन्य वर्चस्व की असमानता समझ आने लगी है। सेना की प्रतिष्ठा में गिरावट का यह दौर शायद अब तक का सबसे गहरा है। असीम मुनीर ने खुद को “राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं से मुक्त रक्षक” बताते हुए कहा कि “ईश्वर ने मुझे संरक्षक बनाया है, शासक नहीं”, लेकिन उनके कदम विपरीत दिशा में हैं। असीम मुनीर और उनके आस-पास के जनरलों ने जिस तरह से राजनीतिक परिदृश्य को अपने कब्जे में लिया है, उसने पाकिस्तान को भीतर से खोखला कर दिया है।​

खतनाक भंवर जाल में फंसा पाकिस्तान

इमरान खान की गिरफ्तारी और उनके समर्थकों पर लगाई गई कठोर सज़ाओं ने यह भी उजागर किया कि पाकिस्तान अब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राजनीतिक विरोध की जगह खो चुका है। न्यायपालिका में वरिष्ठ जजों का तबादला, सरकार विरोधी चैनलों का ब्लैकआउट और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी, इन सबने मिलकर एक बंद समाज की तस्वीर प्रस्तुत की है। असीम मुनीर की नीतियां साफ़ बताती हैं कि वे देश को भय के शासन से नियंत्रित करना चाहते हैं। मगर यह रणनीति उलटी पड़ रही है—हर दमन के बाद एक नया असंतोष जन्म ले रहा है। पाकिस्तानी सेना की आईएसपीआर ने 9 मई को सैन्य प्रतिष्ठानों पर हमलों को “राजद्रोह और जासूसी” करार देते हुए आर्मी एक्ट, टेररिज्म एक्ट के तहत कार्रवाई की चेतावनी दी।​

आर्थिक दृष्टि से भी पाकिस्तान रसातल में जा रहा है। विदेशी ऋण बढ़ रहा है, विदेशी मुद्रा भंडार घट रहा है और रुपये की कीमत निरंतर गिर रही है। चीन का बेल्ट एंड रोड प्रोजेक्ट (CPEC) आज कर्ज के बोझ में दब गया है, क्योंकि राजनीतिक अस्थिरता ने निवेशकों का भरोसा तोड़ दिया है। सेना और नौकरशाही का भ्रष्ट गठजोड़ आर्थिक सुधारों को निगल चुका है। ऐसी स्थिति में जनता के पास या तो निराशा है या आवेश। यही आवेश यदि सीमांत प्रांतों में अलगाववादी रूप में प्रकट हुआ तो पाकिस्तान के विखंडन की प्रक्रिया तेज हो सकती है।

बलूचिस्तान, सिंध और खैबर पख्तूनख्वा में पहले से ही अलगाव की आवाजें सुनाई दे रही हैं। बलूच विद्रोही खुलकर कह रहे हैं कि इस्लामाबाद केवल पंजाबियों का पाकिस्तान है। सिंधी राष्ट्रवादियों ने भी अब आर्थिक शोषण और राजनीतिक उपेक्षा के खिलाफ आंदोलन तेज किया है। इन क्षेत्रों में सेना के दमन और मानवाधिकार उल्लंघनों ने जन असंतोष को और गहरा किया है। इमरान खान के जनसमर्थन ने भी इन क्षेत्रों में यह भावना जगाई है कि इस्लामाबाद का ‘केन्द्रीय ढांचा’ जनता का नहीं, बल्कि सैन्य गुटों का है।

विदेश नीति के मोर्चे पर भी पाकिस्तान भारी नुकसान झेल रहा है। अफगानिस्तान में तालिबान के साथ बढ़ती तनातनी, भारत से शत्रुतापूर्ण संबंध, और अमेरिका की शीत दूरी—इन सबने उसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर अलग-थलग कर दिया है। असीम मुनीर ने भारत के खिलाफ परमाणु rhetoric अपनाते हुए कहा कि “मामूली उकसावे पर भी प्रतिक्रिया अनुपात से परे निर्णायक होगी”। सऊदी अरब और यूएई जैसे पारंपरिक सहयोगी अब पाकिस्तान को आर्थिक अनुशासन के बिना मदद देने को तैयार नहीं। चीन भी अब अपने निवेश की सुरक्षा के प्रति अधिक चिंतित है।​​

