युद्ध के साथ टूट रहे मिथक: वैश्विक शक्ति संतुलन का नया दौर

संपादकीय टिप्पणी

डा. उत्कर्ष सिन्हा

दो हफ्तों से ज्यादा हो गए जब मध्यपूर्व का असमान मिसाईलों की आग का गवाह बन रहा है। ईरान की और से दागी हर मिसाईल न सिर्फ इजराईल सहित तमाम अरब देशों को निक्सन पहुंचा रही है बल्कि तमाम मिथकों को भी तोड़ रही है । इस युद्ध ने मध्य पूर्व की भू-राजनीति को लम्बे समय के लिए बदल दिया है।

इस संघर्ष ने न केवल क्षेत्रीय शक्तियों की सैन्य क्षमताओं का परीक्षण किया, बल्कि वैश्विक मिथकों को भी चूर-चूर कर दिया। अमेरिका की एकतरफा वर्चस्व, इजरायल की अपराजेयता, अरब देशों पर अमेरिकी सुरक्षा छत्र का भ्रम और इजरायल को नैतिक समर्थन का अंत—ये चार प्रमुख मिथक अब ध्वस्त हो चुके हैं। इस युद्ध ने साबित कर दिया कि 21वीं सदी की दुनिया में कोई अकेला राष्ट्र अपना साम्राज्य नहीं चल सकता।  

अमेरिका की चौधराहट ख़त्म !

सबसे पहले, अमेरिका की एकतरफा चौधराहट का मिथक। दशकों से दुनिया मानती आई है कि वाशिंगटन अपनी इच्छानुसार वैश्विक मामलों को निर्देशित कर सकता है। इराक और अफगानिस्तान जैसे युद्धों ने इस भ्रम को मजबूत किया, जहां अमेरिकी सैन्य शक्ति ने तत्कालीन शासनों को ध्वस्त कर दिया। लेकिन ईरान युद्ध ने इस मिथक को तोड़ दिया है । जब ईरान ने अपने बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोन हमलों से अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया, तो वाशिंगटन ने प्रत्यक्ष हस्तक्षेप से परहेज किया। अरब देशो से  अमेरिकी सैनिकों की वापसी तेज हो गई—सऊदी अरब, बहरीन और कुवैत से हजारों सैनिक हटाए गए। अमेरिकी सेनाओं की यह वापसी इराक युद्ध के बाद की वापसी से भी अधिक शर्मनाक रही, क्योंकि इस बार अमेरिका ने अपने सहयोगियों को बीच में छोड़ दिया।

विशेषज्ञों का मानना है कि चीन और रूस के उदय ने अमेरिका को बहुपक्षीय दबाव में डाल दिया है। पेंटागन की रिपोर्ट्स बताती हैं कि ईरानी मिसाइलों ने अमेरिकी विमानवाहक पोत यूएसएस अब्राहम लिंकन को गंभीर नुकसान पहुंचाया, जिससे वाशिंगटन को पीछे हटना पड़ा। अब, अमेरिका की एकतरफा ताकत का अंतिम संस्कार हो चुका है; वह अब केवल एक खिलाड़ी मात्र है, साम्राज्य नहीं।

इजराईल के अपराजेय होने का मिथक

इजरायल का अपराजेय होने का मिथक भी बुरी तरह धराशायी हुआ। इजरायल को हमेशा अपनी उन्नत तकनीकी क्षमता, सैन्य मशीनरी, आयरन डोम प्रणाली और मोसाद की गुप्तचर ताकत के कारण अजेय माना जाता रहा। 1967 और 1973 के युद्धों ने इस छवि को पुख्ता किया। लेकिन ईरान युद्ध में हिजबुल्लाह और हौथी विद्रोहियों ने इजरायली सीमाओं पर अभूतपूर्व हमले किए। आयरन डोम, जो 90% मिसाइलों को रोकने का दावा करता था, विफल रहा—तेल अविव और हाइफा पर सैकड़ों ड्रोन हमले सफल हुए, जिसमें 200 से अधिक नागरिक मारे गए।

मोसाद का जासूसी नेटवर्क, जो ईरान के अंदरूनी हमलों के लिए प्रसिद्ध था , इस बार नाकाम रहां और उसके  कई एजेंट पकड़े गए और ईरानी खुफिया एजेंसी ने जवाबी कार्रवाई की। इजरायली वायुसेना की F-35 लड़ाकू विमान ईरानी S-400 सिस्टम के आगे लाचार साबित हुए। यह मिथक टूटने से इजरायल की सुरक्षा अवधारणा ही बदल गई। अब, उसके पड़ोसी देश आत्मविश्वास से भरे हैं, और क्षेत्रीय संतुलन बदल जायेगा।

