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	<title>ओपिनियन Archives &#060; Jubilee Post | जुबिली पोस्ट</title>
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	<description>News &#38; Information Portal</description>
	<lastBuildDate>Sat, 09 May 2026 09:02:56 +0000</lastBuildDate>
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		<title>बहुदलीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था के खिलाफ है डबल इंजन की सरकार का सियासी नारा</title>
		<link>https://www.jubileepost.in/dubble-engin-is-against-the-multi-party-democrecy/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Utkarsh Sinha]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 09 May 2026 09:02:51 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Main Slider]]></category>
		<category><![CDATA[ओपिनियन]]></category>
		<category><![CDATA[जुबिली डिबेट]]></category>
		<category><![CDATA[जुबिली पोस्ट]]></category>
		<category><![CDATA[हिंदी समाचार]]></category>
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					<description><![CDATA[उबैदउल्लाह नासिर चार राज्यों बंगाल असम तमिलनाडू और केरला तथा&#160;&#160;एक केंद्र शासित राज्य पडुचेरी में चुनाव संपन्न हो गए बंगाल असाम और पडूचेरी&#160;&#160;में बीजेपी सफल रही केरला में कांग्रेस तथा तमिल नाडू में फ़िल्मी सितारे विजय की टीवीके पार्टी ने सत्ता रूढ़ DMK को हरा कर पूर्ण बहुमत तो नहीं पाया मगर सब से बड़ी &#8230;]]></description>
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<p></p>



<p class="has-vivid-red-color has-text-color has-link-color has-medium-font-size wp-elements-6b6267752450dc2c709af813ba5eaada"><img decoding="async" width="150" height="192" class="wp-image-320064" style="width: 150px;" src="https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2025/05/obaid-nasir-e1746685628703.jpg" alt="" srcset="https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2025/05/obaid-nasir-e1746685628703.jpg 516w, https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2025/05/obaid-nasir-e1746685628703-235x300.jpg 235w" sizes="(max-width: 150px) 100vw, 150px" /></p>



<p class="has-vivid-red-color has-text-color has-link-color has-medium-font-size wp-elements-d9562754b0c947be8aef80c4a5cc3c0b"><strong>उबैदउल्लाह नासिर</strong></p>



<p>चार राज्यों बंगाल असम तमिलनाडू और केरला तथा&nbsp;&nbsp;एक केंद्र शासित राज्य पडुचेरी में चुनाव संपन्न हो गए बंगाल असाम और पडूचेरी&nbsp;&nbsp;में बीजेपी सफल रही केरला में कांग्रेस तथा तमिल नाडू में फ़िल्मी सितारे विजय की टीवीके पार्टी ने सत्ता रूढ़ DMK को हरा कर पूर्ण बहुमत तो नहीं पाया मगर सब से बड़ी पार्टी बन कर उभरी आशा है कि वह कांग्रेस और AIDMK के साथ मिल कर सत्ता संभालेगी Iबंगाल पर क़ब्ज़े के बाद हरियाणा से ले कर आसाम और पूरे नार्थ ईस्ट पर भगवा झन्डा लहरा गया है I डबल इंजन की सरकार का संघी विचार अमली रूप ले रहा है, भारत के लिए&nbsp;&nbsp;एक दल एक नेता एक धर्म एक संसकृति और भाषा का जो&nbsp;&nbsp;खाका संघ ने बनाया था अब उसमें रंग भर रहा है, भले ही यह खाका हमारे&nbsp;&nbsp;संविधान की मूलभूत धारणा के खिलाफ हो जो&nbsp;&nbsp;विविधता में एकता पर आधरित है, जो भारत में सभी धर्मो जातियों भाषाओं संस्कृतियों का एक सुंदर मेल है और जिस पर विगत 65-70 साल से भारत अग्रसर था, यही उसकी पहचान थी और इसी कारण भारत दुनिया के अन्य देशों के लिए एक मिसाल था उसका एक विशेष सम्मान था&nbsp;&nbsp;I&nbsp;&nbsp;</p>



<p>अब भारत चीन, उत्तरी कोरिया, रूस ,तुर्किया और अरब देशों की तरह एक दल एक नेता वाले निजाम की ओर अग्रसर है I दक्षिण भारत अभी तक संघ के खाके में फिट नहीं बैठ रहा है मगर कर्नाटक पर उसका कब्जा है ही अन्य राज्य भी देर सबेर आ&nbsp;&nbsp;ही जायेंगे&nbsp;&nbsp;I डबल इंजन की सरकार केवल एक रजनैतिक नारा ही नही है यह वास्तव में संविधान की अवधारणा पर हमला है जिसने&nbsp;&nbsp;देश की विविधता और बहुदलीय व्यवस्था को स्वीकार किया था क्योंकि यही भारत की विवधताओं को समोते हुए देश को एक सूत्र में बांधे रख सकती है I संघ शुरू से ही संविधान विरोधी रहा है संविधान बदलने की उसकी चेष्टा सफल नहीं हो पा रही है तो वह संविधान की आत्मा को ही धीमा जहर दे कर मार रहा है I</p>



<p>वैसे&nbsp;&nbsp;तो चुनाव पांच राज्यों में&nbsp;&nbsp;हुआ लेकिन देश ही नहीं बल्कि दुनिया भर की नज़रें बंगाल के चुनाव पर लगी हुई थीं क्योंकि मुकाबला टक्कर का ही नहीं बल्कि संविधान और संवैधानिक मान्यताओं बनाम “चुनाव और युद्ध में सब जायज़ है” के बीच था I बीजेपी ग्राम सभा से ले कर लोक सभा तक का हर चुनाव हर हाल में जीतना अपन परम कर्तव्य समझती है और&nbsp;&nbsp;इसके लिए वह किसी भी हद तक जा सकती है I मुसलमानों के खिलफ घृणा फैलाना तो उसके चुनाव अभियान का सब से मारक हथियार है जो प्रधान मंत्री मोदी से ले कर गाँव गली का मामूली कार्यकर्ता तक खुल कर प्रयोग करता है, क्योंकि उसे किसी कानून का डर नहीं है I</p>



