क्या इतनी जल्दबाजी बिहार विधानसभा चुनाव की वजह से है?

जुबिली न्यूज डेस्क

कोरोना महामारी के चलते वरिष्ठ नागरिकों के लिए डाक-मतपत्र से मतदान की सुविधा देने के संदर्भ में आयु सीमा घटाकर 65 साल कर दी गई है, जिसका विपक्षी दल विरोध कर रहे हैं।

पहले माकपा महासचिव सीताराम येचुरी ने इस फैसले पर आपत्ति जताया और अब कांग्रेस ने आपत्ति जतायी है। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि चुनाव आयोग बिना विमर्श चुनावी प्रक्रिया बदलने के लिए एकतरफा कदम उठा रहा है।

बिहार विधानसभा चुनाव में अभी तीन माह से ज्यादा का समय शेष है लेकिन माहौल एक दम चुनावी हो गया है। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस का कहना है कि चुनाव आयोग के इस फैसले से बिहार चुनाव प्रभावित होगा।

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दरअसल कानून मंत्रालय ने कोरोना वायरस से वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा का हवाला देते हुए लोकसभा और विधानसभा चुनावों में डाक-मतपत्र के लिए मतदाताओं की आयु सीमा 80 साल से घटाकर 65 साल कर दी गई है। इस फैसले का कांग्रेस विरोध कर रही है। कांग्रेस को डर है कि इससे बिहार चुनाव में वोटों का मेनुपुलेशन हो सकता है।

मालूम हो कि कानून मंत्रालय ने अक्टूबर 2019 में चुनाव कराने के नियमों में संशोधन किया था और दिव्यांगों तथा 80 साल या इससे अधिक उम्र के लोगों को लोकसभा और विधानसभा चुनावों में डाक-मतपत्र से मतदान की अनुमति प्रदान की थी।

अब कोरोना महामारी को देखते हुए मंत्रालय ने 19 जून को जारी ताजा संशोधन में 65 वर्ष या इससे अधिक उम्र के लोगों को डाक-मतपत्र के इस्तेमाल की अनुमति दी है।

फैसले का विरोध करते हुए कांग्रेस ने शुक्रवार को निर्वाचन आयोग से आग्रह किया कि वह इस निर्णय एवं इससे जुड़े संशोधन को वापस लेने का निर्देश दे।

विपक्षी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं अहमद पटेल, केसी वेणुगोपाल, कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी और रणदीप सुरजेवाला की ओर से आयोग को दिए गए प्रतिवेदन में यह दावा किया गया है कि इस निर्णय को लेकर विधि मंत्रालय ने चुनाव कराने संबंधी नियम-1961 में जो संशोधन किया है उसमें कई कानूनी खामियां हैं।

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कांग्रेस ने कहा, ‘जिस तरह से ये निर्णय लिया गया है उससे साफ जाहिर होता है कि इसमें कोई दिमाग नहीं लगाया गया और संबंधित पक्षों के साथ कोई विचार-विमर्श नहीं किया गया।’

कांग्रेस ने यह भी आरोप लगाया कि इस व्यवस्था से मतदान की गोपनीयता भंग होने का खतरा है, जबकि किसी भी संवैधानिक लोकतंत्र में मतदान की गोपनीयता बहुत महत्वपूर्ण है। साथ में कांग्रेस ने यह भी कहा कि बेहतर विकल्प यह होगा कि वरिष्ठ नागरिकों के लिए अलग मतदान बूथ बनाए जाएं जिससे संक्रमण का न्यूनतम खतरा होगा।

कांग्रेस ने आग्रह किया है कि निर्वाचन आयोग संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत दी गईं शक्तियों का उपयोग करे और इस निर्णय तथा नियम में संशोधन को वापस लेने का निर्देश दे।

इसके पहले माकपा महासचिव सीताराम येचुरी ने 29 जून को इस फैसले पर आपत्ति जताई थी और इस संबंध में निर्वाचन आयोग को पत्र लिखा था।

येचुरी ने पूछा था कि क्या इतनी जल्दबाजी बिहार विधानसभा चुनाव की वजह से है? उन्होंने पत्र में कहा है कि निर्वाचन आयोग राजनीतिक दलों से विमर्श किए बिना चुनावी प्रक्रिया को बदलने के लिए एकतरफा कदम उठा रहा है।

मुख्य निर्वाचन आयुक्त को लिखे पत्र में येचुरी ने कहा था कि हम मीडिया में आईं इन खबरों से काफी व्यथित हैं कि निर्वाचन आयोग राजनीतिक दलों से विमर्श की स्थापित परंपरा का उल्लंघन कर 65 साल से अधिक उम्र के मतदाताओं को डाक के जरिये मतदान का विकल्प उपलब्ध कराने के लिए एकतरफा कदम उठा रहा है।

राजनीतिक विश्लेषक इस फैसले पर राजनीतिक दलों की चिंता को जायज मानते हैं। वरिष्ठï पत्रकार सुरेन्द्र दुबे कहते हैं कि विपक्षी दल अपनी जगह सही है। इसका जोरदार विरोध होना चाहिए। ठीक है कोरोना संक्रमण का खतरा है, लेकिन इसका कोई और विकल्प तलाशना चाहिए था। डाक-मतपत्र से मतदान की सुविधा कुछ खास लोगों को ही दी जाती थी और अब इसमें 65 साल तक के लोगों को शामिल कर दिया गया है। इससे एक बड़ी आबादी इस श्रेणी में आ जायेगी।

वह कहते हैं कि चुनाव में वोट के लिए राजनीतिक दल क्या-क्या जतन करते हैं। सही-गलत सारे तरीके आजमाए जाते हैं इसलिए यह सही नहीं है। बिहार में बुजुर्ग मतदाताओं की आबादी भी अच्छी-खासी है। इसलिए विपक्षी दलों का विरोध जायज है।

इस मामले में वरिष्ठï पत्रकार कुमार भावेश चंद्रा कहते हैं कि चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों की मंत्रणा के बिना ये फैसला लिया है तो गलत है। यदि ऐसा हुआ है तो सवाल तो उठेगा ही। विपक्षी दलों की चिंता जायज है। बिहार में तीन महीने बाद चुनाव होना है। इस राज्य के मतदाता उक्त संशोधित नियम का सबसे पहले लाभ उठाएंगे। विपक्षी दलों जिस चीज के लेकर डर रहे हैं वह सही है। उनको डर है कि इससे चुनाव प्रभावित हो सकता है। दरअसल विपक्षी दल वोटों के मेनुपुलेशन के लेकर डरे हुए हैं।

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