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	<title>लिट्फेस्ट Archives &#060; Jubilee Post | जुबिली पोस्ट</title>
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	<description>News &#38; Information Portal</description>
	<lastBuildDate>Sat, 30 May 2026 13:30:40 +0000</lastBuildDate>
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		<title>पाठको के बीच भोजपुरी साहित्य को वापस लाने  में जुटा है सर्व भाषा ट्रस्ट  </title>
		<link>https://www.jubileepost.in/revival-of-bhojpuri-litrature/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Utkarsh Sinha]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 30 May 2026 13:30:38 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Main Slider]]></category>
		<category><![CDATA[लिट्फेस्ट]]></category>
		<category><![CDATA[जुबिली पोस्ट]]></category>
		<category><![CDATA[भोजपुरी साहित्य]]></category>
		<category><![CDATA[सर्व भाषा ट्रस्ट]]></category>
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					<description><![CDATA[डा. उत्कर्ष सिन्हा भोजपुरी भाषा, जिसके बोलने वाले करोड़ों में हैं, सदियों से एक समृद्ध साहित्यिक परंपरा रखती है, लेकिन व्यावहारिक स्तर पर यह भाषा और उसका साहित्य वर्षों से हाशिये पर पड़ा रहा है। ऐसे में जब लगे कि भोजपुरी साहित्य हमेशा के लिए पीछे छूट जाएगा, तब सर्व भाषा ट्रस्ट के मुखिया केशव &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph"></p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>



<p class="has-medium-font-size wp-block-paragraph"><strong>डा. उत्कर्ष सिन्हा </strong><strong></strong></p>



<p class="has-medium-font-size wp-block-paragraph">भोजपुरी भाषा, जिसके बोलने वाले करोड़ों में हैं, सदियों से एक समृद्ध साहित्यिक परंपरा रखती है, लेकिन व्यावहारिक स्तर पर यह भाषा और उसका साहित्य वर्षों से हाशिये पर पड़ा रहा है। ऐसे में जब लगे कि भोजपुरी साहित्य हमेशा के लिए पीछे छूट जाएगा, तब सर्व भाषा ट्रस्ट के मुखिया केशव मोहन पांडेय ने इस भाषा के साहित्य को जनता के बीच वापस लाने का बीड़ा उठाया है । केशव पांडेय  अपनी  दूरदर्शिता, अथक परिश्रम और साहित्य के प्रति गहरी समर्पण भावना के कारण भोजपुरी साहित्य जगत और विभिन्न भाषाओँ में पुस्तकों के प्रकाशन के क्षेत्र  में एक अलग पहचान बना चुके हैं। उनकी इस पहल ने न केवल भोजपुरी साहित्य को नई जान दी है, बल्कि करोड़ों भोजपुरी भाषी लोगों को उनके साहित्यिक विरासत से फिर से जोड़ा है।</p>



<p class="has-medium-font-size wp-block-paragraph">सर्व भाषा ट्रस्ट पिछले दो वर्षों से प्रकाशन की दिशा में सक्रिय है और इस छोटे काल खंड में अब तक लगभग 500 पुस्तकों का प्रकाशन कर चुका है। इसमें भोजपुरी भाषा की पुस्तकों को विशेष प्राथमिकता दी गई है। केशव पांडेय के नेतृत्व में ट्रस्ट द्वारा भोजपुरी भाषा में कई मूल्यवान पुस्तकों का प्रकाशन किया गया है। इनमें सबसे उल्लेखनीय है &#8220;भोजपुरी शब्दानुशासन&#8221; नामक पुस्तक, जिसका मूल प्रकाशन 1975 में हुआ था। यह पुस्तक भोजपुरी भाषा की एक बहुमूल्य थाती है, जिसे सर्व भाषा ट्रस्ट द्वारा फिर से प्रकाशित किया गया है। इस पुस्तक के प्रकाशन में &#8216;निर्भीक&#8217; जी के पुत्र और उनकी साहित्यिक वारिसों की अनुमति महत्वपूर्ण रही है। &nbsp;</p>



<p class="has-medium-font-size wp-block-paragraph">सर्व भाषा ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित &nbsp;महत्वपूर्ण भोजपुरी पुस्तक में &#8220;प्रतिनिधि कविता: भोजपुरी&#8221; भी &nbsp;शामिल है, जिसका संपादन अरुणेश नीरंजन और डॉ. बलभद्र द्वारा किया गया है। इस पुस्तक के प्रकाशन से भोजपुरी कविता के प्रतिनिधि नमूने पाठकों तक पहुंचे हैं। इसके अलावा, ट्रस्ट द्वारा &#8220;मुंबई नाइट्स&#8221; नामक क्राइम फिक्शन का भोजर्फी अनुवाद भी छपने वाला है, जो भोजपुरी भाषा में आधुनिक साहित्य की विधाओं को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।</p>



