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	<title>लिट्फेस्ट Archives &#060; Jubilee Post | जुबिली पोस्ट</title>
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		<title>काशी में अमरत्व का मार्ग बन जाती है मृत्यु </title>
		<link>https://www.jubileepost.in/death-becomes-the-path-to-immortality/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Utkarsh Sinha]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 30 Apr 2026 09:29:44 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Main Slider]]></category>
		<category><![CDATA[लिट्फेस्ट]]></category>
		<category><![CDATA[अमरत्व]]></category>
		<category><![CDATA[काशी]]></category>
		<category><![CDATA[लेनिन रघुवंशी]]></category>
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					<description><![CDATA[जुबिली न्यूज डेस्क वाराणसी। काशी विश्वनाथ मंदिर ट्रस्ट के निवर्तमान चेयरमैन एवं प्रख्यात ज्योतिषाचार्य प्रो. नागेंद्र पांडेय ने कहा कि काशी वह अद्वितीय नगरी है,&#160;जहां मृत्यु भी अमरत्व का मार्ग बन जाती है। काशी विश्वनाथ की इस पावन भूमि पर जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर समाप्त हो जाता है और मरण को भी &#8230;]]></description>
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<p></p>



<p class="has-vivid-red-color has-text-color has-link-color has-medium-font-size wp-elements-8a607faccae08423007a0bf2eb18b721"><strong>जुबिली न्यूज डेस्क</strong></p>



<p class="has-medium-font-size">वाराणसी। काशी विश्वनाथ मंदिर ट्रस्ट के निवर्तमान चेयरमैन एवं प्रख्यात ज्योतिषाचार्य प्रो. नागेंद्र पांडेय ने कहा कि काशी वह अद्वितीय नगरी है,&nbsp;जहां मृत्यु भी अमरत्व का मार्ग बन जाती है। काशी विश्वनाथ की इस पावन भूमि पर जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर समाप्त हो जाता है और मरण को भी मंगल माना जाता है। काशी केवल एक शहर नहीं,&nbsp;बल्कि एक ऐसी आध्यात्मिक सत्ता है,&nbsp;जो भौतिक धरातल से ऊपर उठकर आत्मिक चेतना का अनुभव कराती है।</p>



<p class="has-medium-font-size">प्रो. पांडेय मड़ौली स्थित मेहता आर्ट गैलरी में आयोजित&nbsp;‘कोरस-2026’&nbsp;के तहत&nbsp;“काशी”&nbsp;पुस्तक पर परिचर्चा के दौरान बोल रहे थे। इस कार्यक्रम का आयोजन वरिष्ठ चित्रकार अमित कुमार के संयोजन में किया गया। परिचर्चा में उन्होंने कहा कि काशी में आने वाला व्यक्ति भोग-विलास के लिए नहीं,&nbsp;बल्कि मुक्ति की तलाश में आता है। गंगा घाटों पर बनी कोठियां और आश्रम भी इसी उद्देश्य से निर्मित हैं,&nbsp;जहां लोग अपने जीवन के अंतिम समय में रहकर गंगा स्नान,&nbsp;बाबा विश्वनाथ के दर्शन-पूजन और साधना के माध्यम से मोक्ष प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। मान्यता है कि काशी में देह त्यागने वाला व्यक्ति जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है। यही कारण है कि देश-विदेश से बड़ी संख्या में लोग अपने जीवन के अंतिम समय में काशी का रुख करते हैं।</p>



<p class="has-medium-font-size">डॉ. लेनिन रघुवंशी,&nbsp;जय मिश्रा और श्रुति नागवंशी द्वारा लिखित पुस्तक&nbsp;“काशी”&nbsp;का उल्लेख करते हुए प्रो. पांडेय ने कहा कि यह पुस्तक गहन साधना और अध्ययन का परिणाम है। इसमें काशी को व्यापक और उदार दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया है,&nbsp;जो पाठकों को इस नगरी की आध्यात्मिक गहराई से परिचित कराती है। उन्होंने कहा कि अज्ञात को जानना ही वास्तविक साधना है और काशी इस साधना का सर्वोत्तम केंद्र है। काशी वास्तव में भोग की नहीं,&nbsp;बल्कि मुक्ति की नगरी है,&nbsp;जहां हर क्षण आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता है।</p>