<p>वास्ताविकता यह है कि&nbsp;&nbsp;आरएसएस आरम्भ से ही मुसलमानों दलितों और महिलाओं को वोट देने के अधिकार का&nbsp;&nbsp;&nbsp;विरोधी रहा है लेकिन संविधान सभा के हमारे दूर दृष्ट वाले नेताओं के सामने उसकी चली नही और संविधान में हर वयस्क को वोट देने का अधिकार दे कर&nbsp;&nbsp;एक क्रान्तिकरी निर्णय लिया गया I मगर संविधान लगू होने के बाद ही मुस्लिम वोटों को परिसीमन द्वारा तितर बितर कर के निशप्रभावी करने की साज़िश शुरू हो गयी थी, सच्चर कमिटी ने अपनी&nbsp;&nbsp;रिपोर्ट में इसका विस्तार से खुलासा किया है I आज भी यह सिलसीला जारी है, बंगाल में 33% असाम में 35% और उत्तर प्रदेश में 20% मुस्लिम वोटों को परिसीमन और&nbsp;&nbsp;ध्रुवीकरण द्वारा निश्प्र्भावी किया जा चुका है I इसके अलावा बीजेपी हर संभव तरीके से&nbsp;&nbsp;चुनावी आचार संहिता का खुल कर अचार बनाती है क्योंकि&nbsp;&nbsp;केचुआ (केंद्रीय चुनाव आयोग ) उसकी मुट्ठी में है और सुप्रीम कोर्ट से भी उसे कोई खतरा नहीं है I याद दिला दें कि इसी चुनाव आयोग ने स्व बाल ठाकरे जैसे दबंग और लोकप्रिय नेता को चुनाव लड़ने के अयोग्य (Defrenchise) घोषित कर दिया था क्योंकि उन्होंने एक चुनाव में धर्म के बुनियाद पर वोट माँगा था और वह चुनाव भी रद्द कर&nbsp;&nbsp;दिया गया था I अब प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी&nbsp;&nbsp;केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री&nbsp;&nbsp;योगी&nbsp;&nbsp;समेत बीजेपी के छोटे बड़े सभी&nbsp;&nbsp;नेताओं&nbsp;&nbsp;का चुनाव अभियान घोर साम्प्रदायिक बुनियादों पर चलता है जिसके खिलाफ चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट में देश के सैकड़ों प्रबुद्ध नागरिकों की शिकायत पर भी&nbsp;&nbsp;कोई नोटिस नहीं लिया जाता I इंदिरा गांधी जैसी आयरन लेडी का चुनाव इलाहाबाद हाई कोर्ट से एक मामूली सी टेक्निकल गलती पर रद्द कर दिया गया था I लेकिन वह दौर था जब संवैधानिक संस्थाएं मज़बूत थीं, लोगों में संविधान के प्रति आस्था थी ईमानदारी थी और सब से बड़ी बात लोक लाज का डर था, अब&nbsp;&nbsp;यह सारे गुण कहने और सुनने भर को रह गए हैं I मोदी ने सब से बड़ी अक्लमंदी यही की कि सभी संवैधानिक संस्थाओं पर शाखाओं से निकले Brain washed लोगों को भर के उनको दंतविहीन ही नही बेशर्म और&nbsp;&nbsp;बेज़मीर भी कर दिया है&nbsp;&nbsp;I यहाँ तक कि न्याय पालिका भी इससे अछूती नहीं रह गयी है ऐसे ऐसे निर्णय आते हैं जिन्हें सुन के ही आम आदमी दंग रह जाता है I</p>



<p>बंगाल के चुनाव को ही ले लीजिये 27 लाख लोग वोट देने से वंचित कर दिए गए उनके ममलों की सुनवाई तक नही हुई और सुप्रीम कोर्ट के जज साहब फरमाते हैं कि “ कोई बात नही जो इस बार वोट नही दे पाया वह अगली बार दे लेगा” I सोशल मीडिया की एक पोस्ट से पता चला ही की कनाडा के सुप्रीम कोर्ट ने एक पोस्टल बैलट को गिनती में शामिल न करने पर वह चुनाव ही रद्द कर दिया और हमारे यहाँ 27 लाख लोग मताधिकार से ही वंचित कर दिए गए और सुप्रीम कोर्ट ने जो कहा वह ऊपर बता ही दिया है I एक&nbsp;&nbsp;पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस वाई कुरैशी ने सुप्रीम कोर्ट के उस कमेन्ट की आलोचना करते हुए यहाँ तक कह दिया कि उक्त न्यायाधीश को जनता से माफी मंगनी चाहिए I&nbsp;&nbsp;मज़े की बात यह है कि जिन लोगों को मताधिकार&nbsp;&nbsp;से वंचित किया गया उन में से बहुतों को चुनावी ड्यूटी पर लगाया गया था अर्थात वह वोट दे नही&nbsp;&nbsp;सकते थे मगर वोट दिलवा सकते हैं I&nbsp;&nbsp;बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस में वोटों में लगभग इतने ही वोटों का अंतर है&nbsp;&nbsp;जितने वोटर मताधिकार से वंचित किये गये थे ,अर्थात केवल चुनाव आयोग ही नहीं बंगाल चुनाव के इस चीरहरण में सुप्रीम कोर्ट भी बराबर का शरीक&nbsp;&nbsp;है I वास्तविकता यह है कि मोदी युग में न्यायपलिका के भी नकेल डाल दी गयी ही कोई&nbsp;&nbsp;जज लोया नही बन्ना चाहेगा&nbsp;&nbsp;सभी गगोई शिव सुन्द्रम और अब्दुल नजीर आदि बनना चाहते, ईमानदार बन&nbsp;&nbsp;कर&nbsp;&nbsp;जान जोखिम मे क्यों डालें ?</p>



<p>बंगाल में चुनाव जिस&nbsp;&nbsp;&nbsp;प्रकार कराया गया वह अपने आप में एक मिसाल बन गया है, ट्रम्प ने ईरान के खिलाफ 80 हजार सैनिक उतारे हैं ज्ञानेश कुमार ( वस्तव में मोदी अमित शाह ) ने ममता के खिलाफ ढाई लाख अर्ध सैनिक तैनात &nbsp;किये I चुनावों में केन्द्रीय बलों का भेजा जाना कोई नई बात नहीं लेकिन यह बल स्थानीय प्रशासन के अधीन होते थे ,ऑब्जरवरों का काम स्थानीय प्रशासन से सहयोग करना और&nbsp;&nbsp;अगर कोई अनियमितता पाई जये तो उसकी रिपोर्ट चुनाव आयोग को करना होता है लेकिन उत्तर प्रदेश से गये एक अफसर ने TMC के एक उम्मीदवार और उसके समर्थकों को जिस तरह न केवल हडकाया बल्कि अपमानित किया वह बानगी भर है और&nbsp;&nbsp;अपने आप में बहुत कुछ कहता है I एक वरिष्ट पुलिस अधिकरी विभूति नारायण राय ने एक टी वी डिबेट में उस अफसर की इस हरकत की कटु आलोचना की है एक अन्य रिटायर्ड अफसर&nbsp;&nbsp;अशीश जोशी ने तो चुनाव आयोग को पत्र लिख कर उक्त अफसर के आचरण को गलत बताया लेकिन मोदी के भारत में यह सब नार्मल हो चुका है सत्ता जो चाहे और&nbsp;&nbsp;जो करे सब सही है I</p>



<p>चुनाव दर चुनाव जिस प्रकार असंवैधानिकता,साम्प्रदायिकता, अनैतिकता और हिंसा एक योजनाबद्ध तरीके से बढ़ाई जा रही है वह देश के लिए एक बहुत बड़े खतरे की घंटी है Iभारत को नाजी जर्मनी और मार्शल टिटो के बाद के युगोस्लाविया के रास्ते पर ले जाया जा रहा है, भारत इन देशों के अंजाम को न पहुंचे यही प्रार्थना है I</p>



