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	<title>जुबिली डिबेट Archives &#060; Jubilee Post | जुबिली पोस्ट</title>
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		<title>उच्च शिक्षा के प्रति सामाजिक उदासीनता- अभिभावकों की खामोशी</title>
		<link>https://www.jubileepost.in/social-apathy-towards-higher-education-the-silence-of-parents/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Syed Mohammad Abbas]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 26 Apr 2026 08:59:49 +0000</pubDate>
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		<category><![CDATA[University Education Quality]]></category>
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					<description><![CDATA[प्रोफेसर अशोक कुमार राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भारतीय शिक्षा जगत में एक नई सुबह की उम्मीद लेकर आई है। प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा पर सामाजिक संगठनों के माध्यम से पर्याप्त ध्यान दिया जा रहा है, लेकिन उच्च शिक्षा का क्षेत्र आज एक गहरे संकट से जूझ रहा है। वर्तमान में उच्च शिक्षा की स्थिति स्कूलों &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="has-vivid-red-color has-text-color has-link-color has-medium-font-size wp-elements-b180e4082c27fc4fa38affb30079f430"><strong>प्रोफेसर अशोक कुमार</strong></p>



<figure class="wp-block-image size-full is-resized"><img decoding="async" width="200" height="200" src="https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2026/04/image-121.png" alt="" class="wp-image-340856" style="width:113px;height:auto" srcset="https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2026/04/image-121.png 200w, https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2026/04/image-121-150x150.png 150w" sizes="(max-width: 200px) 100vw, 200px" /></figure>



<p class="has-black-color has-text-color has-link-color has-medium-font-size wp-elements-9ec3dd8b7582efa94fe18e4ae1b78da9"><strong><em>राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भारतीय शिक्षा जगत में एक नई सुबह की उम्मीद लेकर आई है। प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा पर सामाजिक संगठनों के माध्यम से पर्याप्त ध्यान दिया जा रहा है, लेकिन उच्च शिक्षा का क्षेत्र आज एक गहरे संकट से जूझ रहा है। वर्तमान में उच्च शिक्षा की स्थिति स्कूलों की तुलना में कहीं अधिक चिंताजनक है। इसका मुख्य कारण शिक्षा का ‘व्यवसायीकरण’ है, जिसने औपचारिक शिक्षण संस्थानों को केवल ‘डिग्री बाँटने वाले केंद्रों’ में बदल दिया है और कोचिंग सेंटरों को असली शिक्षा का केंद्र बना दिया है।</em></strong></p>



<p class="has-black-color has-text-color has-link-color has-medium-font-size wp-elements-9ea9de3557edab6b4469dff93e6affdc"></p>



<h3 class="wp-block-heading has-vivid-red-color has-text-color has-link-color has-medium-font-size wp-elements-ffd08df168c6562ad6978f4a4b3941cc"><strong>डमी स्कूल और कोचिंग संस्कृति: एक समानांतर व्यवस्था</strong></h3>



<p class="has-black-color has-text-color has-link-color has-medium-font-size wp-elements-10eb147d84d064d813ed909fb449dcc2"><strong>आज की सबसे बड़ी विडंबना ‘डमी स्कूल’ और ‘नॉन-अटेंडिंग’ कॉलेज हैं।</strong></p>



<p class="has-medium-font-size"><strong>संस्थानों का खोखलापन:</strong> छात्र केवल कागज़ों पर स्कूल या कॉलेज में नामांकित होते हैं, जबकि उनका पूरा समय कोचिंग सेंटरों में बीतता है। इससे औपचारिक शिक्षण संस्थानों का शैक्षणिक वातावरण पूरी तरह नष्ट हो चुका है।</p>



<p class="has-medium-font-size"><strong>व्यक्तित्व विकास की बलि:</strong> स्कूल और कॉलेज केवल पढ़ाई के लिए ही नहीं, बल्कि सामाजिक व्यवहार, नैतिकता, खेल और अनुशासन सीखने के केंद्र होते हैं। डमी संस्कृति के कारण छात्र इन जीवन-कौशलों से वंचित रह जाते हैं और केवल ‘रैंक’ लाने वाली मशीन बनकर रह जाते हैं।</p>



<h3 class="wp-block-heading has-vivid-red-color has-text-color has-link-color has-medium-font-size wp-elements-12fe2159bab525abde532a9eb50a9ebb"><strong>अभिभावकों की भूमिका और संवादहीनता</strong></h3>



<p class="has-medium-font-size">उच्च शिक्षा के इस बिगाड़ में अभिभावकों का रवैया भी एक महत्वपूर्ण कारक है।</p>



<p class="has-medium-font-size"><strong>अभिभावकों की चुप्पी:</strong> अक्सर देखा जाता है कि स्कूल तक तो माता-पिता बच्चों की पढ़ाई में रुचि लेते हैं, लेकिन कॉलेज स्तर पर पहुँचते ही वे या तो बच्चों की बात कम सुनते हैं या हस्तक्षेप करना छोड़ देते हैं।</p>



<p class="has-medium-font-size"><strong>कोचिंग को प्राथमिकता:</strong> अभिभावक स्वयं बच्चों को नियमित कॉलेज भेजने के बजाय कोचिंग सेंटरों की भारी-भरकम फीस भरना अधिक उचित समझते हैं। उन्हें लगता है कि औपचारिक शिक्षा की डिग्री तो ‘जुगाड़’ से भी मिल जाएगी, जबकि असली मेहनत प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए करनी है।</p>