<p class="has-medium-font-size">वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ भट्टाचार्य ने कहा कि यह शहर न केवल आस्था का केंद्र है,&nbsp;बल्कि विभिन्न धर्मों और परंपराओं का अद्वितीय संगम भी है। यह एक ऐसा शहर है,&nbsp;जहां विभिन्न विचारधाराएं और आस्थाएं बिना टकराव के सह-अस्तित्व में रहती हैं। वर्तमान समय में वाराणसी में करीब&nbsp;26&nbsp;धर्मों के अस्तित्व के संकेत मिलते हैं,&nbsp;जिनके अनुयायियों की संख्या विश्व स्तर पर एक करोड़ से अधिक है।</p>



<p class="has-medium-font-size">काशी में सनातन धर्म की विभिन्न शाखाएं और परंपराएं मौजूद हैं। इस शहर की मिट्टी और पानी में कुछ ऐसा विशेष तत्व है,&nbsp;जो यहां आने वाले व्यक्ति को प्रभावित करता है। काशी का स्वभाव स्वतंत्रता और खुलापन है। यहां हर व्यक्ति बंधनों को सहजता से स्वीकार नहीं करता और अपनी विशिष्ट जीवन शैली को बनाए रखता है।</p>



<p class="has-medium-font-size">राजनीतिक संदर्भों से दूरी बनाते हुए अमिताभ भट्टाचार्य ने कहा कि काशी किसी एक व्यक्ति या विचारधारा की नहीं,&nbsp;बल्कि सभी की है और अपनी मौलिकता के साथ सदैव बनी रहेगी। गंगा नदी का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि उसकी धारा भी पारंपरिक दिशा से हटकर बहती है,&nbsp;जो आत्मनिर्भरता और अलग सोच का प्रतीक है। उन्होंने उम्मीद जताई कि&nbsp;“काशी”&nbsp;पुस्तक की तरह आने वाले वर्षों में इस विषय पर और गहन अध्ययन सामने आएंगे।</p>



<p class="has-medium-font-size">काशी की सामाजिक,&nbsp;धार्मिक और ऐतिहासिक जटिलताओं को रेखांकित करते हुए वरिष्ठ पत्रकार अजय राय ने कहा कि बनारस को केवल एक शहर के रूप में देखना उसकी आत्मा को सीमित करना है। काशी एक जीवंत&nbsp;‘विचार’&nbsp;है,&nbsp;जिसे समय,&nbsp;समाज और परंपराओं के संदर्भ में समझना आवश्यक है। काशी की समावेशी छवि पर सवाल उठाते हुए उन्होंने ऐतिहासिक संदर्भ दिया कि वर्ष&nbsp;1957&nbsp;से पहले काशी विश्वनाथ मंदिर में दलितों के प्रवेश को लेकर पाबंदियां थीं। यह मान लेना कि काशी हमेशा से पूरी तरह समरस और समानतापूर्ण रही है,&nbsp;इतिहास की जटिलताओं को नजरअंदाज करना होगा।</p>



<p class="has-medium-font-size">उन्होंने स्कंद पुराण का हवाला देते हुए कहा कि काशी में मोक्ष की अवधारणा भी सरल नहीं है। उनके अनुसार केवल काशी में मृत्यु हो जाना मोक्ष की गारंटी नहीं है,&nbsp;बल्कि जीवन की साधना और आचरण भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। आज काशी में&nbsp;‘मोक्ष’&nbsp;की अवधारणा को सतही रूप में देखा जा रहा है और श्मशानों के सौंदर्यीकरण पर जोर दिया जा रहा है,&nbsp;जो काशी की मूल आध्यात्मिक भावना के अनुरूप नहीं है। काशी का वातावरण समय के साथ बदलता रहा है और इसे समझने के लिए गहराई से अध्ययन और निरंतर लेखन की आवश्यकता है।&nbsp;“काशी”&nbsp;पुस्तक के लेखकों की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि बनारस की वास्तविक तस्वीर को सामने लाने के लिए और अधिक शोध व विमर्श होना चाहिए।</p>



