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	<title>यशोदा श्रीवास्तव Archives &#060; Jubilee Post | जुबिली पोस्ट</title>
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	<description>News &#38; Information Portal</description>
	<lastBuildDate>Sun, 23 Mar 2025 14:38:24 +0000</lastBuildDate>
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		<title>नेपाली PM ओली ने भारत पर तख्ता पलट का लगाया आरोप</title>
		<link>https://www.jubileepost.in/nepali-pm-oli-accused-india-of-coup/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Syed Mohammad Abbas]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 23 Mar 2025 14:38:02 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Main Slider]]></category>
		<category><![CDATA[इण्डिया]]></category>
		<category><![CDATA[जुबिली वर्ल्ड]]></category>
		<category><![CDATA[ब्रेकिंग न्यूज़]]></category>
		<category><![CDATA[ओली]]></category>
		<category><![CDATA[नेपाली PM]]></category>
		<category><![CDATA[प्रधानमंत्री ओली]]></category>
		<category><![CDATA[यशोदा श्रीवास्तव]]></category>
		<category><![CDATA[स्वर्गीय नरेश वीरेंद्र विक्रम शाह]]></category>
		<category><![CDATA[हिंदू राष्ट्र]]></category>
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					<description><![CDATA[यशोदा श्रीवास्तव प्रधानमंत्री ओली ने नेपाल हाल की घटनाओं के लिए अप्रत्यक्ष रूप से भारत को जिम्मेदार ठहराते हुए पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र की गिरफ्तारी तक की चेतावनी दे दी है। राजा समर्थकों की लगातार आंदोलन और प्रदर्शन के बीच नेपाल में सरकार परिवर्तन की अफवाहें भी तेज है। इस बीच प्रधानमंत्री और यूएमएल अध्यक्ष केपी &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color: #0000ff;"><strong><img decoding="async" class="alignleft wp-image-251684 size-thumbnail" src="https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2022/03/yasoda-srivastav-e1695657583176-150x150.jpg" alt="" width="150" height="150" />यशोदा श्रीवास्तव</strong></span></p>
<p>प्रधानमंत्री ओली ने नेपाल हाल की घटनाओं के लिए अप्रत्यक्ष रूप से भारत को जिम्मेदार ठहराते हुए पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र की गिरफ्तारी तक की चेतावनी दे दी है।</p>
<p>राजा समर्थकों की लगातार आंदोलन और प्रदर्शन के बीच नेपाल में सरकार परिवर्तन की अफवाहें भी तेज है। इस बीच प्रधानमंत्री और यूएमएल अध्यक्ष केपी शर्मा ओली भारत के प्रति आक्रामक हो उठे। वह भी ऐसे समय जब नेपाल की विदेश मंत्री आरज़ू राणा देउबा भारत दौरे पर हैं।</p>
<p>यूएमएल पार्टी कार्यालय च्यासल में हुई सचिवालय बैठक में ओली ने खुलासा किया कि भारतीय खुफिया एजेंसियां उन्हें प्रधानमंत्री पद से हटाने के लिए सक्रिय हो गई हैं।</p>
<p>ओली ने कहा कि दमक से काठमांडू तक भारतीय एजेंट उनकी सरकार गिराने की कोशिशों में लगे हैं। उन्होंने भारत की इस &#8216;साजिश&#8217; को उजागर करने की चेतावनी दी।</p>
<p>ओली आने वाले कुछ दिनों में संसद में औपचारिक रूप से इस मुद्दे पर अपना पक्ष रखने की तैयारी कर रहे हैं।सांसदों के सवालों का जवाब देते हुए ओली ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा,</p>
<p>&#8220;हमारी स्थिति इतनी नाजुक नहीं है कि हमें किसी विदेशी की तस्वीर लेकर घूमना पड़े!&#8221; ओली का इशारा पिछले दिनों काठमांडू में यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ की तस्वीर की ओर था। जिसे कुछ दिन पहले पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र के स्वागत में लहराया गया था।</p>
<p>नेपाल के पिछले कुछ दिनों के घटनाक्रम को देखें तो नेपाल के एक बार फिर आंदोलन की आग के मुहाने पर खड़ा होने का अंदेशा साफ नजर आ रहा है।</p>
<p>पिछले एक पखवारे से हिंदू राष्ट्र की मांग को लेकर राजा वादी समर्थक आंदोलन रत हैं। पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र के समर्थन में हिंदू वादी संगठन सड़कों पर हैं। पूर्व राजदरबार नारायण हिटी द्वार के समक्ष राजा की वापसी की मांग को लेकर आंदोलन प्रदर्शन जारी है। हालत यह है कि इन घटनाओं को लेकर ओली सरकार हलकान हैं।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-316654" src="https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2025/03/PM-NEPAL-e1742740655771.jpg" alt="" width="600" height="339" /></p>
<blockquote><p><span style="color: #ff6600;"><strong>इधर स्वर्गीय नरेश वीरेंद्र विक्रम शाह और उनके संपूर्ण परिवार की हत्या का मामला उछाल कर पूर्व पीएम प्रचंड हिंदू संगठनों के निशाने पर हैं। राज शाही की मांग को लेकर हिंदू संगठनों के सड़कों पर उतर जाने को लेकर ओली ही नहीं प्रचंड के भी पेशानी पर बल है। घबड़ाए प्रचंड ने रविवार को हिंदू संगठनों के आंदोलन के खिलाफ आंदोलन की घोषणा कर दी है।</strong></span></p></blockquote>
<p>प्रचंड यदि आंदोलन पर उतारू हुए तो इसके हिंसक होने की पूरी संभावना है। लोगों का मानना है कि नेपाल फिर आंदोलनों की आग में झुलसेगा।</p>
<p>प्रचंड के नेतृत्व में समाजवादी मोर्चा ने अपने आंदोलन की रूप रेखा तय कर ली है और इसका &#8220;गणतंत्र बचाओ&#8221; का नाम दिया है। प्रचंड ने इसी महीने किसी तारिख को राजा वादियों के खिलाफ शक्ति प्रदर्शन की तैयारी शूरू कर दी है। प्रचंड के आंदोलन की घोषणा के फौरन बाद राजा समर्थक आंदोलन के अगुआ दुर्गा प्रसाद राई ने भी आंदोलन का जवाब आंदोलन से देने की घोषणा कर दी है।</p>
<p>दोनों पक्षों के आंदोलन से ओली सरकार के लिए कानून व्यवस्था बनाए रखने की चुनौती है। काठमांडू का भृकुटी मंडप प्रचंड के शक्ति प्रदर्शन का केंद्र होगा जबकि राजा वादी पक्ष के शक्ति प्रदर्शन का केंद्र तिनकुने होगा।</p>