यह आंतरिक विखंडन केवल राजनीतिक या आर्थिक संकट तक सीमित नहीं रहा। यह एक वैचारिक संकट भी है—इस्लामी गणराज्य का आदर्श अब जनता के जीवन से कट चुका है। नई पीढ़ी सवाल उठा रही है कि जब एक सैनिक अधिकारी देश की राजनीति, अर्थव्यवस्था और न्याय प्रणाली तय करता है, तो फिर चुनकर आने वाले प्रतिनिधियों का अर्थ क्या रह गया? इस प्रश्न ने पूरे समाज में एक अस्तित्वगत असंतोष पैदा किया है। पाकिस्तान की पहचान अब एक राष्ट्र से अधिक एक ‘सैन्य प्रतिष्ठान’ के रूप में देखी जाने लगी है।

असीम मुनीर का सत्ता के प्रति यह आक्रामक रवैया पाकिस्तान के इतिहास में नया नहीं है, लेकिन इसका परिणाम पहले से कहीं अधिक घातक हो सकता है। उन्होंने जो दमनात्मक माहौल बनाया है, वह पाकिस्तान को ‘अर्ध-सैन्य राज्य’ से सीधे ‘सर्वाधिकारवादी जेल’ में बदल रहा है। यह स्थिति न केवल लोकतंत्र के लिए, बल्कि स्वयं सेना के लिए भी खतरनाक है। जब जनता का विश्वास टूटा, तो न केवल नेता गिरते हैं, बल्कि संस्थाएं भी अपने मायने खो देती हैं।

किधर ले जायेगा यह रास्ता 

पाकिस्तान के नक्शे पर अब कई तरह की दरारें उभर आई हैं। राजनीति में अराजकता, अर्थव्यवस्था में दिवालियापन और समाज में निराशा—ये तीनों मिलकर उस देश की कहानी कह रहे हैं जो कभी ‘इस्लामिक एकता’ की मिशाल माना जाता था। अब वहां एक ही चीज़ बाकी है—सेना का भय। किंतु भय किसी राष्ट्र को स्थिर नहीं रख सकता। इतिहास गवाह है कि जब सत्ता जनता के विश्वास से नहीं, बल्कि हथियार की नोक से चलती है, तब उसका अंत तेज़ और भीतरी विखंडन से होता है।

आज पाकिस्तान उसी मोड़ पर खड़ा है। इमरान खान की गिरफ्तारी केवल एक व्यक्ति की हार नहीं, बल्कि उस लोकतांत्रिक आकांक्षा की हार है जो कभी जिन्ना के सपने में दिखी थी। अगर असीम मुनीर और पाकिस्तान की सैन्य व्यवस्था ने इस चेतावनी को नहीं समझा, तो आने वाले वर्षों में पाकिस्तान के राजनीतिक मानचित्र में परिवर्तन अवश्यंभावी होगा। अलगाव, असंतोष और आंतरिक लड़ाइयां मिलकर उस ‘न्यूक्लियर पाकिस्तान’ को एक कमजोर, टूटे हुए और खतरनाक रूप में बदल सकती हैं।

पाकिस्तान को आज एक ऐसे नेतृत्व की जरूरत है जो सेना के भय से मुक्त होकर जनता की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करे। जो देश के भीतर के असमानताओं को समझे और संस्थाओं को सेना के नियंत्रण से वापस लोकतंत्र के अधीन लाए। परंतु मौजूदा परिदृश्य में ऐसा नेतृत्व नजर नहीं आता। शाहबाज शरीफ केवल समय काट रहे हैं, सेना अपने हित बचा रही है और जनता एक दिशा खोज रही है। यही असंतुलन पाकिस्तान को विखंडन की दिशा में धकेल रहा है।

पाकिस्तान के लिए यह अंतिम चेतावनी है—या तो वह लोकतांत्रिक सुधारों और नागरिक शासन की दिशा में कदम बढ़ाए, या फिर उसके भीतर की दरारें उसे कई हिस्सों में बांट देंगी। असीम मुनीर जैसे शक्तिशाली जनरलों के लिए यह समय आत्ममंथन का है, क्योंकि अगर सत्ता की भूख और राजनीतिक दमन जारी रहा, तो आने वाले इतिहास में उनका नाम उसी श्रेणी में लिखा जाएगा, जिसने अपने ही देश को भीतर से तोड़ डाला।

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