<p class="has-medium-font-size">वरिष्ठ पत्रकार कुमार विजय ने कहा कि बनारस को केवल एक शहर के रूप में देखना उसकी आत्मा को सीमित करना है। काशी एक जीवंत&nbsp;‘विचार’&nbsp;है,&nbsp;जिसे समय,&nbsp;समाज और परंपराओं के संदर्भ में समझना आवश्यक है। काशी की समावेशी छवि पर सवाल उठाते हुए उन्होंने भी ऐतिहासिक संदर्भ दिया कि वर्ष&nbsp;1957&nbsp;से पहले काशी विश्वनाथ मंदिर में दलितों के प्रवेश पर पाबंदियां थीं। यह मान लेना कि काशी हमेशा से पूरी तरह समरस रही है,&nbsp;इतिहास की जटिलताओं की अनदेखी होगी।&nbsp;उन्होंने कहा कि धार्मिक मान्यताओं के संदर्भ में स्कंद पुराण में भी उल्लेख मिलता है कि काशी में मोक्ष की अवधारणा सरल नहीं है। केवल यहां मृत्यु हो जाना पर्याप्त नहीं,&nbsp;बल्कि जीवन का आचरण और साधना भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। वर्तमान समय में मोक्ष की अवधारणा को सतही रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है,&nbsp;जबकि इसके गहन अर्थ को समझने की आवश्यकता है।</p>



<p class="has-medium-font-size">इतिहासकार डॉ. मोहम्मद आरिफ ने काशी की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक बहुलता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह शहर हमेशा से विभिन्न धार्मिक धाराओं का केंद्र रहा है,&nbsp;जो इसे अन्य शहरों से अलग बनाता है। ग़ालिब ने भी काशी की सांस्कृतिक समृद्धि और बौद्धिक वातावरण की सराहना की थी। कबीर और तुलसीदास की रचनाओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि काशी ने सदैव मानवीय मूल्यों और प्रेम की भावना को केंद्र में रखा।&nbsp;“काशी”&nbsp;पुस्तक भी इसी बहुलतावादी परंपरा की ओर संकेत करती है और शोधार्थियों को नए दृष्टिकोण से इस शहर को समझने का अवसर प्रदान करती है।</p>



<p class="has-medium-font-size">कार्यक्रम का संचालन सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. लेनिन रघुवंशी ने किया,&nbsp;जबकि वरिष्ठ पत्रकार विजय विनीत ने आगंतुकों के प्रति आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर चित्रकार अमित कुमार की सार्थक पहल की सराहना की गई और उन्हें सम्मानित किया गया। परिचर्चा में ग्रामीण पत्रकार एसोसिएशन के जिलाध्यक्ष सी.बी. तिवारी&nbsp;‘राजकुमार’,&nbsp;राहुल यादव,&nbsp;एक्टिविस्ट इदरीस अंसारी,&nbsp;पंकजपति पाठक,&nbsp;मंगला प्रसाद राजभर,&nbsp;डॉ. शम्मी कुमार सिंह,&nbsp;विकास दुबे,&nbsp;चंद्र मिश्र सहित अन्य लोग उपस्थित रहे।</p>
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			</item>
		<item>
		<title>इश्क की रोटियाँ I खमीरी  I एपिसोड 4</title>
		<link>https://www.jubileepost.in/ishq-ki-rotiyan-episode-4/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Utkarsh Sinha]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 10 Apr 2026 10:00:32 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[लिट्फेस्ट]]></category>
		<category><![CDATA[आडियो बुक]]></category>
		<category><![CDATA[इश्क की रोटियाँ]]></category>
		<category><![CDATA[कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[खमीरी रोटी]]></category>
		<category><![CDATA[जुबिली पोस्ट]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य]]></category>
		<category><![CDATA[हिंदी समाचार]]></category>
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					<description><![CDATA[इश्क महलों में ही हो , ये कोई जरुरी तो नहीं … लहराती फसलों में , बहती नदी के किनारे , या फिर जंग के मैदान में … ये इश्क ही तो है जो हर जगह अपनी शिद्दत से मौजूद रहता है …. यहाँ तक की रोटियों में भी इश्क गुंथा हुआ है …… इश्क &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p>इश्क महलों में ही हो , ये कोई जरुरी तो नहीं … लहराती फसलों में , बहती नदी के किनारे , या फिर जंग के मैदान में … ये इश्क ही तो है जो हर जगह अपनी शिद्दत से मौजूद रहता है …. यहाँ तक की रोटियों में भी इश्क गुंथा हुआ है …… इश्क की रोटियाँ के चौथे एपिसोड में एक नयी कहानी के साथ हाज़िर हूँ .. मैं उत्कर्ष सिन्हा ….. कहानी खमीरी रोटी की है और शीर्षक है …. जंग के मैदान में रुबाब की दुआ…. तो सुनिए ….</p>