<blockquote><p><span style="color: #ff6600;"><strong>दोनों ओर से शक्ति प्रदर्शन की चेतावनी के बीच रविवार की शाम ओली और नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष शेर बहादुर देउबा की मुलाकात महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इधर पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र के अपने पूर्वजों की धरती गोरखा पंहुचने पर उनका जोरदार स्वागत किया गया। इसके एक दिन पहले नेपाल के प्रमुख नेताओं के यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ से मुलाकात को लेकर काठमांडू में दिन भर कयासबाजी का बाजार गर्म रहा।</strong></span></p></blockquote>
<p>नेपाल के पूर्व सांसद अभिषेक शाह,लुंबिनी प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री डिल्ली बहादुर चौधरी,लुंबिनी प्रदेश विधानसभा में मुख्य मंत्री योगी का गुणगान करने वाले विधायक केसी गुप्ता ने मुख्यमंत्री योगी से मिलकर नेपाल और भारत के रिश्तों की प्रगाढ़ता पर चर्चा की और सीता माता के मायका जनकपुर में स्थति जानकी धाम का स्मृति चिन्ह भेंट किया। समझा जा रहा है अगली बार जब कभी हिंदू राष्ट्र को लेकर आंदोलन का बिगुल बजा तो उसकी शुरुआत जनकपुर से होगी।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>दूर तलक जाएगा घोसी उपचुनाव के परिणाम का संदेश</title>
		<link>https://www.jubileepost.in/the-message-of-ghosi-by-election-result-will-go-far/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Syed Mohammad Abbas]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 03 Sep 2023 11:06:45 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Main Slider]]></category>
		<category><![CDATA[इण्डिया]]></category>
		<category><![CDATA[ओपिनियन]]></category>
		<category><![CDATA[जुबिली डिबेट]]></category>
		<category><![CDATA[इंडिया एलायंस]]></category>
		<category><![CDATA[घोसी उपचुनाव]]></category>
		<category><![CDATA[बीजेपी]]></category>
		<category><![CDATA[यशोदा श्रीवास्तव]]></category>
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					<description><![CDATA[यशोदा श्रीवास्तव यूपी के घोसी उप चुनाव का संदेश बड़ा होगा। यह बीजेपी के लिए भी और इंडिया एलायंस के लिए भी। इस उपचुनाव परिणाम को आने वाले किसी चुनाव के लिटमस टेस्ट के रूप में भले न देखें लेकिन इसके व्यापक महत्व को नकारा नहीं जाना चाहिए। यही वजह है कि इसे जीतने के &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color: #0000ff;"><strong><img loading="lazy" decoding="async" class=" wp-image-251684 alignleft" src="https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2022/03/yasoda-srivastav-669x1024.jpg" alt="" width="73" height="112" />यशोदा श्रीवास्तव</strong> </span></p>
<p><span style="color: #ff6600;">यूपी के घोसी उप चुनाव का संदेश बड़ा होगा। यह बीजेपी के लिए भी और इंडिया एलायंस के लिए भी। इस उपचुनाव परिणाम को आने वाले किसी चुनाव के लिटमस टेस्ट के रूप में भले न देखें लेकिन इसके व्यापक महत्व को नकारा नहीं जाना चाहिए। यही वजह है कि इसे जीतने के लिए भाजपा और सपा (इंडिया के संयुक्त उम्मीदवार)पूरी कोशिश में है।</span></p>
<p>मऊ जिले का घोसी विधानसभा क्षेत्र चुनाव के हर मौके पर सदैव ही चर्चा में रहा है। घोसी लोकसभा सीट भी है जिसकी नुमाइंदगी लंबे समय तक विकास पुरुष के नाम से मशहूर स्व.कल्पनाथ राय ने की है।</p>
<p>कांग्रेस से भी और निर्दल भी। इस विधानसभा क्षेत्र की खास बात यह है कि यह अल्पसंख्यक और बैंक वर्ड बाहुल्य विधानसभा क्षेत्र है। जहां सपा भाजपा और बसपा के विधायक चुने जाते रहे। 2012 में सुधाकर सिंह सपा से विधायक चुने गए थे जबकि 2017 में फागू चौहान भाजपा से जीते थे।</p>
<p>फागू चौहान कुछ ही समय बाद बिहार के राज्यपाल बना दिए गए तो यहां फिर उपचुनाव की नौबत आई थी। इस उपचुनाव में भाजपा के विजय राजभर चुनाव जीतने में कामयाब हुए थे।</p>
<p>देखा जाए तो इस विधानसभा क्षेत्र पर लंबे समय तक फागू चौहान का ही कब्जा रहा। यह अलग बात है कि हर बार वे नई पार्टी से जीतते रहे हैं। 2017 का विधानसभा चुनाव भाजपा से जीतने के पहले वे बसपा में भी थे। उपचुनाव में सपा से भाजपा में आए दारा सिंह चौहान भाजपा के उम्मीदवार हैं।</p>
<p>फागू चौहान के प्रभाव वाले इस क्षेत्र में भाजपा को चौहान उम्मीदवार के लिए चौहान बिरादरी के वोटों पर भरोसा है। लेकिन चौहान बिरादरी में इस बात की चर्चा है कि आखिर फागू चौहान के विधायक बेटे राम बिलास चौहान भाजपा उम्मीदवार के लिए वोट मांगने क्यों नहीं आए?</p>
<p><span style="color: #800000;"><strong>ये भी पढ़े : <a style="color: #800000;" href="https://www.jubileepost.in/ghosi-bielction/" target="_blank" rel="noopener">घोसी उपचुनाव में दबाव बढ़ा रहा है I.N.D.I.A. गठबंधन</a></strong></span></p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-large wp-image-285512" src="https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2023/08/NDA-Vs-I.N.D.I.A.-1024x576.png" alt="" width="618" height="348" /></p>
<p>फागू चौहान घोसी से भाजपा से विधायक चुने गए थे। कुछ ही माह बाद जब उन्हें राज्यपाल बनाया गया तो चर्चा तेज थी कि उनके बेटे राम बिलास को उपचुनाव में भाजपा उम्मीदवार बनाएगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ।</p>
<p>यहां से विजय राजभर को टिकट दिया गया और वे जीत भी गए। 2022 के चुनाव में भी फागू के बेटे को यहां से टिकट नहीं मिला। उन्हें मधुबन विधानसभा क्षेत्र से टिकट दिया गया जहां से वे बमुश्किल चुनाव जीत पाए। भाजपा उम्मीदवार दारा सिंह चौहान के पक्ष में राम बिलास का न आना उनकी नाराज़गी की दृष्टि से देखा जा रहा है।</p>
<p><span style="color: #800000;"><strong>ये भी पढ़े : <a style="color: #800000;" href="https://www.jubileepost.in/caste-equation-will-decide-win-win-in-ghosi-by-election/" target="_blank" rel="noopener">घोसी उपचुनाव में जाति समीकरण तैय करेगी हार-जीत</a></strong></span></p>