<p class="has-medium-font-size wp-block-paragraph">इसके अलावा, नरेंद्र शास्त्री की पुस्तकों को भी सर्व भाषा ट्रस्ट ने प्रकाशित किया है। नरेंद्र शास्त्री भारतीय साहित्य के एक महत्वपूर्ण लेखक हैं, और उनकी पुस्तकों का भोजपुरी और अन्य भाषाओं में प्रकाशन केशव पांडेय की बहुभाषी दृष्टि का प्रमाण है। ट्रस्ट के तहत नरेंद्र शास्त्री की विभिन्न रचनाओं को प्रकाशित करके केशव पांडेय ने यह साबित किया है कि वे केवल भोजपुरी साहित्य तक सीमित नहीं हैं, बल्कि भारतीय साहित्य की समग्र समृद्धि के लिए कार्य कर रहे हैं।</p>



<p class="has-medium-font-size wp-block-paragraph">आम पाठको के बीच भोजपुरी को प्रोत्साहित करने के लिए केशव पांडेय की एक अनोखी योजना है, जो पाठकों को साहित्य तक पहुंचने में सक्षम बनाती है। उनकी योजना के अनुसार, पाठकों को केवल 500 रुपए में हिंदी के मशहूर लेखकों की 3 पुस्तकें और 1,000 रुपए में 5 पुस्तकें उपलब्ध कराई जाएंगी। इसके अलावा, 10,000 रुपए में किसी भी भाषा के अलग-अलग विधाओं की 100 पुस्तकें खरीदी जा सकती हैं। बच्चों और युवा लोगों के लिए इस योजना में विशेष छूट दी जाएगी, जिससे भविष्य की पीढ़ियां साहित्य से जुड़ सकें।</p>



<p class="has-medium-font-size wp-block-paragraph">यह योजना साहित्य के लोकतंत्रीकरण की एक बेहतरीन मिसाल है, जहां केशव पांडेय ने साहित्य को केवल धनी वर्ग तक सीमित न रहने देकर आम जनता के लिए सुलभ बनाया है।</p>



<p class="has-medium-font-size wp-block-paragraph">केशव पांडेय की यह पहल इसलिए भी सराहनीय है क्योंकि वे न केवल एक प्रकाशक हैं, बल्कि एक साहित्य सेवक हैं जो भाषा और साहित्य के प्रति गहरी समर्पण भावना रखते हैं। उनकी दूरदर्शिता इस बात में दिखती है कि वे भोजपुरी जैसी हाशिए पर पड़ी भाषा के साहित्य को बचाने के लिए आगे आए। उनकी अथक परिश्रमशीलता इस बात में स्पष्ट है कि दो वर्षों में ही ट्रस्ट ने 500 पुस्तकों का प्रकाशन किया है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि केशव पांडेय में वह मानवता और संवेदनशीलता है जो एक सच्चे साहित्य सेवक में होनी चाहिए। वे केवल व्यापार नहीं करते, बल्कि साहित्य के माध्यम से समाज सेवा कर रहे &nbsp;हैं।</p>



<p class="has-medium-font-size wp-block-paragraph">भोजपुरी साहित्य को वापस लाने के इस संघर्ष में केशव पांडेय ने साबित कर दिया है कि जब एक व्यक्ति साहित्य के प्रति सच्ची समर्पण भावना रखता है, तो वह एक पूरे भाषागत समुदाय के साहित्य को बचा सकता है। उनकी यह पहल न केवल भोजपुरी भाषी लोगों के लिए गर्व की बात है, बल्कि पूरे भारतीय साहित्य जगत के लिए प्रेरणा का स्रोत है।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>नेहा लिम्बोदिया की कविताएँ&#8230;.</title>
		<link>https://www.jubileepost.in/poems-of-neha-limbodia/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Utkarsh Sinha]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 30 May 2026 11:09:51 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[लिट्फेस्ट]]></category>
		<category><![CDATA[कविताएँ]]></category>
		<category><![CDATA[जुबिली पोस्ट]]></category>
		<category><![CDATA[नेहा लिम्बोदिया]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.jubileepost.in/?p=342755</guid>