<p>( डिस्क्लेमर : लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और यह उनका निजी मत है, जुबिली पोस्ट का इससे सहमत होना आवश्यक नहीं है )</p>



<p></p>
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		<item>
		<title>राज्यपालों की भूमिका पर फिर उठ रहे सवाल</title>
		<link>https://www.jubileepost.in/questions-are-again-being-raised-on-the-role-of-governors/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Syed Mohammad Abbas]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 08 May 2026 12:31:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Main Slider]]></category>
		<category><![CDATA[इण्डिया]]></category>
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					<description><![CDATA[यशोदा श्रीवास्तव तमिलनाडु में राज्यपाल की ओर से जिस तरह सबसे बड़े दल टीबी के को सरकार बनाने से रोकने की कोशिश हो रही है, उससे फिर एक बार भारत में राज्यपालों की भूमिका सवालों के घेरे में आ गई है। यह कहना मुश्किल है कि राज्यपाल राजेन्द्र विश्वनाथ आर्लेकर ऐसा स्वयं कर रहे हैं &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="has-vivid-red-color has-text-color has-link-color has-medium-font-size wp-elements-258749f2403c55ec98c811ff5c6b7b8d"><strong>यशोदा श्रीवास्तव</strong></p>



<p class="has-medium-font-size">तमिलनाडु में राज्यपाल की ओर से जिस तरह सबसे बड़े दल टीबी के को सरकार बनाने से रोकने की कोशिश हो रही है, उससे फिर एक बार भारत में राज्यपालों की भूमिका सवालों के घेरे में आ गई है। </p>



<p class="has-medium-font-size">यह कहना मुश्किल है कि राज्यपाल राजेन्द्र विश्वनाथ आर्लेकर ऐसा स्वयं कर रहे हैं या केंद्र सरकार के इशारे पर? लेकिन चूंकि राज्यपालों की नियुक्ति केंद्र में सत्तारूढ़ दल की अनुकंपा पर ही होता है इसलिए राज्यपालों को केंद्र सरकार की कठपुतली भी कह सकते हैं।</p>



<p class="has-medium-font-size">पूर्व में एक नहीं दर्जनों ऐसे उदाहरण है जब राज्यपालों ने केंद्र सरकार की मर्जी पर ही काम किया है।</p>



<p class="has-medium-font-size">तमिलनाडु में भाजपा का केवल एक विधायक है तो क्या इसी एक को मुख्यमंत्री बनाने की कोशिश हो रही है? यदि हां तो राजयपाल को सर्वाधिक 108 विधायकों वाली पार्टी को बहुमत सिद्ध कर पाने में संदेह है तो एक अकेले पर कैसे भरोसा कर सकते हैं? और वहां जिस गठबंधन में भाजपा है वह पार्टी भी बहुमत से कोसों दूर है।</p>



<p class="has-medium-font-size">एक्टर से नेता बने थलापति विजय के नेतृत्व में टीबी के को बहुमत सिद्ध करने के लिए केवल आठ विधायकों की जरूरत है। कांग्रेस ने विजय की पार्टी को अपना समर्थन दे दिया है। डीएमके चीफ व निवर्तमान मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने भी विजय को सरकार बनाने में किसी भी रुकावट को नामंजूर कर दिया है,दो तीन छोटी पार्टियों के विधायकों के समर्थन मिलने की पूरी संभावना भी है बावजूद राज्यपाल की ओर से यह रुकावट समझ से परे है। राज्यपाल राजेन्द्र विश्वनाथ आर्लेकर यह तो जानते ही होंगे कि किसी मुख्यमंत्री को बहुमत सिद्ध करने की जगह राजभवन नहीं विधानसभा मंडप होता है।<br>पूर्व में राज्यपालों की ऐसी हठधर्मिता पर न्यायालय से भी दिशा निर्देश पारित किए गए हैं इसमें एस आर बोम्मई का मामला सुर्खियों में रहा है। फिलहाल तमिलनाडु के राज्यपाल का किसी दल की सरकार को रोकने को लेकर केंद्र सरकार पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।</p>



<p class="has-medium-font-size"><br>प्रदेशों में यदि केंद्र सरकार के मनमाफिक सरकार नहीं है तो राज्यपालों द्वारा उसे तंग करने या बर्खास्त तक कर देने के ढेरों उदाहरण है ।आजादी के बाद स्वतंत्र भारत के इतिहास के अंदर झांके तो केंद्र सरकार द्वारा राज्यपालों के अपने तरीके से इस्तेमाल करने के उदाहरण बहुतेरे हैं। ऐसे भी उदाहरण है जब उनके जबरदस्ती की रिपोर्ट पर अनुच्छेद 356 का इस्तेमाल कर सरकारें गिरा दी गई।<br>राज्यपालों के मनमानी के अजीब मामले देखे गए। राजस्थान का मामला याद होगा जब मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को राज्य पाल कलराज मिश्र के घेराव तक का ऐलान करना पड़ा था। राज्यपाल प्रदेशों में केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के रूप में काम करते हैं लेकिन इन्हीं में से सत्य पाल मलिक जैसे राज्य पाल भी होते हैं जो सरकार से टकराते भी हैं। प्रदेशों में केंद्र सरकार द्वारा नामित राज्यपालों का उपयोग केंद्र सरकार ऐसे प्रदेशों में खूब करती हैं जहां उनके दल की सरकार नहीं होती है। यह परंपरा नई नहीं है। पूर्व में कई प्रदेशों में राज्यपालों की भूमिका पर उठ रहे सवालों से पता चला है कि किस तरह कठपुतली की तरह उनका इस्तेमाल किया गया है। </p>



<p class="has-medium-font-size">कठपुतली की तरह राज्यपालों के इस्तेमाल की शुरूआत नेहरू के शासन काल से ही हो चुकी थी। उसके बाद जैसे राज्यपालों को ताश के पत्ते की तरह फेंटने की परंपरा ही चल पड़ी। हैरत है तमाम राज्यपाल अपनी गरिमा की तनिक भी परवाह किए बिना वह सब करते रहे जो केंद्र सरकार की मर्जी रही। उदाहरण के तौर पर हरियरणा में जेडी तपासे,सिक्किम में तलयार खान, जम्मू कश्मीर में जगमोहन और ऐसे ही उस काल के तमाम राज्यपालों का स्मरण किया जा सकता है।<br>राज्यपालों के केंद्र सरकार के प्रति अंधभक्ति की वजह से कर्नाटक के मुख्यमंत्री रहे राम कृष्ण हेगड़े ने अपने यहां के तत्कालीन राज्यपाल एएन बनर्जी को केंद्र सरकार का नौकर तक कह डाला था तो आंध्र प्रदेश के राज्यपाल रामलाल को लोग गुंडा बेइमान और डकैत तक कहने से बाज नहीं आए थे। कांग्रेस के शासन काल में राज्यपालों को मोहरा बनाए जाने के ढेरों उदाहरण है। भाजपा ने राज्यपालों का सर्वाधिक उपयोग प्रदेशों में दूसरे दलों की सरकार गिराकर एन केन प्रकारेण अपनी सरकार बनाने में किया। </p>