<blockquote><p><span style="color: #ff6600;"><strong>दारा सिंह चौहान का भी पाला बदलने का रिकॉर्ड रहा है। लोकसभा और राज्यसभा में वे बसपा और कांग्रेस के जरिए गए। बसपा से 2014 का लोकसभा चुनाव हार जाने के कुछ ही दिन बाद वे भाजपा का दामन थाम लिए थे। 2017 में उन्हें मधुबन विधानसभा क्षेत्र से भाजपा का टिकट मिल गया, वे जीतकर योगी सरकार में मंत्री बन गए। </strong></span><strong style="color: #ff6600;">2022 के विधानसभा चुनाव में सपा के जीतने की संभावना देख उन्होंने भाजपा छोड़ सपा का दामन थाम लिया। सपा ने भी इन्हें उपकृत किया। अपने परंपरागत उम्मीदवार सुधाकर सिंह को इग्नोर कर इन्हें टिकट थमा दिया। ये जनाब चुनाव जीत तो गए लेकिन सपा की सरकार न बन पाने से ये मंत्री बनने से वंचित रह गए।</strong></p></blockquote>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-285932" src="https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2023/09/sp-vs-bjp.jpg" alt="" width="727" height="342" srcset="https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2023/09/sp-vs-bjp.jpg 727w, https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2023/09/sp-vs-bjp-300x141.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 727px) 100vw, 727px" /></p>
<p>सपा में वतौर विधायक वे किसी तरह साल भर तक तो काटे लेकिन अंततः सपा छोड़ भाजपा में चले ही गए। विधानसभा से इस्तीफा भी दे दिया। अब उपचुनाव में भाजपा से मैदान में हैं। चुनाव जीतने के बाद उनकी मंशा जाहिर है मंत्री पद की लालशा ही है।</p>
<p>निश्चित तौर पर यह कहना मुश्किल है कि घोसी उपचुनाव का परिणाम किसके पक्ष में जाएगा लेकिन इस बार कुछ परिस्थितियां ऐसी है जिससे किसी के पक्ष में आम राय बनाना मुश्किल है।</p>
<p>मजे की बात है कि इस बार बसपा का उम्मीदवार मैदान में नहीं है। हो सकता है यह उसके उपचुनाव में उम्मीदवार न उतारने की रणनीति के तहत हो लेकिन वह अक्सर यहां से मुस्लिम उम्मीदवार ही उतारती है। संयोग हो सकता है कि इस बार बसपा अपना उम्मीदवार नहीं लड़ा रही है।</p>
<p>घोसी विधानसभा क्षेत्र में 80 हजार के आसपास मुस्लिम वोटर हैं। अंदाजा लगाया जा सकता है कि बूथ पर गया इस वर्ग का एक एक वोट कहां पड़ेगा? राजभर वोटर भी यहां अच्छी खासी तादाद में है। 2022 में भाजपा से पराजित विजय राजभर को टिकट न देने का असर राजभर मतदाताओं में साफ दिख रहा है।</p>
<p>दारा सिंह चौहान स्थानीय भी नहीं है कि चौहान बिरादरी में उनका अपना कुछ असर हो लेकिन सवर्ण वोटर भाजपा के साथ तो है लेकिन ठाकुर मतदाताओं का मत भाजपा के इतर होने की पूरी संभावना है।</p>
<p>फिलहाल घोसी उपचुनाव का परिणाम चाहे जो हो इसके संदेश का असर दूर तलक जाने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। इस उपचुनाव की अहमियत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मतदान के अंतिम दिनों में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी घोसी आना पड़ा जबकि इसके पहले सपा मुखिया अखिलेश यादव भी यहां आकर अपने उम्मीदवार सुधाकर सिंह के लिए वोट की अपील कर गए।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>आजादी के डेढ़ दशक बाद भी बदलाव को तरस रहा नेपाल</title>
		<link>https://www.jubileepost.in/nepal-longing-for-change-even-after-one-and-a-half-decade-of-independence/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Supriya Singh]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 15 Sep 2022 12:57:45 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[स्पेशल स्टोरी]]></category>
		<category><![CDATA[अखंड राष्ट्र]]></category>
		<category><![CDATA[डेढ़ दशक]]></category>
		<category><![CDATA[नेपाल]]></category>
		<category><![CDATA[यशोदा श्रीवास्तव]]></category>
		<category><![CDATA[विरोध और प्रर्दशनों]]></category>
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					<description><![CDATA[यशोदा श्रीवास्तव &#160; नेपाल में राजशाही का अंत हुए तकरीबन डेढ़ दशक बीतने को है लेकिन नेपाल न तो विरोध और प्रर्दशनों से मुक्त हो पाया और न ही लोकतंत्र ही मजबूत हो सका। संविधान सभा के चुनाव के बाद अब दूसरी बार आम चुनाव भी होने जा रहा है, नेपाल का अपना संविधान भी &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color: #0000ff"><strong>यशोदा श्रीवास्तव</strong></span></p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-243172" src="https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2021/12/यशोदा-श्रीवास्तव.jpg" alt="" width="150" height="150" /></p>
<p>&nbsp;</p>
<p>नेपाल में राजशाही का अंत हुए तकरीबन डेढ़ दशक बीतने को है लेकिन नेपाल न तो विरोध और प्रर्दशनों से मुक्त हो पाया और न ही लोकतंत्र ही मजबूत हो सका। संविधान सभा के चुनाव के बाद अब दूसरी बार आम चुनाव भी होने जा रहा है, नेपाल का अपना संविधान भी लागू हो गया,कभी अखंड राष्ट्र के रूप में जाना जाने वाले नेपाल को सात प्रदेश भी मिल गया और हिंदू राष्ट्र से धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र भी हो गया फिर भी नेपाली जनता को सिर्फ बार बार मत देने के अधिकार के अलावा कुछ भी हासिल नहीं हुआ। परिवर्तन क्या होता है इसकी अनुभूति कराने में नेपाल के लोकतंत्र वादी सत्ताधीश विफल रहे।</p>
<blockquote><p><span style="color: #ff6600"><strong>नेपाल में 20 नवंबर को होने वाले आम चुनाव में मुकाबला दो ही दलों के बीच होने की उम्मीद है। एक दल (नेपाली कांग्रेस) अपेक्षाकृत भारत के नजदीक है तो दूसरा दल(एमाले) चीन के हाथों खेल रहा है। पिछले दिनों नेपाल के कुछ हिस्सों तक जाना हुआ जहां पहाड़ी और भारतीय मूल के नेपाली लोगों से चुनावी माहौल पर बात हुई। बात चीत में दो बातें खुलकर सामने आई। एक यह कि नेपाल के लोगों को राजशाही खत्म होने के बाद जितनी भी सरकारें आई,वे सभी के सभी आम जनता में परिवर्तन की अनुभूति कराने में विफल रहे। दूसरा यह कि नेपाल में मजबूत लोकतंत्र बिना भारत के सहयोग से संभव नहीं है।</strong></span></p></blockquote>