					<description><![CDATA[मध्य प्रदेश के इंदौर की निवासी युवा कवियत्री नेहा लिम्बोदिया की कविताएँ युवा मन को प्रतिबिंबित करती हैं, समाजकर्मी होने के कारण उनका मन संवेदनशील है और वह उनकी कविताओं में भी उतरता है. प्रतिष्ठित मंचों पर कविता पाठ करने के साथ ही उन्हें कई पुरस्कार भी मिले हैं . प्रतुत है उनकी दो कविताएँ &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph"></p>



<p class="has-medium-font-size wp-block-paragraph"><em><strong>मध्य प्रदेश के इंदौर की निवासी युवा कवियत्री नेहा लिम्बोदिया की कविताएँ युवा मन को प्रतिबिंबित करती हैं, समाजकर्मी होने के कारण उनका मन संवेदनशील है और वह उनकी कविताओं में भी उतरता है. प्रतिष्ठित मंचों पर कविता पाठ करने के साथ ही उन्हें कई पुरस्कार भी मिले हैं . प्रतुत है उनकी दो कविताएँ &nbsp;&nbsp;</strong>&nbsp;</em></p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>1</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">मैं नदिया &nbsp;हूँ</p>



<p class="wp-block-paragraph">चुलबुली ,आजाद निराली हूँ &nbsp;</p>



<p class="wp-block-paragraph">जमीन पर रहकर आसमा को समाती हूं</p>



<p class="wp-block-paragraph">किसी को कम न किसी को ज्यादा</p>



<p class="wp-block-paragraph">दिखाती हूं</p>



<p class="wp-block-paragraph">मन आए तो सबको सताती हूँ &nbsp;</p>



<p class="wp-block-paragraph">मुझसे खुशियां मुझसे ही दुःख</p>



<p class="wp-block-paragraph">लहराती हूँ फिर भी उड़ नहीं पाती हूँ &nbsp;</p>



<p class="wp-block-paragraph">मन आए तो राह बदलती हूँ</p>



<p class="wp-block-paragraph">सागर की तरह नहीं</p>



<p class="wp-block-paragraph">जो राह न बदल सकें</p>



<p class="has-medium-font-size wp-block-paragraph"><strong>2</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">ये क्या टूटा?</p>



<p class="wp-block-paragraph">यह क्या टूटा ?</p>



<p class="wp-block-paragraph">जिसके टूटने की आवाज नहीं आई</p>



<p class="wp-block-paragraph">जिसके टुकड़े फैले हैं कहां-कहां?</p>



<p class="wp-block-paragraph">क्या किसी के दिल के टुकड़े हैं</p>



<p class="wp-block-paragraph">क्यों फिर किसी के दिल को टूटना पड़ा है?</p>



<p class="wp-block-paragraph">शीशे की तरह</p>



<p class="wp-block-paragraph">वो तो मासूम है बच्चे की तरह ।</p>



<p class="wp-block-paragraph">क्या इसे तोड़ना नहीं है भगवान को तोड़ना</p>



<p class="wp-block-paragraph">वो तो बस मासूम था</p>



<p class="wp-block-paragraph">बस प्यार कर बैठा</p>



<p class="wp-block-paragraph">क्या प्यार करना गुनाह &nbsp;था उसके लिए?</p>



<p class="wp-block-paragraph">यह क्या टूटा&#8230;&#8230;..</p>



<p class="wp-block-paragraph"></p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>श्रद्धांजलि : बशीर बद्र-एक शायर जो ज़िंदगी को शेर बना गया</title>
		<link>https://www.jubileepost.in/basheer-badra-paased-away/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Utkarsh Sinha]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 28 May 2026 09:48:08 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Main Slider]]></category>
		<category><![CDATA[लिट्फेस्ट]]></category>
		<category><![CDATA[जुबिली पोस्ट]]></category>
		<category><![CDATA[बशीर बद्र]]></category>
		<category><![CDATA[शायरी]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.jubileepost.in/?p=342628</guid>

					<description><![CDATA[डा. उत्कर्ष सिन्हा जब बशीर बद्र के शेर पहली &#160;बार कानों में गूंजे, तो ऐसा लगा जैसे कोई साधारण इंसान, बिना किसी दिखावे के, बिना किसी ताज-तख्त के, अपनी ज़िंदगी के हर पल को शब्दों के दीपक में जला रहा हो, और वह दीपक कभी बुझे नहीं, बल्कि हर नए शेर के साथ और भी &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph"></p>



<p class="has-vivid-red-color has-text-color has-link-color has-medium-font-size wp-elements-de19828e665c0928ea97338ce46e93f9 wp-block-paragraph"><strong>डा. उत्कर्ष सिन्हा </strong><strong></strong></p>