<p class="has-medium-font-size">सिक्किम,मेघालय,मिजोरम,नागालैंड,गोवा जैसे प्रदेशों में बीजेपी के शून्य से लेकर 01,02,12,व 13 विधायक चुने गए थे। बीजेपी की यह सदस्य संख्या सरकार क्या विपक्ष के लायक भी नहीं थी लेकिन राज्यपालों ने वहां उनकी सरकार बनवाने में भरपूर मदद की थी।<br>कहते हैं कि नेहरू शासन काल में राज्यपालों का वेजा इस्तेमाल नहीं किया जाता था और जनतात्रिक मूल्यों की रक्षा हो रही थी।लेकिन यह बताने की जरूरत नहीं है कि नेहरू के कार्याकाल में अधिकांश प्रदेशीय सरकार भी कांग्रेस की ही हुआ करती थी। इसलिए सरकार गिराने या बनाने में राज्यपालों के इस्तेमाल की जरूरत नहीं महसूस हुई।लेकिन नेहरू काल के जनतांत्रिक होने का भी भ्रम 1959 में तब टूट गया जब केरल की इएमएस नंबूदरीपाद की कम्युनिस्ट सरकार को एक दम अनुचित ढंग से गिरा दिया गया।उस वक्त कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती इंदरा गांधी थीं जिनका केरल में कानून व्यवस्था की बिगड़ी हाल के बहाने केरल सरकार गिराए जाने का समर्थन था।नेहरू तब इस ओर से आंख बंद किए रहे।बताने की जरूरत नहीं कि आपातकाल के बाद 1980 में वापस लौटीं श्रीमती इंदिरा गांधी के शासन काल में आंध्र प्रदेश में एन टी रामाराव की सरकार को तत्कालीन राज्यपाल रामलाल ने कैसे बर्खास्त किया था? इंदरा गांधी का यह ऐसा शासन काल था जब राज्यपालों का खूब मनमाना इस्तेमाल हुआ।<br>राज्यपालों के संदर्भ में पूर्व की स्थिति की पूनरावृत्ति की कल्पना फिलहाल भाजपा शासनकाल में नहीं की गई थी।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>चलो अच्छा हुआ कम्युनिस्टों की विदाई तो हुई</title>
		<link>https://www.jubileepost.in/well-its-good-that-the-communists-have-been-eliminated/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Syed Mohammad Abbas]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 06 May 2026 07:57:53 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Main Slider]]></category>
		<category><![CDATA[ओपिनियन]]></category>
		<category><![CDATA[जुबिली डिबेट]]></category>
		<category><![CDATA[anti-communism]]></category>
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		<category><![CDATA[public sentiment]]></category>
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					<description><![CDATA[यशोदा श्रीवास्तव पांच राज्यों के चुनाव परिणाम की खास बात यह रही कि पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा के बाद केरलम से कम्युनिस्ट विचारधारा की विदाई हो गई। अजीब संयोग है कि कुछ माह पहले ही नेपाल से भी कम्युनिस्ट विचारधारा का खात्मा हुआ है। और अब भारत से बची-खुची इसके अवशेष अतीत होने के कगार पर &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="has-vivid-red-color has-text-color has-link-color has-medium-font-size wp-elements-daad0ab94e6fa979d5159600dd9be6da"><strong>यशोदा श्रीवास्तव</strong><br></p>



<p class="has-black-color has-text-color has-link-color has-medium-font-size wp-elements-a163dba34237f49e517b01141d1b27b2">पांच राज्यों के चुनाव परिणाम की खास बात यह रही कि पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा के बाद केरलम से कम्युनिस्ट विचारधारा की विदाई हो गई। </p>



<p class="has-black-color has-text-color has-link-color has-medium-font-size wp-elements-8ce7a422b501e8e3ab49ec2e91434b7f">अजीब संयोग है कि कुछ माह पहले ही नेपाल से भी कम्युनिस्ट विचारधारा का खात्मा हुआ है। और अब भारत से बची-खुची इसके अवशेष अतीत होने के कगार पर है। कम्युनिस्ट विचारधारा फिलहाल भारत की राजनीति में सूट नहीं करती बावजूद इसके यह विचार धारा यहां दो चार प्रदेशों में अच्छे से फल-फूल रहा था। </p>



<p class="has-black-color has-text-color has-link-color has-medium-font-size wp-elements-a610c1a2fa838520d1f3c483c9f133a0">भारत और नेपाल दोनों ही इससे प्रभावित होते रहे हैं। फिलहाल अब भारत और इसके पड़ोसी राष्ट्र नेपाल दोनों ही इससे मुक्त हो गए हैं।</p>



<p class="has-black-color has-text-color has-link-color has-medium-font-size wp-elements-11848e5dd774a68e6b31e8701f10dd39"><br>एकाध चुनावों में किसी पार्टी के पराजय को उसके समापन की दृष्टि से देखना यद्यपि कि मुनासिब नहीं है लेकिन जब हम कट्टर कम्युनिस्ट राज्य पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा की ओर देखें तो कह सकते हैं कि केरलम में भी अब इस विचारधारा की वापसी नामुमकिन नहीं तो मुश्किल जरूर है।</p>



<blockquote class="wp-block-quote is-layout-flow wp-block-quote-is-layout-flow">
<p class="has-luminous-vivid-orange-color has-text-color has-link-color has-medium-font-size wp-elements-7a8ee0ca5b69d63b0f77ae2c4a4ce92e"><br>पश्चिम बंगाल से कम्युनिस्ट पार्टियों के बियाबान में पहुंचाने के लिए ममता बनर्जी को धन्यवाद दिया जाना चाहिए, भले ही वे सत्ता से बेदखल हो गई हों। नेपाल में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी की वाह वाही इसलिए भी खूब हो रही है कि उसने नेपाल जैसे कट्टर कम्युनिस्ट देश से वामपंथ की विदाई कर दी। ममता बनर्जी का राजनीतिक भविष्य क्या होता है,यह कह पाना मुश्किल है लेकिन उन्हें बंगाल से कम्युनिस्टों की विदाई के लिए हमेशा याद किया जाएगा। ममता बनर्जी की राजनीतिक पृष्ठभूमि कांग्रेसी रही है। कांग्रेस में रहते हुए ही उन्हें बंगाल की शेरनी कहा गया था। उसके बाद जब वे एनडीए का हिस्सा बनीं तो उन्हें आर एस एस के मुख पत्र पांचजन्य के तत्कालीन संपादक तरुण विजय ने भी बंगाल की दुर्गा कहा। </p>
</blockquote>