<p>नेपाल का मिला-जुला जनमानस यह मानता है कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है जहां तमाम राजनीतिक और वैचारिक मतभेद के बावजूद, चाहे यह राजनीतिक दलों में हो या पब्लिक में, विकास और राष्ट्र के प्रति सभी का समर्पण भाव एक जैसा है। वे मानते हैं चूंकि नेपाल भारत का नन्हा पड़ोसी राष्ट्र है और तमाम मायनों में वह भारत से घुला मिला है इसलिए भी नेपाल बिना भारत के सहयोग के आगे नहीं बढ़ सकता। पहाड़ी टोपी पहने एक बुजुर्ग नेपाली सज्जन ने साफ कहा कि राजशाही के वक्त से ही भारत और नेपाल के बीच अन्य देशों की अपेक्षा संबंध मधुर और निकटता के रहे हैं।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="aligncenter wp-image-263999 size-full" src="https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2022/09/16_08_2019-nepal_logo1_19490992.jpg" alt="" width="650" height="540" srcset="https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2022/09/16_08_2019-nepal_logo1_19490992.jpg 650w, https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2022/09/16_08_2019-nepal_logo1_19490992-300x249.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 650px) 100vw, 650px" /></p>
<p>नेपाल में कुछ माह पहले हुए स्थानीय निकाय के चुनाव परिणाम देखें तो निकाय क्षेत्र के सभी 751सीटों पर एक तरफा जीत किसी की नहीं हुई। जनता में तीन ही दलों की उपस्थिति देखी गई। इसमें नेपाली कांग्रेस 328 सीटों के साथ पहले नंबर पर है,205 सीटें हासिल कर एमाले दूसरे नंबर पर और121 सीटों के साथ प्रचंड के नेतृत्व वाला माओवादी केंद्र तीसरे नंबर पर रहा। प्रचंड नेपाली कांग्रेस के साथ गठबंधन में प्रमुख साझेदार हैं।</p>
<p>एमाले को पहाड़ से लेकर मैदानी इलाकों तक 205 सीटों की उम्मीद शायद एमाले अध्यक्ष केपी शर्मा ओली को भी नहीं रही होगी। एमाले प्रमुख केपी शर्मा ओली के हौसले बुलंद हैं और उन्हें केंद्रीय सत्ता की कुर्सी करीब दिखने लगी है। चीन भी एमाले को बढ़ावा दे रहा है। सत्ता रूढ़ नेपाली कांग्रेस के सहयोगी दलों की संख्या पांच है। लेकिन निकाय चुनाव में तमाम जगहों पर इसके सहयोगी दल अलग-अलग चुनाव लड़े थे।</p>
<p>आम चुनाव के दृष्टिगत नेपाली कांग्रेस गठबंधन को जनसरोकार के मुद्दों की तलाश है वहीं ओली की रणनीति भारत के खिलाफ माहौल बना कर कथित राष्ट्र वाद के मुद्दे पर मैदान में उतरने की है।पिछले महीने नेपाली पीएम देउबा की भारत यात्रा और उसके बाद भारत के प्रधानमंत्री मोदी का नेपाल के लुंबिनी आगमन के फ़ौरन बाद ओली ने काला पानी व लिपुलेख का मुद्दा उठा कर देउबा को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की।</p>
<p>उत्तराखंड की सीमा से लगने वाले नेपाल के दावे वाले हिस्से लिपुलेख,लिंपियाधुरा व काला पानी पर पर भारत ने मानसरोवर तक जाने का मार्ग बना लिया है। ओली जब प्रधानमंत्री थे तो इस मुद्दे पर भारत के खिलाफ बहुत जहर उगले थे। उन्होंने नेपाल का नया नक्शा तक जारी कर दिया था।</p>
<p>आम चुनाव में सबसे बुरा हाल मधेशी दलों का होने जा रहा है। 2008 में राजशाही के अंत के बाद नेपाल में आधा दर्जन मधेशी दलों ने आकार लिया था जिसमें सबसे मजबूत मधेशी जनाधिकार फोरम नाम का मधेशी दल था जिसके मुखिया उपेंद्र यादव थे। अब तो महंत ठाकुर, हृदयेश त्रिपाठी, राजेंद्र महतो आदि मधेशी नेताओं का भी अलग अलग नाम से मधेशी दल है। 2008 में हुए पहले संविधान सभा चुनाव में मधेशी दलों को मधेश क्षेत्र में शानदार सफलता मिली थी लेकिन उसके बाद के चुनावों में इनका जनाधार घटता चला गया। इनके प्रभाव शून्य होते जाने की वजह यह भी है कि ये जिसके खिलाफ चुनाव लड़ते हैं,उसी की सरकार में मंत्री उपप्रधानमंत्री तक बन जाते हैं। मधेश क्षेत्र में मधेशी दलों के कमजोर होने का सीधा फायदा कम्युनिस्ट पार्टियों को मिला। कहना न होगा कि आज भारत सीमा से सटे नेपाली भू-भाग तक लाल झंडा गड़ गया है। यहां भारी संख्य में लोग कम्युनिस्ट पार्टी ज्वाइन कर रहे हैं और भारत विरोध का जहर भी भरपूर घोला जा रहा है। एमाले के भारत विरोधी एजेंडे के मुकाबले नेपाली कांग्रेस कौन सा एजेंडा लेकर आती है यह देखना दिलचस्प होगा। हां मैदान के 22 जिलों में भले ही कम्युनिस्टों का प्रभाव बढ़ रहा हो, यहां नेपाली कांग्रेस को भारत से निकटता का फायदा मिलता हुआ दिख रहा है।</p>
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<p>उनका हिंदू राष्ट्र भी एक मुद्दा हो सकता है लेकिन उनके गठबंधन में चार ऐसे साथी हैं जो धर्म निरपेक्ष राष्ट्र का समर्थन करते हैं,ऐसे में इस मुद्दे पर गठबंधन के सहयोगियों को साधना देउबा के लिए एक अलग चुनौती है। 2018 के आम चुनाव के वक्त भी देउबा प्रधानमंत्री थे। उन्होंने पार्टी लाइन से हटकर तब भी हिन्दू राष्ट्र का मुद्दा उछाला था लेकिन तब उनका यह मुद्दा कारगर नहीं हो पाया था।</p>
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]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>जिसको सिर माथे लगाती है कांग्रेस वे क्यों छोड़ रहे साथ?</title>
		<link>https://www.jubileepost.in/the-one-whom-congress-puts-its-head-on-why-are-they-leaving/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Syed Mohammad Abbas]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 20 May 2022 10:23:36 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Main Slider]]></category>
		<category><![CDATA[ओपिनियन]]></category>
		<category><![CDATA[जुबिली डिबेट]]></category>
		<category><![CDATA[कांग्रेस]]></category>
		<category><![CDATA[गुजरात के युवा नेता हार्दिक पटेल]]></category>
		<category><![CDATA[चिंतन शिविर]]></category>
		<category><![CDATA[बुजुर्ग नेता सुनील जाखड़]]></category>
		<category><![CDATA[यशोदा श्रीवास्तव]]></category>
		<category><![CDATA[राजस्थान के उदयपुर में कांग्रेस]]></category>
		<category><![CDATA[सुनील जाखड़]]></category>
		<category><![CDATA[हार्दिक पटेल]]></category>