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<iframe title="ISHQ KI ROTIYAN : KHAMIRI  I EPISODE 4" width="1220" height="686" src="https://www.youtube.com/embed/enxQ_eIDa5Y?feature=oembed" frameborder="0" allow="accelerometer; autoplay; clipboard-write; encrypted-media; gyroscope; picture-in-picture; web-share" referrerpolicy="strict-origin-when-cross-origin" allowfullscreen></iframe>   
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<p></p>
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			</item>
		<item>
		<title>इश्क की रोटियाँ I गोजुबान I एपिसोड 3</title>
		<link>https://www.jubileepost.in/ish-ki-rotiyan-episod-3/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Utkarsh Sinha]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 05 Apr 2026 12:06:15 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[लिट्फेस्ट]]></category>
		<category><![CDATA[इश्क की रोटियां]]></category>
		<category><![CDATA[कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[लखनऊ]]></category>
		<category><![CDATA[लखनऊ का खाना]]></category>
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					<description><![CDATA[AUDIO BOOK जो इश्क में यकीन रखते हैं, उनके हर निवाले में भी इश्क घुला रहता है , ये कहानी सुनिए और फिर कल्पना कीजिए, और फिर जब रोटी खाइए तो उसके साथ इश्क की लज्ज़त महसूस होगी&#8230;&#8230; तो अब किस्सों के इस दस्तरख़ान पर बैठें, एक नयी रोटी तोड़ें, और इश्क चखें। इश्क की &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="has-vivid-red-color has-text-color has-link-color wp-elements-2f17cc12fdff9f8d15f00bea6eff35c0"><strong>AUDIO BOOK</strong></p>



<p class="has-medium-font-size">जो इश्क में यकीन रखते हैं, उनके हर निवाले में भी इश्क घुला रहता है , ये कहानी सुनिए और फिर कल्पना कीजिए, और फिर जब रोटी खाइए तो उसके साथ इश्क की लज्ज़त महसूस होगी&#8230;&#8230; तो अब किस्सों के इस दस्तरख़ान पर बैठें, एक नयी रोटी तोड़ें, और इश्क चखें।</p>



<p class="has-medium-font-size">इश्क की रोटियां सीरिज की तीसरी कहानी ले कर हाज़िर हैं &#8230; उत्कर्ष सिन्हा </p>



<figure class="wp-block-embed"><div class="wp-block-embed__wrapper">
<iframe loading="lazy" title="ISHQ ki ROTIYAN : GOZUBAN I EPISODE 3" width="1220" height="686" src="https://www.youtube.com/embed/b8jQPvcG6gE?feature=oembed" frameborder="0" allow="accelerometer; autoplay; clipboard-write; encrypted-media; gyroscope; picture-in-picture; web-share" referrerpolicy="strict-origin-when-cross-origin" allowfullscreen></iframe>    
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<p></p>
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			</item>
		<item>
		<title>काशी: आस्था के उजाले और यथार्थ की छाया के बीच एक जरूरी पाठ</title>
		<link>https://www.jubileepost.in/book-review-kashi/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Utkarsh Sinha]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 05 Apr 2026 10:23:34 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[लिट्फेस्ट]]></category>
		<category><![CDATA[kashi Book by Lelin]]></category>
		<category><![CDATA[काशी]]></category>
		<category><![CDATA[जुबिली पोस्ट]]></category>
		<category><![CDATA[वाराणसी पर किताब]]></category>
		<category><![CDATA[हिंदी समाचार]]></category>
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					<description><![CDATA[विजय शंकर चतुर्वेदी किसी शहर को सच में समझना हो तो उसकी इमारतों या उसकी प्रसिद्धि को नहीं, बल्कि उसके लोगों के जीवन को देखना पड़ता है। ‘काशी’ पुस्तक इसी समझ की ओर ले जाती है। लेनिन रघुवंशी, चंद्र मिश्रा और श्रुति नागवंशी की यह कृति काशी को केवल श्रद्धा और परंपरा के प्रतीक के &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="has-vivid-red-color has-text-color has-link-color has-medium-font-size wp-elements-638d7a26ec0141a4135d701faa827de4"><strong>विजय शंकर चतुर्वेदी </strong><br></p>