<p class="has-black-color has-text-color has-link-color has-medium-font-size wp-elements-556d79271fcb4c1e246ad10799784918">अभी कुछ समय पहले दिवंगत हुए भाजपा के बौद्धिक संपदा के धनी राज्य सभा सांसद बलवीर पुंज ने भी भरी संसद में कहा था कि हमारी दीदी ममता जी बंगाल की साक्षात दुर्गा हैं।</p>



<p class="has-black-color has-text-color has-link-color has-medium-font-size wp-elements-4be0d9b1fb660d28fa9100b831926784"><br>सन,2001 में रक्षा सौदे में रिश्वत खोरी का बड़ा मामला उजागर होने के बाद उन्होंने एनडीए से नाता तोड़ लिया था लेकिन उसी वक्त बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने साफ कहा था कि भाजपा अभी भी उनकी प्रमुख स्वाभाविक सहयोगी है। </p>



<p class="has-black-color has-text-color has-link-color has-medium-font-size wp-elements-e791e0617e98299504530903bc4c6e6b">ममता बनर्जी इस चुनाव में भाजपा के हाथों भले ही बुरी तरह पराजित हुई हैं लेकिन कब उनके भीतर भाजपा के प्रति प्रेम उमड़ जाय,यह संभावना खत्म नहीं हुई है।<br>ममता बनर्जी ने 1997 में कांग्रेस तोड़कर मुकुल रॉय के साथ तृणमूल कांग्रेस का गठन किया था। उनका लक्ष्य पश्चिम बंगाल से कम्युनिस्टों के साथ कांग्रेस को भी खत्म करना था। </p>



<p class="has-black-color has-text-color has-link-color has-medium-font-size wp-elements-ece65a7912001a3b16628b0e09277e47">ममता बनर्जी के इस मुहिम में आरएसएस ने भी ममता बनर्जी को ‘बंगाल की दुर्गा’ बताते हुए खुलकर उनका साथ दिया। नतीजा 2011 में ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्टों का सफाया कर अपनी खुद की सरकार बनाने में कामयाब हो गईं।</p>



<p class="has-black-color has-text-color has-link-color has-medium-font-size wp-elements-e280b2dde56956607dc6e6eb590d044a"> तब से वे चार मई 2026 तक पश्चिम बंगाल की एक मात्र छत्रप बनीं रहीं। भाजपा को भी प्रत्यक्ष रूप से कोई एतराज़ नहीं था लेकिन अंदर अंदर वह बंगाल जीतने की रणनीति पर काम करती रही जिसमें अब जाकर उसे कामयाबी मिली।<br>ममता बनर्जी बंगाल से कम्युनिस्टों का सफाया करने के बाद भी वे भाजपा से दूर नहीं रहीं। उन्होंने 2019 में एन आर सी और सीएए के खिलाफ बहुत सारे आंदोलन जरूर किए लेकिन जब संसद में इस पर विल लाया गया तो उनके आठ सांसद संसद से गैर हाजिर होकर अप्रत्यक्ष रूप से इस विल के पास होने में मददगार की भूमिका निभाई।</p>



<p class="has-black-color has-text-color has-link-color has-medium-font-size wp-elements-a1c316bf9b824fcfef7aa4fd4df6e0e9"> इतना ही नहीं 2022 में उपराष्ट्रपति पद के लिए उन्होंने विपक्ष की उम्मीदवार मार्ग्रेट अल्वा के पक्ष में मतदान से साफ इंकार करते हुए सदन में हिस्सा ही नहीं लिया। 2022 में एक कार्यक्रम में उन्होंने आर एस एस की तारीफ में पुल बांधते हुए कहा था कि संघ दुनिया का सबसे सुव्यवस्थित संगठन है।</p>



<p class="has-black-color has-text-color has-link-color has-medium-font-size wp-elements-f809ce10d32fa0a7e7210e670efe7efd"><br>इस तरह देखें तो ममता बनर्जी उन्हीं के हाथों पराजित हुई हैं जिनसे उन्हें रहम की उम्मीद थी। इस बाबत कांग्रेस विधायक विरेंद्र चौधरी की टिप्पणी गौर तलब है कि पश्चिम बंगाल में न कोई जीता है न हारा है,यह सत्ता हस्तांतरण का एक स्वयंबर था जो चुनाव आयोग और केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों के सहयोग से धूम धड़ाके के साथ संपन्न हुआ।<br>लेकिन यही बात केरलम के लिए भी तो लागू होती है। ठीक है वहां केंद्रीय एजेंसियों की भूमिका अलग तरह की रही होगी, सत्ता का हस्तांतरण तो वहां भी हुआ। कांग्रेस गठबंधन कोई अपने कट्टर राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी से तो सत्ता छीनी नहीं है। </p>



<p class="has-black-color has-text-color has-link-color has-medium-font-size wp-elements-d145fe623d75dc6ab00c57b8f5655f6e">उसने भी अपने सहयोगी दल को ही पराजित कर सत्ता में वापसी की है। भारत में वामपंथ विचार धारा की जड़ों को देखें तो इसकी शुरुआत केरलम से ही हुई है। यहां 1957 में पहली बार वामपंथ की सरकार बनी। इसके बाद 1977 में पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में कम्युनिस्ट सरकार सत्ता रूढ़ हुई। इन दो प्रदेशों से वामपंथ के खात्मे के बाद केरल ही इनका आखिर किला बचा था,अब वह भी ढह गया। जिस तरह कभी ममता की पसंदीदा पार्टी भाजपा ने ममता बनर्जी को शिकस्त दी ठीक उसी तर्ज पर केरलम में एलडीएफ को अपने ही घटक दल के हाथों मात खानी पड़ी।<br></p>



<p class="has-black-color has-text-color has-link-color has-medium-font-size wp-elements-761a3c922122b33977fa50d70d2166f5">सवाल यह नहीं कि कम्युनिस्टों का सफाया किसके हाथ हुआ, संतोष यह है कि नेपाल के बाद उसका यह पड़ोसी मित्र राष्ट्र भी कम्युनिस्ट मुक्त हो गया। भारत के बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ सहित कुछ अन्य प्रदेशों में भी हल्का फुल्का कम्युनिस्ट विचारधारा का प्रभाव था लेकिन वहां पहले ही इससे मुक्ति मिल गई थी। बिहार में अब सिर्फ तीन कम्युनिस्ट विधायक हैं जबकि झारखंड में दो ही हैं। त्रिपुरा जो लंबे समय तक वामपंथ का गढ़ था वहां भी मात्र 11 वामपंथी विधायक हैं। पश्चिम बंगाल में मात्र एक विधायक वामपंथी हैं। हां वामपंथियों का केरलम में अभी कुछ अवशेष जरूर बचा है लेकिन भविष्य में उसके पुनर्विस्तार की संभावना बहुत कम है क्योंकि आने वाले दिनों में यहां भाजपा और कांग्रेस ही मुख्य मुकाबले की पार्टी होगी। </p>