<p class="has-medium-font-size wp-block-paragraph">जब बशीर बद्र के शेर पहली &nbsp;बार कानों में गूंजे, तो ऐसा लगा जैसे कोई साधारण इंसान, बिना किसी दिखावे के, बिना किसी ताज-तख्त के, अपनी ज़िंदगी के हर पल को शब्दों के दीपक में जला रहा हो, और वह दीपक कभी बुझे नहीं, बल्कि हर नए शेर के साथ और भी तेज़ी से जलता चला गया, इसलिए कि बशीर बद्र सिर्फ़ एक शायर नहीं थे, बल्कि वह आम आदमी की आवाज़ थे, उस आवाज़ जो चौक-चौबारे पर, बाज़ारों में, रेलगाड़ियों की छत पर, और रात भर जागते हुए कमरों में गूंजती है, वह आवाज़ जो कभी शोर मचाती नहीं, बस धीरे-धीरे, धैर्य से, अपने शेरों के ज़रिए इंसानों के दिलों में उतर जाती है, और वही बशीर बद्र थे जो अपनी सरलता में इतने गहरे थे कि उनके शेर सुनकर ऐसा लगता था जैसे कोई अपने दिल की&nbsp; बात कह रहा हो, कोई अपने ही ज़ख्मों को शब्द दे रहा हो, कोई अपने ही दुखों को रोशनी में बदल रहा हो।</p>



<p class="has-medium-font-size wp-block-paragraph">डॉ बशीर बद्र मूल रुप से अयोध्या के रहने वाले थे लेकिन उनकी पढ़ाई लिखाई इटावा और अलीगढ़ में हुई. नौकरी मेरठ में की और उसके भोपाल में बस गए. उनकी प्रसिद्धि का पहला शेर था,</p>



<p class="has-medium-font-size wp-block-paragraph"><mark style="background-color:rgba(0, 0, 0, 0)" class="has-inline-color has-vivid-red-color"><strong>&#8216;उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो ना जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए&#8221;&#8230;</strong></mark></p>



<p class="has-medium-font-size wp-block-paragraph">उनकी ज़िंदगी के किस्से भी उतने ही सरल और उतने ही गहरे हैं जितने उनके शेर, और जब लोग उनके बारे में बात करते हैं तो एक किस्सा ख़ास तौर पर याद आता है, वह किस्सा जब वह मुशायरों में जाते थे, भीड़ उनके इंतज़ार में खड़ी होती थी, लेकिन वह कोई अहंकार नहीं दिखाते थे, बस साधारण कुर्ता या कोट , साधारण चेहरा, और साधारण आवाज़, लेकिन जब वह मंच पर खड़े होकर पहला शेर पढ़ते थे, तो वह साधारणता एक अलौकिक रोशनी में बदल जाती थी, और भीड़ ख़ामोश हो जाती थी, क्योंकि वह जानते थे कि बशीर बद्र सिर्फ़ शेर नहीं पढ़ रहे होते, बल्कि वह अपनी ज़िंदगी के हर दर्द, हर खुशी, हर उम्मीद को शब्दों में ढाल रहे होते थे, और उसी वक़्त लोग समझ जाते थे कि यह वह शायर है जो आम आदमी के दुखों को समझता है, जो गरीबों की आवाज़ बुलंद करता है, जो मजदूरों के पसीने को शेर में बदल देता है।</p>



<p class="has-medium-font-size wp-block-paragraph">बशीर बद्र की शायरी में जो एक अद्भुत बात है वह यह है कि वे किसी भी मुश्किल शब्द का सहारा नहीं लेते थे, वे उर्दू के भंगिमाओं और हिंदी की सरलता को इतने खूबसूरती से मिलाते थे कि उनका शेर उर्दू पढ़ने वाले और हिंदी बोलने वाले दोनों के दिलों में उतर जाता था, और यही वजह है कि उनके शेर दुनिया के दो दर्जन से ज्यादा मुल्कों में पुकारे गए, मुशायरों में गूंजे, और आज भी लाखों लोगों के होंठों पर हैं, क्योंकि बशीर बद्र ने शायरी को किसी विशेष वर्ग के लिए नहीं, बल्कि आम इंसान के लिए लिखा, और यही उनकी असली ताकत थी, यही उनकी असली खूबसूरती थी, यही उनकी असली विरासत है।</p>