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					<description><![CDATA[यशोदा श्रीवास्तव राजस्थान के उदयपुर में कांग्रेस के तीन दिवसीय चिंतन शिविर का कांग्रेस जनों पर क्या और कितना प्रभाव होगा इसके प्रकटीकरण में वक्त लगेगा लेकिन इसके पहले साइड इफेक्ट दिखने लगा। जब चिंतन शिविर मे युवाओं को जोड़ने और कांग्रेस के बुजुर्गो के अनुभवों का अनुसरण करने की सीख दी जा रही थी &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color: #0000ff;"><strong><img loading="lazy" decoding="async" class="alignleft wp-image-251684" src="https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2022/03/yasoda-srivastav.jpg" alt="" width="126" height="193" />यशोदा श्रीवास्तव</strong></span></p>
<p>राजस्थान के उदयपुर में कांग्रेस के तीन दिवसीय चिंतन शिविर का कांग्रेस जनों पर क्या और कितना प्रभाव होगा इसके प्रकटीकरण में वक्त लगेगा लेकिन इसके पहले साइड इफेक्ट दिखने लगा।</p>
<p>जब चिंतन शिविर मे युवाओं को जोड़ने और कांग्रेस के बुजुर्गो के अनुभवों का अनुसरण करने की सीख दी जा रही थी तभी कांग्रेस के एक युवा नेता और एक बुजुर्ग नेता कांग्रेस से विदाई की तैयारी कर रहे थे।</p>
<p>चिंतन शिविर संपन्न होते ही गुजरात के युवा नेता हार्दिक पटेल और पंजाब के बुजुर्ग नेता सुनील जाखड़ ने पार्टी को सलाम कर लिया। 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद एक से एक कांग्रेस के युवाओं का हाथ का साथ छोड़ना कांग्रेस के लिए किसी त्रासदी से कम नहीं है।</p>
<p>राहुल गांधी जब कहते हैं कि कांग्रेस में डरकर रहने वालों की जगह नहीं है,ऐसे लोग जहां जाना चाहे जा सकते हैं,तो यह अनायास नहीं है। हां! राहुल की यह नसीहत नक्कारखाने में तूती की आवाज बनकर रह जाती है जबकि पार्टी छोडने वालों की कांग्रेस पर लगाए गए तोहमत मीडिया की सुर्खियां बन जाती है।</p>
<blockquote><p><span style="color: #ff6600;"><strong>दरअसल नेताओं के पार्टी छोड़ने जैसी घटनाएं अचानक नहीं होती। हकीकत यह है कि पार्टी नेतृत्व को कहीं न कहीं से यह भनक लग जाती है कि पार्टी का फलां नेता कभी भी साथ छोड़ सकता है और यह भी कि वह भाजपा या अन्य पार्टी के संपर्क में है,ऐसे में उस नेता की ओर ध्यान दिया जाना लगभग बंद कर दिया जाता है। उसे निकाला नहीं जाता,न उसके खिलाफ कोई कार्रवाई ही की जाती,अलवत्ता पार्टी में रहते हुए ही उसकी ऐसी उपेक्षा की जाती है कि वह खुद ही बोरिया बिस्तर बांध लें। </strong></span></p></blockquote>
<p>शायद पार्टी से दगा करने वाले नेताओं को किनारे लगाने का कांग्रेस का यही तरीका हो। हार्दिक पटेल गुजरात में पाटीदार समाज के बड़े युवा नेता की छवि रखते हैं।</p>
<p>]2019 में उन्होंने गुजरात की भाजपा और केंद्र की मोदी सरकार के खिलाफ करीब पांच लाख पाटीदार समाज की रैली कर भाजपा को बड़ी चुनौती दी थी। इस रैली के बाद परिस्थितियां बनी और हार्दिक पटेल कांग्रेस में दाखिल हो गए।</p>
<p>मौजूदा समय में वे गुजरात कांग्रेस के कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष थे। मात्र दो ढाई साल पहले पार्टी में दाखिल हुए किसी सख्श को इतना बड़ा पद देना, पार्टी में उपेक्षा तो नहीं ही कहा जा सकता लेकिन इस पद पर रहते हुए हार्दिक उपेक्षित थे।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-256223" src="https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2022/05/jakhad-suneel.jpg" alt="" width="634" height="361" srcset="https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2022/05/jakhad-suneel.jpg 634w, https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2022/05/jakhad-suneel-300x171.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 634px) 100vw, 634px" /></p>
<p>हार्दिक पटेल का कांग्रेस से अलग करने की पटकथा जिसने भी लिखी,बहुत सोच समझकर व पूरी तैयारी के साथ लिखी। राजनीति के मौजूदा दौर में हर कोई कांग्रेस के साथ खड़ा नहीं रह सकता। ऐसा व्यक्ति तो कत्तई नहीं जिसके ऊपर कोई मुकदमा या एफ आई आर हो।</p>
<p>हार्दिक पटेल के खिलाफ राष्ट्रद्रोह का केस चल रहा था। कुछ दिन पहले उनके ऊपर से यह केस हटा लिया गया। जाहिर है गुजरात सरकार के स्तर से यह कार्रवाई दरिया दिली के तहत नहीं,किसी डील के तहत ही हुई होगी। उसके बाद से कांग्रेस के प्रति हार्दिक के सुर बदलने लगे।</p>
<p>उन्हें पार्टी और उसके शीर्ष नेताओं में हजार कमियां दिखने लगी और इसी के साथ उनके भीतर राम भक्ति, राष्ट्र भक्ति, गुजरात भक्ति और अडानी अंबानी की भक्ति सब एक साथ हिलोरें मारने लगा। ऐसा पार्टी छोड़ने के बाद मीडिया में दिए गए उनके बयानों से साफ झलकता है। अंततः उन्होंने कांग्रेस का हाथ छोड़ दिया। वे अभी कोई पार्टी ज्वाइन नहीं किए लेकिन किस पार्टी में जाएंगे यह बताने की जरूरत नहीं।</p>
<p>कांग्रेस का साथ छोड़ने वाले हार्दिक पटेल अकेले युवा नेता नहीं हैं। हो सकता है आने वाले दिनों में एक दो और युवा नामचीन चेहरे पार्टी में न रहें जैसा कि राजस्थान, पंजाब और महाराष्ट्र से खबरें आ रही है। हार्दिक पटेल और उनके पहले अन्य युवा नेताओं का कांग्रेस छोड़ने की कहानी एक जैसी है। कांग्रेस पर उनके लगाए आरोपों में दम नहीं है लेकिन पंजाब के वरिष्ठ कांग्रेस नेता सुनील जाखड़ ने जिस तरह तथ्यपरक ढंग से अपनी बात रखते हुए पार्टी छोड़ी वह कांग्रेस को कुछ सोचने को जरूर मजबूर की होगी।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-256321" src="https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2022/05/congress.jpg" alt="" width="1272" height="601" srcset="https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2022/05/congress.jpg 1272w, https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2022/05/congress-300x142.jpg 300w, https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2022/05/congress-1024x484.jpg 1024w, https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2022/05/congress-768x363.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1272px) 100vw, 1272px" /></p>