<p class="has-black-color has-text-color has-link-color has-medium-font-size wp-elements-abbb2ee5afba3d713c55006cf42c4a8c">राहुल गांधी कहते हैं कि बंगाल में ममता बनर्जी ने भाजपा के लिए रास्ता खोल दिया है। यह बात राहुल गांधी पर लागू होती है कि उन्होंने भी केरलम में भाजपा का रास्ता खोल दिया है।</p>



<p></p>
]]></content:encoded>
					
		
		
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		<title>पश्चिम बंगाल 2026: वोट डिलीशन ने कैसे तय की जीत-हार की बाजी?</title>
		<link>https://www.jubileepost.in/west-bengal-2026-how-did-vote-deletion-decide-victory-or-defeat/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Syed Mohammad Abbas]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 05 May 2026 07:32:08 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Main Slider]]></category>
		<category><![CDATA[इण्डिया]]></category>
		<category><![CDATA[ओपिनियन]]></category>
		<category><![CDATA[जुबिली डिबेट]]></category>
		<category><![CDATA[Election Result Live 2026]]></category>
		<category><![CDATA[West Bengal CM Update]]></category>
		<category><![CDATA[कौन बनेगा बंगाल का मुख्यमंत्री]]></category>
		<category><![CDATA[बंगाल चुनाव परिणाम 2026]]></category>
		<category><![CDATA[बंगाल शपथ ग्रहण 9 मई]]></category>
		<category><![CDATA[बंगाल सरकार गठन]]></category>
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					<description><![CDATA[उत्कर्ष सिन्हा पश्चिम बंगाल की 2026 विधानसभा चुनाव परिणामों ने एक बार फिर राज्य की राजनीति को उलट-पुलट कर दिया। कुल 294 सीटों में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के बीच कांटे की टक्कर देखने को मिली। लेकिन चुनावी गणित का असली राज़ छिपा है वोटर डिलीशन और विक्ट्री मार्जिन के बीच &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="has-vivid-red-color has-text-color has-link-color has-medium-font-size wp-elements-7450e58fa7271d73aa4702fe8b80d9d7"><strong>उत्कर्ष सिन्हा</strong></p>



<figure class="wp-block-image size-full is-resized"><img fetchpriority="high" decoding="async" width="640" height="640" src="https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2026/05/image-25.png" alt="" class="wp-image-341347" style="width:120px;height:auto" srcset="https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2026/05/image-25.png 640w, https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2026/05/image-25-300x300.png 300w, https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2026/05/image-25-150x150.png 150w" sizes="(max-width: 640px) 100vw, 640px" /></figure>



<p class="has-vivid-red-color has-text-color has-link-color has-medium-font-size wp-elements-ae522539f095113ee7f6136324b899e8"><strong>पश्चिम बंगाल की 2026 विधानसभा चुनाव परिणामों ने एक बार फिर राज्य की राजनीति को उलट-पुलट कर दिया। कुल 294 सीटों में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के बीच कांटे की टक्कर देखने को मिली। लेकिन चुनावी गणित का असली राज़ छिपा है वोटर डिलीशन और विक्ट्री मार्जिन के बीच के फासले में।</strong></p>



<p class="has-medium-font-size">विधानसभा चुनाव में वोटर डिलीशन और विक्ट्री मार्जिन का डेटा एक बड़ा राजनीतिक संकेत दे रहा है। कुल 294 सीटों में से 147 सीटें ऐसी रहीं, जहां वोटर डिलीशन जीत के अंतर से ज्यादा था। यानी करीब 50% सीटों पर चुनावी नतीजे सिर्फ मतों की संख्या से नहीं, बल्कि वोटर लिस्ट में हुए बदलावों से भी प्रभावित दिखे।</p>



<p class="has-medium-font-size">आंकड़ों से साफ होता है कि लगभग 50% सीटों (147) पर डिलीशन विक्ट्री मार्जिन से कहीं ज्यादा रहा। इनमें बीजेपी को 88, टीएमसी को 57 और कांग्रेस को महज 2 सीटें मिलीं। यह ट्रेंड बताता है कि वोटों का बिखराव ही कई सीटों पर &#8216;किंगमेकर&#8217; साबित हुआ।</p>



<p class="has-medium-font-size">बड़ी तस्वीर को समझें तो बीजेपी ने कुल 208 सीटों पर लीड लिया, जिनमें 42% (88 सीटें) ऐसी रहीं जहां वोटर डिलीशन मार्जिन से बड़ा था। जबकि टीएमसी की 79 सीटों में 72% (57 सीटें) पर यही हाल रहा।</p>



<p class="has-medium-font-size">इसका मतलब यह है कि बीजेपी को डिलीशन से फायदा कम, लेकिन स्थिरता ज्यादा मिली, जबकि टीएमसी को नुकसान ज्यादा झेलना पड़ा।</p>



<p class="has-medium-font-size">विशेषज्ञों का मानना है कि यह विपक्षी एकता की कमी और तीसरे मोर्चे के वोट कटने का भी नतीजा है।उदाहरणस्वरूप, कई सीटों पर वामपंथी या कांग्रेस के वोट बीजेपी के पक्ष में ट्रांसफर हो गए, जिससे टीएमसी का मार्जिन कम हो गया।</p>



<p class="has-medium-font-size">कई हाई-इम्पैक्ट सीट्स इस विश्लेषण के केंद्र में हैं, जहां डिलीशन और मार्जिन का अंतर &#8216;गेमचेंजर&#8217; साबित हुआ।<br>जोरासांको में डिलीशन 75,909 रहा, जबकि मार्जिन सिर्फ 5,797 रहा यानी फर्क: +70,112 मतों का है! बीजेपी की जीत यहां वोटर डिलीशन के दम पर टिकी दिख रही है।</p>



<p class="has-medium-font-size">इसी तरह चौरंगी में टीएमसी ने 84,746 डिलीशन के बीच 22,002 मार्जिन से जीत दर्ज की (+62,744 फर्क), लेकिन यह अपवाद था। आसनसोल उत्तर (+41,423 फर्क, बीजेपी जीत), बैरकपुर (डिलीशन 45,582 vs मार्जिन 15,544, बीजेपी जीत) और सिताई (+28,784 फर्क, टीएमसी जीत) जैसी सीटें बताती हैं कि जहां डिलीशन 3-4 गुना मार्जिन से ज्यादा रहा, वहां जीत संयोग नहीं, रणनीति थी।</p>



<p class="has-medium-font-size">ये आंकड़े बीजेपी की स्मार्ट वोट मैनेजमेंट को रेखांकित करते हैं। 2021 के मुकाबले 2026 में 68 सीटें फ्लिप हुईं जो टीएमसी से बीजेपी के पाले में चली गई और रोचक बात: इन सभी में डिलीशन मार्जिन से ज्यादा था।</p>