<p class="has-medium-font-size wp-block-paragraph">एक किस्सा और है जो उनके चरित्र को दर्शाता है, जब एक बार एक युवक उनके पास आया और बोला कि साहब, मैं भी शायर बनना चाहता हूँ, लेकिन मुझे शब्द नहीं आते, तब बशीर बद्र ने मुस्कुराते हुए कहा कि बेटा, शब्द नहीं आते, ज़िंदगी से ले, ज़िंदगी को देख, ज़िंदगी को महसूस कर, ज़िंदगी को अपना, और वही शब्द बन जाएंगे, क्योंकि बशीर बद्र को पता था कि असली शायरी किताबों में नहीं होती, असली शायरी ज़िंदगी के हर पल में होती है, असली शायरी उस पसीने में होती है जो माथे से टपकता है, असली शायरी उस आंसू में होती है जो आँखों से गिरता है, असली शायरी उस मुस्कान में होती है जो होंठों पर आती है जब किसी की मदद होती है।</p>



<p class="has-medium-font-size wp-block-paragraph">उनकी शायरी में एक और खासियत थी, वह यह कि वे प्रेम को भी ऐसे लिखते थे जैसे कोई प्रेम का गीत नहीं गा रहा हो, बल्कि कोई प्रेम के दर्द को शब्द दे रहा हो, और यही वजह है कि उनके प्रेम के शेर सुनकर ऐसा लगता था जैसे कोई अपने ही दिल की बात कह रहा हो, जैसे कोई अपने ही टूटे हुए दिल को जोड़ रहा हो, जैसे कोई अपने ही अधूरे सपनों को पूरा कर रहा हो, और यही वजह है कि उनके शेर आज भी लाखों लोगों के दिलों में बसते हैं, और आज भी लाखों लोग उनके शेरों को पढ़कर अपने दिल की बात कहते हैं, अपने दिल का दर्द सुनाते हैं, अपने दिल की उम्मीदें जताते हैं।</p>



<p class="has-medium-font-size wp-block-paragraph">जब बशीर बद्र के शेर पढ़े जाते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे कोई ज़िंदगी के हर पल को समझ रहा हो, जैसे कोई ज़िंदगी के हर दर्द को समझ रहा हो, जैसे कोई ज़िंदगी के हर खुशी को समझ रहा हो, और यही वजह है कि उनके शेर आज भी लाखों लोगों के दिलों में बसते हैं, और आज भी लाखों लोग उनके शेरों को पढ़कर अपने दिल की बात कहते हैं, अपने दिल का दर्द सुनाते हैं, अपने दिल की उम्मीदें जताते हैं, और यही वजह है कि बशीर बद्र आज भी आम आदमी के शायर कहलाते हैं, और यही वजह है कि उनकी शायरी आज भी लाखों लोगों के दिलों में बसती है।</p>



<p class="has-medium-font-size wp-block-paragraph">बशीर बद्र की विरासत सिर्फ़ उनके शेरों तक सीमित नहीं है, बल्कि उनकी विरासत उनकी विनम्रता है, उनकी सरलता है, उनकी आम आदमी के प्रति समर्पण है, और यही वजह है कि उन्हें याद रखना सिर्फ़ उनके शेरों को याद रखना नहीं है, बल्कि उनके चरित्र को याद रखना है, उनके विचारों को याद रखना है, उनकी विनम्रता को याद रखना है, और यही वजह है कि बशीर बद्र आज भी आम आदमी के शायर कहलाते हैं, और यही वजह है कि उनकी शायरी आज भी लाखों लोगों के दिलों में बसती है।</p>



<p class="has-medium-font-size wp-block-paragraph">बशीर बद्र का देहांत हुआ, लेकिन उनके शेर नहीं मरे, उनके शेर आज भी ज़िंदा हैं, आज भी लाखों लोगों के दिलों में बसते हैं, आज भी लाखों लोग उनके शेरों को पढ़कर अपने दिल की बात कहते हैं, अपने दिल का दर्द सुनाते हैं, अपने दिल की उम्मीदें जताते हैं, और यही वजह है कि बशीर बद्र आज भी आम आदमी के शायर कहलाते हैं, और यही वजह है कि उनकी शायरी आज भी लाखों लोगों के दिलों में बसती है, और यही वजह है कि बशीर बद्र हमेशा याद रखे जाएंगे, क्योंकि उनकी शायरी सिर्फ़ शब्द नहीं हैं, बल्कि उनकी शायरी ज़िंदगी है, उनकी शायरी छूट है, उनकी शायरी उम्मीद है, और यही वजह है कि बशीर बद्र हमेशा याद रखे जाएंगे।</p>