<blockquote><p><span style="color: #ff6600;"><strong>पंजाब में कांग्रेस बुरी तरह चुनाव हारी है। उसके मुख्य मंत्री चन्नी और प्रदेश अध्यक्ष सिद्धू भी हारे। इस हार का ठीकरा न तो चन्नी पर फोड़ा गया और न ही सिद्धु पर,सुनील जाखड़ को क्यों निशाना बनाया गया यह बात समझ से परे है। कैप्टन अमरिंदर सिंह को बदलने से लेकर चन्नी को सीएम या सिद्धू को प्रदेश प्रधान बनाए जाने तक के मामले में सुनील जाखड़ की भूमिका सिर्फ खामोशी की थी। सिद्धू और कैप्टन तथा चन्नी और सिद्धू के बीच के विवाद सदैव मीडिया की सुर्खियां बनती थीं, पंजाब को लेकर कांग्रेस के ढुलमुल रवैए की हंसाई होती थी और नोटिस जाखड़ को? कांग्रेस छोड़ते वक्त सुनील जाखड़ ने अपने परिवार और कांग्रेस के पचास सालों के रिश्ते की बड़ी मार्मिक व्याख्या की। </strong></span></p></blockquote>
<p>उनके इस बात से असहमति होने की कोई गुंजाइश नहीं है कि उन्हें ऐसे व्यक्ति (तारिक अनवर)के दस्तखत से नोटिस दी गई जिसने सोनिया गांधी को एक विदेशी महिला कहकर पार्टी छोड़ दी थी।</p>
<p>कहना न होगा जहां कांग्रेस छोड़ने वाले अन्य तमाम लोग बे-सिर-पैर का आरोप लगाकर कांग्रेस छोड़ रहे हैं वहीं सुनील जाखड़ ने वाजिब और हृदय स्पर्शी कारणों को बताकर गुडलक कांग्रेस और गुडबाय कांग्रेस बोला। जाखड़ अब भाजपा में हैं और उम्मीद की जानी चाहिए कि 2024 की लोकसभा चुनाव के मद्देनजर भाजपा पंजाब की राजनीति में कैप्टन अमरिंदर और सुनील जाखड़ का भरपूर उपयोग करेगी।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-151841" src="https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2020/02/gujarat_court_issues_arrest_warrant_against_hardik_patel_in_2015_sedition_case_file_photo__1581074455.jpg" alt="" width="1200" height="900" srcset="https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2020/02/gujarat_court_issues_arrest_warrant_against_hardik_patel_in_2015_sedition_case_file_photo__1581074455.jpg 1200w, https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2020/02/gujarat_court_issues_arrest_warrant_against_hardik_patel_in_2015_sedition_case_file_photo__1581074455-300x225.jpg 300w, https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2020/02/gujarat_court_issues_arrest_warrant_against_hardik_patel_in_2015_sedition_case_file_photo__1581074455-1024x768.jpg 1024w, https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2020/02/gujarat_court_issues_arrest_warrant_against_hardik_patel_in_2015_sedition_case_file_photo__1581074455-768x576.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 1200px) 100vw, 1200px" /></p>
<p>हार्दिक और सुनील जाखड़ और कैप्टेन अमरिंदर के पहले कांग्रेस छोड़ने वाले नामों की लंबी फेहरिस्त है। यूपी में बीजेपी के मौजूदा हुक़ूमत में जितिन प्रसाद पीडब्ल्यूडी मिनिस्टर हैं।</p>
<p>ये जनाब यूपीए के दस वर्षों की सरकार में केंद्रीय मंत्री थे। विधानसभा चुनाव के पहले उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी थी। जितिन प्रसाद शाहजहां पुर ब्राम्हण राजघराने के युवराज हैं। इनके पिता स्व जितेंद्र प्रसाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रहे। प्रधानमंत्री रहे स्व. राजीव गांधी और स्व. पीवी नरसिंहा राव के राजनीतिक सलाहकार थे। यूं कहिए कि गांधी परिवार के खासमखास थे। जितिन प्रसाद कांग्रेस में बड़ा ब्राम्हण चेहरा थे,जो अब भाजपा के पास है। केंद्रीय उड्डयन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया भी बीजेपी में शामिल होने तक हरियाणा के प्रभारी रहे लेकिन बतौर प्रभारी हरियाणा कभी गये ही नहीं।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-250454" src="https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2022/03/congress-2-e1647187571372.jpg" alt="" width="600" height="327" /></p>
<p>विधानसभा चुनाव के ऐन वक्त कांग्रेस छोड़ने वाले आरपीएन सिंह भी यूपीए की सरकार में मंत्री थे। चुनाव हारने के बाद कांग्रेस ने उन्हें झारखंड का प्रभारी बनाया था।इसके पहले यूपी के अमेठी राजघराने से गांधी परिवार के खासमखास डा. संजय सिंह और प्रतापगढ़ की राजकुमारी रत्ना सिंह ने भी कांग्रेस छोड़ दी है।</p>
<p>उन्नाव से दो बार कांग्रेस सांसद रहीं अनु टंडन ने पार्टी छोड़ कर सपा ज्वाइन कर ली थी। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहे जगदंबिका पाल ने भी कांग्रेस छोड़ भाजपा ज्वाइन की है।</p>
<p>एक से एक कद्दावर नेताओं के पार्टी छोड़ने को लेकर कांग्रेस क्या सोचती है,यह तो वही जाने लेकिन जो लोग कांग्रेस को सत्ता में न सही,एक मजबूत विपक्ष के रूप में देखना चाहते हैं,वे इससे निराश जरूर हैं। एक आम नागरिक की प्रतिक्रिया काबिले गौर है कि उदयपुर के चिंतन शिविर में जहां सोनिया गांधी कांग्रेस के नेताओं से आवाहन करती हैं कि कांग्रेस ने तमाम नेताओं को बहुत कुछ दिया है,अब वक्त आ गया है कि वे भी पार्टी को कुछ दें वहीं पार्टी नेताओं का हाथ का साथ छोड़ना चिंता का विषय है।</p>
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		<item>
		<title>मोदी देउबा के मिलन से अब बेपटरी नहीं होंगे भारत-नेपाल सम्बन्ध</title>
		<link>https://www.jubileepost.in/india-nepal-relations-will-no-longer-be-derailed-by-the-meeting-of-modi-deuba/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Syed Mohammad Abbas]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 03 Apr 2022 14:26:30 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[जुबिली डिबेट]]></category>
		<category><![CDATA[काठमांडू]]></category>
		<category><![CDATA[चीन का दखल]]></category>
		<category><![CDATA[जेपी नड्डा]]></category>
		<category><![CDATA[नरेन्द्र मोदी]]></category>
		<category><![CDATA[नेपाल]]></category>
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		<category><![CDATA[प्रधानमंत्री]]></category>