<p class="has-medium-font-size">2021 में टीएमसी ने इन सीटों पर भारी बहुमत से जीत हासिल की थी, लेकिन 2026 में विपक्ष का बंटवारा उनके लिए घातक साबित हुआ। कोलकाता के शहरी इलाकों से लेकर ग्रामीण बंगाल तक यह पैटर्न दिखा। बैरकपुर जैसे औद्योगिक क्षेत्र में बीजेपी ने हिंदू वोटों को एकजुट किया, जबकि टीएमसी मुस्लिम-गैर-हिंदू बंटवारे का शिकार हुई।</p>



<blockquote class="wp-block-quote has-luminous-vivid-orange-color has-text-color has-link-color wp-elements-491b1e6c3251ced7a1562aef5b3337dc is-layout-flow wp-block-quote-is-layout-flow">
<p class="has-medium-font-size"><strong>टीएमसी के नजरिए से यह डेटा चिंताजनक है। 72% सीटों पर डिलीशन का दबदबा दिखाता है कि ममता बनर्जी की &#8216;मां-माटी-मानुष&#8217; अपील अब पर्याप्त नहीं। 2021 में उन्होंने 213 सीटें जीती थीं, लेकिन 2026 में गिरावट आई। इसका कारण है आंतरिक कलह, प्रवासी बंगाली वोटों का पलायन और बीजेपी की &#8216;जय श्री राम&#8217; लहर। हाई-इम्पैक्ट सीट्स जैसे चौरंगी में टीएमसी बची जरूर, लेकिन सिताई जैसी ग्रामीण सीटों पर भी डिलीशन ने उन्हें किनारे पर ला खड़ा किया।</strong></p>
</blockquote>



<p class="has-medium-font-size">आंकड़े बता रहे हैं कि अगर कांग्रेस या वामपंथी वोट एकजुट होते, तो 57 में से कम से कम 20-25 सीटें टीएमसी के पक्ष में झुक सकती थीं।</p>



<p class="has-medium-font-size">बीजेपी के लिए यह जीत रणनीतिक है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने &#8216;डिवाइड एंड रूल&#8217; को परफेक्ट बनाया है। 88 सीटों पर डिलीशन का फायदा उठाकर उन्होंने 2021 के 77 से 208 तक छलांग लगाई।</p>



<p class="has-medium-font-size">एक बारगी कहा जा सकता है कि 68 फ्लिप्ड सीटें बताती हैं कि बंगाल में &#8216;परिवर्तन&#8217; की लहर तेज हो रही है। रायगंज, मेदिनीपुर जैसे क्षेत्रों में बीजेपी ने टीएमसी के किले ढहाए।</p>



<p class="has-medium-font-size">इस परिणाम के नीतिगत निहितार्थ गहरे हैं। यह चुनाव बंगाल की सामाजिक ध्रुवीकरण के नए गणित&nbsp;&nbsp;को उजागर करता है—हिंदू एकता बनाम क्षेत्रीय अस्मिता और डिलीशन का ट्रेंड भविष्य के चुनावों के लिए सबक है।&nbsp;&nbsp;वोट ट्रांसफर अब &#8216;सुपर पावर&#8217; है।</p>



<p class="has-medium-font-size">राजनीतिक विश्लेषकों के लिए यह ट्रेंड बेहद अहम है। इससे साफ होता है कि विपक्षी वोटों का बिखराव, वोटर लिस्ट से नाम कटने की प्रक्रिया और संकीर्ण जीत-हार का अंतर मिलकर चुनाव परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं।</p>



<p class="has-medium-font-size">कुल मिलाकर, 147 सीटों का यह डेटा साबित करता है कि बंगाल की राजनीति अब &#8216;मार्जिन&#8217; नहीं, &#8216;डिलीशन&#8217; की जंग है।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>अमेरिका ईरान संघर्ष में क्या है पाकिस्तान की कूटनीति !</title>
		<link>https://www.jubileepost.in/why-pakistan-is-mediating-in-us-iran-conflict/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Utkarsh Sinha]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 01 May 2026 10:55:23 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Main Slider]]></category>
		<category><![CDATA[ओपिनियन]]></category>
		<category><![CDATA[जुबिली डिबेट]]></category>
		<category><![CDATA[अमेरिका ईरान संघर्ष]]></category>
		<category><![CDATA[जुबिली पोस्ट]]></category>
		<category><![CDATA[जुबिली पोस्ट हिंदी खबर हिंदी समाचार]]></category>
		<category><![CDATA[यहूदीवाद]]></category>
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					<description><![CDATA[डॉ. दिनेश चंद्र श्रीवास्तव यह देखना दिलचस्प है कि पाकिस्तान ने संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष में मध्यस्थ की भूमिका निभाकर किस प्रकार एक अंतरराष्ट्रीय संबंधों के संकट को अवसर में बदलने का प्रयास किया है। इस कदम पर विश्व भर के राजनीतिक टिप्पणीकारों और विश्लेषकों के बीच व्यापक चर्चा हुई है &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p></p>



<p class="has-vivid-red-color has-text-color has-link-color has-medium-font-size wp-elements-f610f26754a61e0a6b571484da0b1a8f"><img decoding="async" width="150" height="154" class="wp-image-338506" style="width: 150px;" src="https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2026/03/Dinesh-srivastava-ji-1.png" alt=""></p>



<p class="has-vivid-red-color has-text-color has-link-color has-medium-font-size wp-elements-957cd23dd39398ee9e1f2cf903c8e180"><em><strong>डॉ. दिनेश चंद्र श्रीवास्तव </strong></em></p>



<p class="has-medium-font-size">यह देखना दिलचस्प है कि पाकिस्तान ने संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष में मध्यस्थ की भूमिका निभाकर किस प्रकार एक अंतरराष्ट्रीय संबंधों के संकट को अवसर में बदलने का प्रयास किया है। इस कदम पर विश्व भर के राजनीतिक टिप्पणीकारों और विश्लेषकों के बीच व्यापक चर्चा हुई है और कई स्थानों पर इसकी सराहना भी की गई है।</p>



<p class="has-medium-font-size">विस्तृत अमेरिका–इज़राइल–ईरान संघर्ष के प्रमुख पक्षों में संयुक्त राज्य अमेरिका, इज़राइल, ईरान, सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देश शामिल हैं, जिन सभी के पाकिस्तान के साथ महत्वपूर्ण संबंध हैं। इससे पाकिस्तान एक कठिन स्थिति में आ गया है, क्योंकि उसके सामने यह चुनौती है कि यदि करे तो वह किस पक्ष का समर्थन करे, ।</p>