<p class="has-medium-font-size wp-block-paragraph">बशीर बद्र साहब&nbsp; , आपकी शायरी ने हमें सिखाया कि ज़िंदगी के हर पल को शब्दों में ढाला जा सकता है, ज़िंदगी के हर दर्द को शेर में बदला जा सकता है, ज़िंदगी के हर खुशी को गीत में बदला जा सकता है, और यही वजह है कि आप हमेशा याद रखे जाएंगे, क्योंकि आप सिर्फ़ एक शायर नहीं थे, बल्कि आप आम आदमी की आवाज़ थे, आप आम आदमी के दिल थे, आप आम आदमी की उम्मीद थे, और यही वजह है कि आप हमेशा याद रखे जाएंगे।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>काशी में अमरत्व का मार्ग बन जाती है मृत्यु </title>
		<link>https://www.jubileepost.in/death-becomes-the-path-to-immortality/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Utkarsh Sinha]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 30 Apr 2026 09:29:44 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Main Slider]]></category>
		<category><![CDATA[लिट्फेस्ट]]></category>
		<category><![CDATA[अमरत्व]]></category>
		<category><![CDATA[काशी]]></category>
		<category><![CDATA[लेनिन रघुवंशी]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.jubileepost.in/?p=341130</guid>

					<description><![CDATA[जुबिली न्यूज डेस्क वाराणसी। काशी विश्वनाथ मंदिर ट्रस्ट के निवर्तमान चेयरमैन एवं प्रख्यात ज्योतिषाचार्य प्रो. नागेंद्र पांडेय ने कहा कि काशी वह अद्वितीय नगरी है,&#160;जहां मृत्यु भी अमरत्व का मार्ग बन जाती है। काशी विश्वनाथ की इस पावन भूमि पर जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर समाप्त हो जाता है और मरण को भी &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph"></p>



<p class="has-vivid-red-color has-text-color has-link-color has-medium-font-size wp-elements-8a607faccae08423007a0bf2eb18b721 wp-block-paragraph"><strong>जुबिली न्यूज डेस्क</strong></p>



<p class="has-medium-font-size wp-block-paragraph">वाराणसी। काशी विश्वनाथ मंदिर ट्रस्ट के निवर्तमान चेयरमैन एवं प्रख्यात ज्योतिषाचार्य प्रो. नागेंद्र पांडेय ने कहा कि काशी वह अद्वितीय नगरी है,&nbsp;जहां मृत्यु भी अमरत्व का मार्ग बन जाती है। काशी विश्वनाथ की इस पावन भूमि पर जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर समाप्त हो जाता है और मरण को भी मंगल माना जाता है। काशी केवल एक शहर नहीं,&nbsp;बल्कि एक ऐसी आध्यात्मिक सत्ता है,&nbsp;जो भौतिक धरातल से ऊपर उठकर आत्मिक चेतना का अनुभव कराती है।</p>



<p class="has-medium-font-size wp-block-paragraph">प्रो. पांडेय मड़ौली स्थित मेहता आर्ट गैलरी में आयोजित&nbsp;‘कोरस-2026’&nbsp;के तहत&nbsp;“काशी”&nbsp;पुस्तक पर परिचर्चा के दौरान बोल रहे थे। इस कार्यक्रम का आयोजन वरिष्ठ चित्रकार अमित कुमार के संयोजन में किया गया। परिचर्चा में उन्होंने कहा कि काशी में आने वाला व्यक्ति भोग-विलास के लिए नहीं,&nbsp;बल्कि मुक्ति की तलाश में आता है। गंगा घाटों पर बनी कोठियां और आश्रम भी इसी उद्देश्य से निर्मित हैं,&nbsp;जहां लोग अपने जीवन के अंतिम समय में रहकर गंगा स्नान,&nbsp;बाबा विश्वनाथ के दर्शन-पूजन और साधना के माध्यम से मोक्ष प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। मान्यता है कि काशी में देह त्यागने वाला व्यक्ति जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है। यही कारण है कि देश-विदेश से बड़ी संख्या में लोग अपने जीवन के अंतिम समय में काशी का रुख करते हैं।</p>



<p class="has-medium-font-size wp-block-paragraph">डॉ. लेनिन रघुवंशी,&nbsp;जय मिश्रा और श्रुति नागवंशी द्वारा लिखित पुस्तक&nbsp;“काशी”&nbsp;का उल्लेख करते हुए प्रो. पांडेय ने कहा कि यह पुस्तक गहन साधना और अध्ययन का परिणाम है। इसमें काशी को व्यापक और उदार दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया है,&nbsp;जो पाठकों को इस नगरी की आध्यात्मिक गहराई से परिचित कराती है। उन्होंने कहा कि अज्ञात को जानना ही वास्तविक साधना है और काशी इस साधना का सर्वोत्तम केंद्र है। काशी वास्तव में भोग की नहीं,&nbsp;बल्कि मुक्ति की नगरी है,&nbsp;जहां हर क्षण आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता है।</p>