<p class="has-medium-font-size">किसी शहर को सच में समझना हो तो उसकी इमारतों या उसकी प्रसिद्धि को नहीं, बल्कि उसके लोगों के जीवन को देखना पड़ता है। ‘काशी’ पुस्तक इसी समझ की ओर ले जाती है। लेनिन रघुवंशी, चंद्र मिश्रा और श्रुति नागवंशी की यह कृति काशी को केवल श्रद्धा और परंपरा के प्रतीक के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवित, सांस लेती हुई सामाजिक दुनिया के रूप में प्रस्तुत करती है—जहाँ आस्था है, लेकिन उसके साथ कई अनकहे संघर्ष भी हैं।<br>किताब की शुरुआत ही एक ऐसे दृश्य से होती है जो धीरे-धीरे मन में उतरता है—सुबह का काशी, जहाँ एक बुनकर अपने करघे पर झुका है, एक सफाईकर्मी दिन की शुरुआत से पहले शहर को संवार रहा है, और एक विधवा चुपचाप दीप जला रही है। यह वही काशी है जो अक्सर दिखाई नहीं देती, लेकिन जिसकी उपस्थिति सबसे गहरी है। यही इस पुस्तक की असली ताकत है—यह हमें काशी को देखने नहीं, उसे महसूस करने के लिए प्रेरित करती है।<br></p>



<p class="has-medium-font-size">लेखक काशी को किसी एक छवि में बाँधने से बचते हैं। वे दिखाते हैं कि यह शहर एक साथ कई दिशाओं में चल रहा है—एक ओर विकास, पर्यटन और आधुनिकता का विस्तार है, तो दूसरी ओर वे लोग हैं जिनके श्रम से यह शहर जीवित है, पर जिनकी कहानियाँ अक्सर किनारे छूट जाती हैं। इस द्वंद्व को पुस्तक बिना शोर किए, लेकिन गहरी संवेदना के साथ सामने लाती है।<br></p>



<p class="has-medium-font-size">इस किताब का एक विशेष गुण यह है कि यह धार्मिक परंपराओं को केवल श्रद्धा से नहीं, समझ और सवाल के साथ देखती है। महादेव, कबीर और रैदास जैसे प्रतीकों के माध्यम से यह याद दिलाया गया है कि भारतीय परंपरा के भीतर ही समानता और मानवता की एक मजबूत धारा मौजूद रही है। शिव के चांडाल रूप की कथा यहाँ केवल एक प्रसंग नहीं, बल्कि एक संकेत है—कि सच्ची आध्यात्मिकता विभाजन नहीं, बल्कि समानता की ओर ले जाती है।<br>किताब का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष है—उसका ज़मीन से जुड़ा हुआ यथार्थ। जाति, गरीबी, शिक्षा की असमानता और महिलाओं की स्थिति जैसे मुद्दे यहाँ सीधे और साफ़ तरीके से सामने आते हैं। यह लेखन आरोप लगाने वाला नहीं है, बल्कि अनुभवों को सामने रखकर पाठक को सोचने के लिए आमंत्रित करता है।<br></p>



<p class="has-medium-font-size">चंद्रमा जैसी एक साधारण महिला का अपने समुदाय में जागरूकता फैलाना, या रोहित जैसे बच्चे की कहानी जो व्यवस्था की खामियों का शिकार बनता है—ये प्रसंग पाठक को भीतर तक छूते हैं। ये केवल घटनाएँ नहीं हैं, बल्कि यह दिखाते हैं कि कठिन परिस्थितियों के बीच भी बदलाव की संभावनाएँ जीवित रहती हैं।<br></p>