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		<category><![CDATA[शेर बहादुर देउबा]]></category>
		<category><![CDATA[हिंदू राष्ट्र]]></category>
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					<description><![CDATA[यशोदा श्रीवास्तव नेपाली प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा और भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बीच हुई वार्ता के क्रम में फिर एक बार यह सच सामने आया कि नेपाल का भारत जैसा निकटवर्ती मित्र और पड़ोसी कोई तीसरा कभी नहीं हो सकता. 13 जुलाई 2021 को प्रधानमंत्री की शपथ लेने के बाद देउबा की यह पहली &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color: #0000ff;"><strong><img loading="lazy" decoding="async" class="alignleft wp-image-232204 size-thumbnail" src="https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2021/08/yashoda-srivastav-150x150.jpg" alt="" width="150" height="150" srcset="https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2021/08/yashoda-srivastav-150x150.jpg 150w, https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2021/08/yashoda-srivastav-300x300.jpg 300w, https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2021/08/yashoda-srivastav-1022x1024.jpg 1022w, https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2021/08/yashoda-srivastav-768x769.jpg 768w, https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2021/08/yashoda-srivastav.jpg 1079w" sizes="auto, (max-width: 150px) 100vw, 150px" />यशोदा श्रीवास्तव</strong></span></p>
<p>नेपाली प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा और भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बीच हुई वार्ता के क्रम में फिर एक बार यह सच सामने आया कि नेपाल का भारत जैसा निकटवर्ती मित्र और पड़ोसी कोई तीसरा कभी नहीं हो सकता. 13 जुलाई 2021 को प्रधानमंत्री की शपथ लेने के बाद देउबा की यह पहली भारत यात्रा है. अपनी पत्नी और कुछ मंत्री तथा उच्च प्रशासनिक अधिकारियों के साथ देउबा तीन दिवसीय भारत की यात्रा समाप्त कर रविवार को शाम काठमांडू लौट गए.</p>
<p>देउबा की इस यात्रा की खास बात यह रही कि दिल्ली प्रवास के अंतिम दिन यानी रविवार को बनारस बाबा विश्वनाथ की दर्शन करने के बाद वाया दिल्ली काठमांडू वापस हुए. यहां सीएम योगी ने देउबा का गर्मजोशी से स्वागत किया. दोनों के बीच कुछ देर की गुफ्तगू चर्चा का विषय बनी रही. बाबा विश्वनाथ और काठमांडू के पशुपतिनाथ का कनेक्शन कुछ तो है.</p>
<p>जब दो पड़ोसी राष्ट्रों का शीर्ष नेतृत्व मिलता है तो तमाम सारे मुद्दों और परियोजनाओं पर बात होती है. नेपाल में तो भारत की तमाम परियोजनाएं पहले से चल रही हैं जिसमें सड़क और बिजली की परियोजनाएं प्रमुख हैं. भारत नेपाल में हर संकट के समय बड़े भाई की तरह खड़ा रहा. पिछले वर्ष नेपाल में आए भूकंप के वक्त भारतीय पीएम मोदी ने दिल खोलकर नेपाल की मदद की. ओली के शासन काल में नेपाल में चीन का दखल बढ़ा, और भारत विरोध की हवा भी तेज हुई तो इसका असर नेपाल में भारत की परियोजनाओं पर भी पड़ा. कई या तो ठप हो गई या उसकी रफ्तार थम गई. देउबा और मोदी की मुलाकात में इन सारी परियोजनाओं को रफ्तार देने की बात हुई. 14 साल से ठप नेपाल की छोटी दूरी की रेल परिचालन शुरू होने की बात भी हुई. दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच वार्ता का सार यह रहा कि अब दोनों देशों के रिश्ते बेपटरी नहीं होंगे. भारत ने नेपाल को 75 नई परियोजनाओं की सौगात भी दी है.</p>
<p>ओली के शासन काल में भारत और नेपाल के बीच रिश्ते काफी तनाव पूर्ण थे. लिंपियाधुरा लिपुलेख व काला पानी विवाद चरम पर था. देउबा के भारत में मौजूदगी के वक्त इस मुद्दे को ज्यों का त्यों पड़ा रहने देने की पूरी कोशिश की गई. भारत और नेपाल दोनों चाहते थे कि गड़े मुर्दे उखाड़ कर माहौल कड़वा करने से बचा जाय.</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="aligncenter wp-image-252293 size-full" src="https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2022/04/modi-deuba.jpg" alt="" width="640" height="460" srcset="https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2022/04/modi-deuba.jpg 640w, https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2022/04/modi-deuba-300x216.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 640px) 100vw, 640px" /></p>
<p>देउबा और मोदी दोनों ही राष्ट्राध्यक्ष भारत और नेपाल के बीच मधुर संबंधों की बिल्कुल साफ नियत से इच्छुक हैं, इसका ताजा उदाहरण नेपाल के पश्चिमांचल में गंडकी अंचल के कास्की जिले में लाहाचोक नामक स्थान पर देउबा की भारत यात्रा के चार दिन पहले नेपाल की उर्जा मंत्री पंफा भुसाल द्वारा 42 कीमी मोदी लेखनाथ नामक ट्रांमिशन लाइन का उद्घाटन है. नेपाल में ऐसा पहली मर्तबा हुआ जब किसी परियोजना का उद्घाटन भारतीय पीएम के नाम से हुआ हो.</p>
<p>देउबा भारत की अपनी इस यात्रा पर सबसे पहले भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष जेपी नड्डा से मिले. नेपाल में इन दिनों स्थानीय निकाय का चुनाव चल रहा है. इस चुनाव में फिलहाल ओली के नेतृत्व वाली एमाले अकेले चुनाव लड़ने की रणनीति पर काम कर रही है जबकि पांच दलों के समर्थन से सरकार चला रही नेपाली कांग्रेस यह चुनाव अकेले लड़ेगी या गठबंधन के सहयोगी साथियों के साथ, इसे लेकर अभी फैसला होना बाकी है. वैसे इस चुनाव को लेकर नेपाल के माहौल पर गौर करें तो नेपाली कांग्रेस के सहयोगी दल भी अलग-अलग झंडा गाड़ कर चुनाव लड़ने को कमर कस चुके हैं.</p>
<blockquote><p><span style="color: #ff0000;"><strong>देउबा के भारत यात्रा और इस चुनाव का प्रत्यक्ष कोई तारतम्य भले न दिख रहा हो लेकिन करीब आठ माह बाद होने वाले दूसरे आम चुनाव के पूर्व गांव पालिका, नगर पालिका और महानगर पालिका के 743 सीटों का यह चुनाव दरअसल इस बात का लिटमस टेस्ट है कि केंद्रीय सत्ता में किस पार्टी का कब्जा होने वाला है.</strong></span></p></blockquote>