<p class="has-medium-font-size wp-block-paragraph">वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ भट्टाचार्य ने कहा कि यह शहर न केवल आस्था का केंद्र है,&nbsp;बल्कि विभिन्न धर्मों और परंपराओं का अद्वितीय संगम भी है। यह एक ऐसा शहर है,&nbsp;जहां विभिन्न विचारधाराएं और आस्थाएं बिना टकराव के सह-अस्तित्व में रहती हैं। वर्तमान समय में वाराणसी में करीब&nbsp;26&nbsp;धर्मों के अस्तित्व के संकेत मिलते हैं,&nbsp;जिनके अनुयायियों की संख्या विश्व स्तर पर एक करोड़ से अधिक है।</p>



<p class="has-medium-font-size wp-block-paragraph">काशी में सनातन धर्म की विभिन्न शाखाएं और परंपराएं मौजूद हैं। इस शहर की मिट्टी और पानी में कुछ ऐसा विशेष तत्व है,&nbsp;जो यहां आने वाले व्यक्ति को प्रभावित करता है। काशी का स्वभाव स्वतंत्रता और खुलापन है। यहां हर व्यक्ति बंधनों को सहजता से स्वीकार नहीं करता और अपनी विशिष्ट जीवन शैली को बनाए रखता है।</p>



<p class="has-medium-font-size wp-block-paragraph">राजनीतिक संदर्भों से दूरी बनाते हुए अमिताभ भट्टाचार्य ने कहा कि काशी किसी एक व्यक्ति या विचारधारा की नहीं,&nbsp;बल्कि सभी की है और अपनी मौलिकता के साथ सदैव बनी रहेगी। गंगा नदी का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि उसकी धारा भी पारंपरिक दिशा से हटकर बहती है,&nbsp;जो आत्मनिर्भरता और अलग सोच का प्रतीक है। उन्होंने उम्मीद जताई कि&nbsp;“काशी”&nbsp;पुस्तक की तरह आने वाले वर्षों में इस विषय पर और गहन अध्ययन सामने आएंगे।</p>



<p class="has-medium-font-size wp-block-paragraph">काशी की सामाजिक,&nbsp;धार्मिक और ऐतिहासिक जटिलताओं को रेखांकित करते हुए वरिष्ठ पत्रकार अजय राय ने कहा कि बनारस को केवल एक शहर के रूप में देखना उसकी आत्मा को सीमित करना है। काशी एक जीवंत&nbsp;‘विचार’&nbsp;है,&nbsp;जिसे समय,&nbsp;समाज और परंपराओं के संदर्भ में समझना आवश्यक है। काशी की समावेशी छवि पर सवाल उठाते हुए उन्होंने ऐतिहासिक संदर्भ दिया कि वर्ष&nbsp;1957&nbsp;से पहले काशी विश्वनाथ मंदिर में दलितों के प्रवेश को लेकर पाबंदियां थीं। यह मान लेना कि काशी हमेशा से पूरी तरह समरस और समानतापूर्ण रही है,&nbsp;इतिहास की जटिलताओं को नजरअंदाज करना होगा।</p>



<p class="has-medium-font-size wp-block-paragraph">उन्होंने स्कंद पुराण का हवाला देते हुए कहा कि काशी में मोक्ष की अवधारणा भी सरल नहीं है। उनके अनुसार केवल काशी में मृत्यु हो जाना मोक्ष की गारंटी नहीं है,&nbsp;बल्कि जीवन की साधना और आचरण भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। आज काशी में&nbsp;‘मोक्ष’&nbsp;की अवधारणा को सतही रूप में देखा जा रहा है और श्मशानों के सौंदर्यीकरण पर जोर दिया जा रहा है,&nbsp;जो काशी की मूल आध्यात्मिक भावना के अनुरूप नहीं है। काशी का वातावरण समय के साथ बदलता रहा है और इसे समझने के लिए गहराई से अध्ययन और निरंतर लेखन की आवश्यकता है।&nbsp;“काशी”&nbsp;पुस्तक के लेखकों की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि बनारस की वास्तविक तस्वीर को सामने लाने के लिए और अधिक शोध व विमर्श होना चाहिए।</p>