<p class="has-medium-font-size">हालाँकि, किताब अपने व्यापक विषयों के कारण कुछ जगहों पर थोड़ी बोझिल लग सकती है। दर्शन, समाज और अधिकारों की बातों को एक साथ रखने की कोशिश में कुछ हिस्से सामान्य पाठक के लिए थोड़े धीमे पड़ जाते हैं। अगर भाषा और संरचना कुछ स्थानों पर और सरल होती, तो इसका प्रभाव अधिक व्यापक हो सकता था। इसी तरह, शहर में हो रहे बदलावों को लेकर पुस्तक का दृष्टिकोण मुख्यतः चिंतनशील और आलोचनात्मक है। विकास के सकारात्मक पहलुओं—जैसे रोज़गार के नए अवसर या बुनियादी सुविधाओं में सुधार—पर अपेक्षाकृत कम ध्यान गया है। यदि इन पक्षों को भी साथ रखा जाता, तो चित्र और संतुलित बन सकता था।<br></p>



<p class="has-medium-font-size">फिर भी, इन बातों के बावजूद, ‘काशी’ एक ऐसी किताब है जो अपने पाठक को ठहरकर सोचने के लिए मजबूर करती है। यह हमें याद दिलाती है कि किसी भी शहर की असली पहचान उसकी भव्यता में नहीं, बल्कि उन लोगों में बसती है जो उसे हर दिन जीते हैं।<br></p>



<p class="has-medium-font-size">यह पुस्तक एक शांत लेकिन गहरा प्रश्न हमारे सामने रखती है—क्या हम काशी को केवल एक दर्शनीय स्थल के रूप में देखना चाहते हैं, या एक ऐसे जीवंत समाज के रूप में समझना चाहते हैं जहाँ सम्मान, समानता और संवेदना की जगह हो?<br></p>



<p class="has-medium-font-size">‘काशी’ केवल एक शहर की कथा नहीं, बल्कि हमारे समय का एक आईना है। यह पुस्तक हमें सोचने के लिए प्रेरित करती है कि विकास व परंपरा के बीच संतुलन कैसे साधा जाए, और उस संतुलन में मनुष्य की गरिमा को कैसे सुरक्षित रखा जाए। यही इसकी सबसे बड़ी सार्थकता है—और यही इसे महत्वपूर्ण व पठनीय भी बनाती हैं . </p>



<p>(<em>विजयशंकर चतुर्वेदी हिन्दी के प्रतिष्ठित कवि, पत्रकार और वैचारिक लेखक हैं।  तीन दशकों से अधिक के अनुभव के साथ वे विभिन्न प्रमुख समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं और मीडिया माध्यमों से जुड़े रहे हैं। इन दिनों वे स्वतंत्र लेखन और पुस्तक-संपादन में सक्रिय हैं।</em>)</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>इश्क की रोटियां : एपिसोड 2 &#8211; बकरख्वानी</title>
		<link>https://www.jubileepost.in/ishq-ki-rotiyan-episode-2/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Utkarsh Sinha]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 31 Mar 2026 13:17:31 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[लिट्फेस्ट]]></category>
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					<description><![CDATA[लखनऊ की रोटियां सिर्फ एक रोटी नहीं बल्कि इश्क की एक मुकम्मल दास्ताँन है.. इश्क और रोटी का रिश्ता पुराना है। रोटी आटे से बनती है, इश्क दिल से। दोनों गूंथे जाते हैं – धीरे-धीरे, धैर्य से… लखनऊ की रोटियों के पीछे इश्क की कहानी है कल्पना लेखक और पत्रकार डा. उत्कर्ष सिन्हा की … &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<h1 class="wp-block-heading"></h1>



<p class="has-medium-font-size">लखनऊ की रोटियां सिर्फ एक रोटी नहीं बल्कि इश्क की एक मुकम्मल दास्ताँन है.. इश्क और रोटी का रिश्ता पुराना है। रोटी आटे से बनती है, इश्क दिल से। दोनों गूंथे जाते हैं – धीरे-धीरे, धैर्य से… लखनऊ की रोटियों के पीछे इश्क की कहानी है कल्पना लेखक और पत्रकार <strong>डा. उत्कर्ष सिन्हा</strong> की …</p>



<p class="has-medium-font-size">इश्क की रोटियां सीरीज की दूसरी कहानी है बकरख्वानी नाम की रोटी की<br>सुनिए ये कहानी समय : 10 मिनटइश्क की रोटियां सीरीज की दूसरी कहानी है बकरख्वानी नाम की रोटी की<br>सुनिए ये कहानी समय : 10 मिनट</p>



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<p></p>
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