<p class="has-medium-font-size">पाकिस्तान की कई देशों के प्रति महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ हैं। उसने संयुक्त राज्य अमेरिका, सऊदी अरब और चीन से वित्तीय सहायता की निर्भरता रखी है, साथ ही ईरान के साथ भी अपेक्षाकृत स्थिर संबंध बनाए रखे हैं, जो उसका पड़ोसी देश होने के साथ-साथ एक इस्लामी राष्ट्र भी है। इसके अतिरिक्त, पाकिस्तान का सऊदी अरब के साथ एक रक्षा समझौता है, जो पारस्परिक रक्षा सुनिश्चित करता है, जिसमें एक पर आक्रमण को दोनों पर आक्रमण माना जाता है। साथ ही, पाकिस्तान और ईरान ने अक्सर यहूदीवाद-विरोधी (Anti-Zionist) रुख साझा किया है।</p>



<p class="has-medium-font-size">इस बीच, चीन ईरान का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और रूस के साथ उसका एक प्रमुख सहयोगी भी है, जो उसे कूटनीतिक, रणनीतिक और सैन्य समर्थन प्रदान करता है। इसलिए, पाकिस्तान स्वयं को इस संघर्ष से अलग नहीं कर सकता और उसे सऊदी अरब, संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन और ईरान के प्रति अपनी जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाना पड़ रहा है, जो सभी इस जटिल भू-राजनीतिक स्थिति में उलझे हुए हैं।</p>



<p class="has-medium-font-size">जहाँ एक ओर चीन और ईरान कम से कम परोक्ष रूप से एक पक्ष में दिखाई देते हैं, वहीं संयुक्त राज्य अमेरिका और सऊदी अरब दूसरे पक्ष में हैं। ऐसी परिस्थितियों में किसी एक पक्ष का समर्थन करना पाकिस्तान के लिए बहुत ही &nbsp;महंगा &nbsp;साबित हो सकता है। परिणामस्वरूप, पाकिस्तान ने ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच वार्ता को सुगम बनाने की पहल की। यद्यपि इस पहल के पूर्व पाकिस्तान ने संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान दोनों से स्वीकृति ली होगी। इन महाशक्तियों की तुलना में अपनी सीमित स्थिति के बावजूद, यह संभवतः पाकिस्तान के लिए स्वयं को इस संघर्ष में और अधिक गहराई तक खिंचने से बचाने का सबसे अच्छा विकल्प था।</p>



<p class="has-medium-font-size">वर्तमान में, संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान दोनों ही इस युद्ध से थके हुए प्रतीत होते हैं और संभवतः इस संघर्ष से सम्मानजनक बाहर निकलने का मार्ग खोज रहे हैं। पाकिस्तान ने संदेशवाहक और वार्ताकार के रूप में कार्य करते हुए प्रारंभिक रूप से दोनों देशों के बीच युद्धविराम स्थापित कराने में सहायता की। यह पाकिस्तान जैसे देश के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, जो आर्थिक रूप से नाजुक स्थिति का सामना कर रहा है और जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आतंकवाद से संबंधित मुद्दों को लेकर अक्सर आलोचना का सामना करना पड़ा है।</p>



<p class="has-medium-font-size">यद्यपि युद्धविराम स्थापित किया गया, लेकिन संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता का पहला दौर कथित रूप से विफल रहा, और दूसरा दौर शुरू होने में असफल रहा है। पाकिस्तान दावा करता है कि उसने दोनों पक्षों का विश्वास अर्जित कर लिया है, लेकिन दोनों देश, विशेषकर ईरान, अभी भी सतर्क दिखाई देते हैं।</p>



<p class="has-medium-font-size">यदि पाकिस्तान इस संघर्ष को समाप्त करने और स्थायी शांति स्थापित करने में सफल होता है, तो यह देश के लिए एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक उपलब्धि होगी, विशेषकर उसकी वैश्विक छवि से जुड़ी चुनौतियों को देखते हुए। इतना ही नही, बल्कि खाड़ी –क्षेत्र में स्थायी शांति पाकिस्तान कि अर्थव्यवस्था के लिए भी बहुत ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि 50 प्रतिशत से ज्यादा विदेशी मुद्रा खाड़ी देशों में काम करने वाले पकिस्तानियों द्वारा ही भेजी जाती है, जिसमें सऊदी अरब और यूनाइटेड अरब अमीरात प्रमुख है। यदि वह इस संघर्ष का पूर्ण समाधान करने में सफल नहीं भी होता है, तब भी उसके मध्यस्थता प्रयास, कम से कम उसे युद्ध में प्रत्यक्ष रूप से उलझने से बचाने में सहायक हो सकते हैं।</p>



<p class="has-medium-font-size">हालाँकि, यदि युद्धविराम टूट जाता है और शत्रुता फिर से शुरू होती है, तथा पाकिस्तान किसी एक पक्ष का विश्वास खो देता है, तो इसके परिणाम बहुत ही प्रतिकूल हो सकते हैं। केवल समय ही बताएगा कि मध्यस्थ और वार्ताकार के रूप में पाकिस्तान के लिए आगे क्या स्थिति बनती है।</p>



<p class="has-medium-font-size">पाकिस्तान इस संघर्ष में मध्यस्तता के साथ कुछ आर्थिक हितों को भी जोड़ता हुआ दिखाई देता है। कराची और ग्वादर बंदरगाहों को सीधे ईरान से जोड़ने वाले छह स्थलीय मार्ग खोलकर, वह नाकेबंदी को दरकिनार करने और माल परिवहन को सुगम बनाने का प्रयास कर रहा है, जो होरमुज़ जलडमरूमध्य में व्यवधान की स्थिति में ईरान और अन्य देशों की सहायता कर सकता है। इन बंदरगाहों से पाकिस्तान को अधिक राजस्व प्राप्त हो सकता है, साथ ही उसकी अपनी तेल आपूर्ति संबंधी चिंताएँ भी कम हो सकती हैं।</p>



<p class="has-medium-font-size">दुर्भाग्यवश, कई विश्लेषक और टिप्पणीकार इस मुद्दे पर भारत और पाकिस्तान की तुलना कर रहे हैं, जो पूरी तरह उचित नहीं हो सकती। ऑपरेशन सिंदूर के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के बयानों और टैरिफ से जुड़े मुद्दों के बाद भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के संबंधों में गिरावट काफी निचले स्तर पर हैं। इसके अलावा, इज़राइल के साथ भारत के संबंध रणनीतिक और मजबूत हैं, जबकि ईरान के साथ उसके संबंध मुख्यतः आर्थिक हैं।</p>



<p class="has-medium-font-size">इन परिस्थितियों में भारत को मध्यस्थ की भूमिका निभाने की आकांक्षा नहीं रखनी चाहिए, जब तक कि संघर्ष में शामिल दोनों पक्षों द्वारा स्पष्ट रूप से ऐसा अनुरोध या प्रोत्साहन न दिया जाए। इसके बजाय, भारत को स्थिति पर सावधानीपूर्वक नज़र रखनी चाहिए और अनावश्यक रूप से इसमें उलझने से बचना चाहिए।</p>



<p class="has-medium-font-size">(लेखक अन्तराष्ट्रीय मामलों के विशेषग्य हैं)</p>



<p></p>
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