अमेरिकी सुरक्षा का भ्रम

तीसरा प्रमुख मिथक, अरब देशों पर अमेरिकी सुरक्षा का भ्रम भी टूट रहा है । सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और अन्य खाड़ी देश लंबे समय से मानते रहे कि अमेरिका उनकी ढाल है। अब्राहम समझौते ने इस भ्रम को और गहरा किया। लेकिन ईरान युद्ध में जब मिसाइलों ने सऊदी के तेल संयंत्रों को नष्ट किया, तो अमेरिका ने कोई प्रत्यक्ष सैन्य सहायता नहीं दी। पेंटागन ने केवल ‘सलाह’ दी, जबकि सऊदी राजकुमार मोहम्मद बिन सलमान को स्वयं ईरान से युद्ध करने में पीछे हैं ।

अमेरिकी सैनिकों की वापसी ने खाड़ी देशों को झकझोर दिया—कुवैत और कतर से बेस हटाए गए, जिससे इन देशों को अपनी सेनाओं को मजबूत करने पर मजबूर होना पड़ा। अब, ये देश ईरान के साथ सामान्यीकरण की ओर बढ़ रहे हैं और सऊदी ने तेहरान में राजदूत भेजा है। यह बदलाव अमेरिकी विश्वासघात का प्रत्यक्ष परिणाम है।

विशेषज्ञ कहते हैं कि अब अरब दुनिया बहुपक्षीय सुरक्षा की ओर रुख करेगी, जिसमें रूस, चीन और यहां तक कि तुर्की शामिल होंगे।

इजराईल को नैतिक समर्थन का अंत और फिलिस्तीन मुद्दे का पुनरुद्धार !

इजरायल को वैश्विक नैतिक समर्थन का अंत होता दिखाई दे रहा है और फिलिस्तीन मुद्दे का पुनरुद्धार होता भी दिख रहा है । यूरोपीय संघ, ब्रिटेन, फ्रांस और यहां तक कि कनाडा ने युद्ध के दौरान इजरायल का खुला विरोध किया। संयुक्त राष्ट्र में फिलिस्तीनी प्रस्तावों को अब वीटो नहीं किया  गया और यहाँ  अमेरिका अकेला पड़ गया। जर्मनी, जो हमेशा इजरायल का समर्थक रहा, ने हथियार आपूर्ति रोकी। दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील जैसे देशों ने इजरायल को ‘अपार्टहाइड राज्य’ कहा। युद्ध ने गाजा और वेस्ट बैंक के मुद्दे को फिर से जीवंत कर दिया—दुनिया भर में लाखों प्रदर्शन हुए, और आंदोलन ने नई जान पड़ी । अब इजरायल फिलिस्तीन मामले में भारी दबाव में है और यह नैतिक समर्थन का अंत इजरायल को शांति वार्ता के लिए बाध्य करेगा। फिलिस्तीन मुद्दा अब वैश्विक एजेंडे पर शीर्ष पर है, जो दो-राज्य समाधान की ओर इशारा करता है।

इन टूटे मिथकों के परिणाम दूरगामी हैं। अमेरिका की अलगाववादिता ने एशिया-प्रशांत में उसकी साख को भी प्रभावित किया है। इजरायल अब अपनी सैन्य बजट को दोगुना करने पर विचार कर रहा है, लेकिन आर्थिक दबाव बढ़ रहा है। अरब देश ईरान के साथ आर्थिक समझौतों पर काम कर रहे हैं, जो क्षेत्रीय एकीकरण लाएगा। फिलिस्तीन मुद्दे का पुनरुद्धार वैश्विक न्याय की जीत है। कुल मिलाकर, ईरान युद्ध ने बहुपक्षीय दुनिया का मार्ग प्रशस्त किया है, जहां कोई एकतरफा शक्ति नहीं। भारत जैसे देशों को इस नए संतुलन में अवसर मिलेंगे—मध्य पूर्व में ऊर्जा सुरक्षा और कूटनीति के द्वार खुलेंगे। लेकिन सावधानी बरतनी होगी, क्योंकि क्षेत्रीय तनाव बरकरार हैं।

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