<p class="has-medium-font-size wp-block-paragraph">वरिष्ठ पत्रकार कुमार विजय ने कहा कि बनारस को केवल एक शहर के रूप में देखना उसकी आत्मा को सीमित करना है। काशी एक जीवंत&nbsp;‘विचार’&nbsp;है,&nbsp;जिसे समय,&nbsp;समाज और परंपराओं के संदर्भ में समझना आवश्यक है। काशी की समावेशी छवि पर सवाल उठाते हुए उन्होंने भी ऐतिहासिक संदर्भ दिया कि वर्ष&nbsp;1957&nbsp;से पहले काशी विश्वनाथ मंदिर में दलितों के प्रवेश पर पाबंदियां थीं। यह मान लेना कि काशी हमेशा से पूरी तरह समरस रही है,&nbsp;इतिहास की जटिलताओं की अनदेखी होगी।&nbsp;उन्होंने कहा कि धार्मिक मान्यताओं के संदर्भ में स्कंद पुराण में भी उल्लेख मिलता है कि काशी में मोक्ष की अवधारणा सरल नहीं है। केवल यहां मृत्यु हो जाना पर्याप्त नहीं,&nbsp;बल्कि जीवन का आचरण और साधना भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। वर्तमान समय में मोक्ष की अवधारणा को सतही रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है,&nbsp;जबकि इसके गहन अर्थ को समझने की आवश्यकता है।</p>



<p class="has-medium-font-size wp-block-paragraph">इतिहासकार डॉ. मोहम्मद आरिफ ने काशी की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक बहुलता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह शहर हमेशा से विभिन्न धार्मिक धाराओं का केंद्र रहा है,&nbsp;जो इसे अन्य शहरों से अलग बनाता है। ग़ालिब ने भी काशी की सांस्कृतिक समृद्धि और बौद्धिक वातावरण की सराहना की थी। कबीर और तुलसीदास की रचनाओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि काशी ने सदैव मानवीय मूल्यों और प्रेम की भावना को केंद्र में रखा।&nbsp;“काशी”&nbsp;पुस्तक भी इसी बहुलतावादी परंपरा की ओर संकेत करती है और शोधार्थियों को नए दृष्टिकोण से इस शहर को समझने का अवसर प्रदान करती है।</p>



<p class="has-medium-font-size wp-block-paragraph">कार्यक्रम का संचालन सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. लेनिन रघुवंशी ने किया,&nbsp;जबकि वरिष्ठ पत्रकार विजय विनीत ने आगंतुकों के प्रति आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर चित्रकार अमित कुमार की सार्थक पहल की सराहना की गई और उन्हें सम्मानित किया गया। परिचर्चा में ग्रामीण पत्रकार एसोसिएशन के जिलाध्यक्ष सी.बी. तिवारी&nbsp;‘राजकुमार’,&nbsp;राहुल यादव,&nbsp;एक्टिविस्ट इदरीस अंसारी,&nbsp;पंकजपति पाठक,&nbsp;मंगला प्रसाद राजभर,&nbsp;डॉ. शम्मी कुमार सिंह,&nbsp;विकास दुबे,&nbsp;चंद्र मिश्र सहित अन्य लोग उपस्थित रहे।</p>
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		<title>इश्क की रोटियाँ I खमीरी  I एपिसोड 4</title>
		<link>https://www.jubileepost.in/ishq-ki-rotiyan-episode-4/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Utkarsh Sinha]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 10 Apr 2026 10:00:32 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[लिट्फेस्ट]]></category>
		<category><![CDATA[आडियो बुक]]></category>
		<category><![CDATA[इश्क की रोटियाँ]]></category>
		<category><![CDATA[कहानी]]></category>
		<category><![CDATA[खमीरी रोटी]]></category>
		<category><![CDATA[जुबिली पोस्ट]]></category>
		<category><![CDATA[साहित्य]]></category>
		<category><![CDATA[हिंदी समाचार]]></category>
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					<description><![CDATA[इश्क महलों में ही हो , ये कोई जरुरी तो नहीं … लहराती फसलों में , बहती नदी के किनारे , या फिर जंग के मैदान में … ये इश्क ही तो है जो हर जगह अपनी शिद्दत से मौजूद रहता है …. यहाँ तक की रोटियों में भी इश्क गुंथा हुआ है …… इश्क &#8230;]]></description>
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<p class="wp-block-paragraph">इश्क महलों में ही हो , ये कोई जरुरी तो नहीं … लहराती फसलों में , बहती नदी के किनारे , या फिर जंग के मैदान में … ये इश्क ही तो है जो हर जगह अपनी शिद्दत से मौजूद रहता है …. यहाँ तक की रोटियों में भी इश्क गुंथा हुआ है …… इश्क की रोटियाँ के चौथे एपिसोड में एक नयी कहानी के साथ हाज़िर हूँ .. मैं उत्कर्ष सिन्हा ….. कहानी खमीरी रोटी की है और शीर्षक है …. जंग के मैदान में रुबाब की दुआ…. तो सुनिए ….</p>



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