<p>नेपाल में बहुसंख्यक हिन्दू समुदाय की ओर से नेपाल के हिंदू राष्ट्र की पुनर्बहाली जोर पकड़ रही है. मधेश क्षेत्र के 22 जिलों में भारत की तर्ज पर तमाम हिंदू संगठन सक्रिय हो गए हैं साथ ही काठमांडू में भारत से जुड़ाव रखने वाले बड़े व्यवसाई व उद्योग पति भी हिन्दू राष्ट्र के हिमायती हैं. नेपाली प्रधानमंत्री देउबा ने पिछला आम चुनाव हिंदू राष्ट्र की पुनर्बहाली के मुद्दे पर ही लड़ा था लेकिन कामयाबी नहीं मिली थी.</p>
<p>देउबा के भारत दौरे को नेपाल में देउबा विरोधी उनके हिंदू एजेंडे से भी जोड़कर देख रहें हैं और मुमकिन है ओली के नेतृत्व वाली एमाले इसे हवा भी दे. नेपाल में इधर हाल के वर्षों में चौंकाने वाला मामला यह आया है कि तराई के इलाकों में कम्युनिस्ट और क्रिश्चियन समान रूप से बढ़े हैं. हैरत है कि भारत सीमा से सटे नेपाली जिला कपिलवस्तु तथा सिद्धार्थनगर में घर घर जहां कम्युनिस्ट के झंडे लहरा रहे हैं वहीं अनगिनत चर्च भी स्थापित हो गए हैं.</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="aligncenter wp-image-252295 size-full" src="https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2022/04/modi-nepal-pm.jpg" alt="" width="480" height="486" srcset="https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2022/04/modi-nepal-pm.jpg 480w, https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2022/04/modi-nepal-pm-296x300.jpg 296w" sizes="auto, (max-width: 480px) 100vw, 480px" /></p>
<p>पांचवीं बार पीएम बनें नेपाली कांग्रेस के शेरबहादुर देउबा को स्वाभाविक रूप से भारत समर्थक नेपाली राजनेता माना जाता है. नेपाल की राजनीति में नेपाली कांग्रेस को अन्य दलों की अपेक्षा भारत के करीबी पार्टी की दृष्टि से देखा जाना नया नहीं है.</p>
<p>ध्यान रहे 2016 में नेपाल को धर्म निरपेक्ष राष्ट्र घोषित करते वक्त प्रचंड तत्कालीन सरकार के साथ थे, अब वे देउबा के साथ हैं. ओली को सत्ता से दूर कर इस बार देउबा को इस कुर्सी तक पंहुचाने में प्रचंड की भूमिका को दुनिया ने खुली आंखो देखा है. ऐसे में नेपाल को मजबूत लोकतंत्रिक देश के रूप में देखने वाले लोकतांत्रिक देशों की नजर देउबा सरकार मे प्रचंड की भूमिका पर है. प्रचंड 2018 के आम चुनाव के पहले भी देउबा के ही नेतृत्व वाले नेपाली कांग्रेस सरकार के साथ थे. आम चुनाव आया तो नेपाल भर में चर्चा थी कि नेपाली कांग्रेस और माओवादी केंद्र (प्रचंड) साथ साथ चुनाव लड़ेंगे लेकिन प्रचंड ने एमाले (ओली) से हाथ मिलाकर नेपाली राजनीति के धुरंधर समीक्षकों और विश्लेषकों को चौंका दिया था.</p>
<p>नेपाल का यह पहला आम चुनाव बड़ा दिलचस्प था जब नेपाली कांग्रेस नेपाल के हिंदू राष्ट्र के पुर्नबहाली के मुद्दे पर चुनाव लड़ रही थी वहीं ओली का चुनावी मुद्दा खुलकर भारत विरोध का था. थोड़ा पीछे हटकर देखेंगे तो प्रचंड की राजनीतिक पृष्ठभूमि में उनका भारत विरोधी तेवर साफ नजर आएगा. प्रचंड ओली की सरकार के लिए किंगमेकर बनकर उभरे. ओली सरकार को मजबूती तथा नेपाल में वामपंथी विचारधारा को मजबूती देने की बड़ी कुर्बानी करते हुए प्रचंड ने अपनी पार्टी माओवादी केंद्र का ओली की वामपंथी दल एमाले में विलय तक कर लिया था. प्रचंड नई कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष मात्र थे. यह पुरानी बात हो गई है कि सत्ता में बराबर की भागीदारी को लेकर ओली और प्रचंड अलग अलग हुए और इसका परिणाम ओली के सत्ता च्युत तक पहुंच गया. कांग्रेस और वाम दल नेपाल की राजनीति में नदी के दो किनारे जैसा रहा. अब ये नेपाली कांग्रेस के नेतृत्व वाले सरकार के खेवनहार जैसा हैं. बताने की जरूरत नहीं कि नई सरकार के पास वक्त कम है, काम ज्यादा!</p>
<blockquote><p><span style="color: #ff0000;"><strong>कहना न होगा, राजशाही खत्म होने के बाद नेपाल के हिस्से में अदल बदलकर सरकार के वही पुराने चेहरे आते जाते रहे जो राजशाही के वक्त में थे. देउबा सरकार की बड़ी चुनौती है सरकार सरकार के खेल के इतर नेपाली जनता में परिवर्तन की अनुभूति दिलाना. यकीनन, देउबा सरकार यदि इसमें 50 प्रतिशत ही कामयाब हुई तो यह बड़ी बात होगी. मोदी और देउबा की मुलाकात के बाद भारत और नेपाल के बीच संबंधों की जो नई इबारत लिखी जा रही है, प्रचंड को कितना रास आएगा, इस बारे में कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी. हां नेपाल के बदले हालात के बाद प्रचंड के भारत विरोधी रुख में थोड़ी नरमी आई है. पिछले साल जब उत्तराखंड के लिपुलेख, लिंपियाधुरा और कालापानी को लेकर ओली ने भारत के खिलाफ आग उगलना शूरू किया तब प्रचंड ने ओली की भारत के प्रति कड़े मिजाज को गलत ठहराया था. प्रचंड अपनी भारत की नीति को लेकर कितना बदल पाए हैं, इसका आंकलन अभी ठीक नहीं है. आखिर इस बात को कैसे भूला जा सकता है कि 1996 में बतौर प्रधानमंत्री देउबा जब भारत की यात्रा पर थे तभी प्रचंड ने जनयुद्ध का बिगुल बजा दिया था. हां एक बात है कि भारत विरोध के मामले में ओली अलग थलग जरूर पड़ चुके हैं.</strong></span></p></blockquote>
<p>शेर बहादुर देउबा का बतौर प्रधानमंत्री यह पांचवी पारी है. और इसे संयोग ही कहा जाएगा कि उनके पांचवी पारी में पांच दलों का गठबंधन भी है. नेपाली कांग्रेस के 61, नेकपा माओवादी केंद के 49, नेकपा एमाले (माधव कुमार नेपाल पक्ष) के 26, जनता समाजवादी पार्टी (उपेन्द्र यादव समूह ) के 12 और राष्ट्रीय जनमोर्चा ‘नेपाल‘ का एक यानी कुल 149 सांसद शेर बहादुर देउबा के साथ हैं. आगे या दूसरे आम चुनाव तक यह गठबंधन यदि बना रहा तो देउबा के छठवीं पारी की संभावना प्रबल है और यदि बीच में किसी मुद्दे को लेकर टकराव हुआ और नेपाली कांग्रेस, माओवादी केंद्र,एमाले तथा मधेशी दल अलग-अलग चुनाव लड़े तो ओली के नेतृत्व वाली एमाले केंद्रीय सत्ता के लिए बड़ा दल बनकर उभरेगा और नेपाल में एक बार फिर सरकार सरकार का खेल शुरू होगा. ऐसे में नेपाली जनता जिसे परिवर्तन की अनुभूति का इंतजार है वह फिर स्वयं को ठगा ही महसूस करेगी.</p>
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