<h3 class="wp-block-heading has-vivid-red-color has-text-color has-link-color has-medium-font-size wp-elements-c40a0d9d75b3c3c0675655b93f630c92"><strong>विशेष खंड: कोचिंग हब का दबाव और मानसिक स्वास्थ्य का संकट</strong></h3>



<p class="has-medium-font-size">कोटा और जयपुर जैसे कोचिंग हब आज ‘सफलता की फैक्ट्रियां’ तो बन गए हैं, लेकिन यहाँ से आने वाली खबरें चिंताजनक हैं।</p>



<p><strong>एकाकीपन और अवसाद:</strong> डमी स्कूलों के कारण छात्र अपने हमउम्र साथियों के साथ स्वस्थ सामाजिक वातावरण से कट जाते हैं। कोचिंग की 12–14 घंटे की पढ़ाई और तीव्र प्रतिस्पर्धा उन्हें मानसिक दबाव में डाल देती है, जहाँ केवल ‘नंबर’ ही मायने रखते हैं।</p>



<p class="has-medium-font-size"><strong>अभिभावकों की अवास्तविक अपेक्षाएँ:</strong> अभिभावक बच्चों को कोचिंग में भेजकर यह मान लेते हैं कि उनका चयन लगभग निश्चित है। यह उम्मीद बच्चों पर ‘प्रदर्शन के दबाव’ के रूप में भारी पड़ती है। जब छात्र इस दबाव को सहन नहीं कर पाते, तो वे गंभीर मानसिक संकट में पहुँच जाते हैं।</p>



<p class="has-medium-font-size"><strong>संवाद का अभाव:</strong> घर से दूर हॉस्टल में रह रहे छात्रों के पास अक्सर ऐसा कोई मंच नहीं होता, जहाँ वे अपनी भावनाएँ साझा कर सकें। औपचारिक स्कूलों में होने वाली खेलकूद और सांस्कृतिक गतिविधियाँ तनाव कम करने में सहायक होती थीं, जो कोचिंग संस्कृति में लगभग समाप्त हो चुकी हैं।</p>



<h3 class="wp-block-heading has-vivid-red-color has-text-color has-link-color has-medium-font-size wp-elements-308a772a1ac22d29cae3a0c6eb315673"><strong>औपचारिक शिक्षा की गुणवत्ता और अप्रासंगिकता</strong></h3>



<p class="has-medium-font-size">यह एक कड़वा सच है कि आज सरकारी और कई निजी विश्वविद्यालयों में औपचारिक शिक्षा की गुणवत्ता अत्यंत निम्न स्तर पर है।</p>



<p class="has-medium-font-size"><strong>अपडेटेड पाठ्यक्रम का अभाव:</strong> पाठ्यक्रमों का उद्योगों की मांग या प्रतियोगी परीक्षाओं के स्तर से तालमेल नहीं है।</p>



<p class="has-medium-font-size"><strong>मूल्यांकन पद्धति:</strong> कॉलेज की परीक्षाएँ मुख्यतः रटने की क्षमता को परखती हैं, जबकि प्रतियोगी परीक्षाएँ तार्किक और विश्लेषणात्मक सोच पर आधारित होती हैं। यही कारण है कि छात्र औपचारिक कक्षाओं को समय की बर्बादी मानने लगते हैं।</p>



<h3 class="wp-block-heading has-vivid-red-color has-text-color has-link-color has-medium-font-size wp-elements-c6adca98085151403d391d171ee9e3b8"><strong>क्रांतिकारी समाधान: अंकों का एकीकरण और पात्रता परीक्षा</strong></h3>



<p class="has-medium-font-size">इस समस्या का एक प्रभावी समाधान एकीकृत मूल्यांकन प्रणाली हो सकता है।</p>



<p class="has-medium-font-size"><strong>प्राप्तांकों की अनिवार्यता:</strong> यदि प्रतियोगी परीक्षाओं के अंतिम चयन में स्कूल और कॉलेज के क्वालीफाइंग एग्जाम्स (जैसे 12वीं या स्नातक) के अंकों को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए, तो छात्र और अभिभावक औपचारिक शिक्षा को गंभीरता से लेने लगेंगे।</p>



<p class="has-medium-font-size"><strong>कोचिंग पर निर्भरता में कमी:</strong> जब बोर्ड और स्नातक अंकों का महत्व बढ़ेगा, तो छात्र डमी स्कूलों के बजाय वास्तविक कक्षाओं की ओर लौटेंगे। इससे कोचिंग संस्थानों का एकाधिकार कम होगा और छात्रों पर ‘एक ही परीक्षा’ में सब कुछ दांव पर लगाने का दबाव भी घटेगा।</p>



<h3 class="wp-block-heading has-vivid-red-color has-text-color has-link-color wp-elements-75ef284479eacfa2b0d6ef7dd85e3207"><strong>सामाजिक संस्थाओं और सरकार की जिम्मेदारी</strong></h3>



<p class="has-medium-font-size">उच्च शिक्षा में सुधार के लिए इसे एक सामाजिक आंदोलन का रूप देना होगा।</p>



<p class="has-medium-font-size"><strong>सामाजिक संगठनों की भूमिका:</strong> एनजीओ को अभिभावकों के साथ काउंसलिंग सत्र आयोजित करने चाहिए, ताकि वे डमी स्कूलों के खतरे और बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को समझ सकें।</p>



<p class="has-medium-font-size"><strong>सरकारी नियंत्रण:</strong> सरकार को उन शिक्षण संस्थानों की मान्यता रद्द करनी चाहिए, जो केवल कागज़ों पर संचालित हो रहे हैं। साथ ही, कोचिंग संस्थानों के लिए कड़े नियामक कानून लागू करने की आवश्यकता है।</p>



<p class="has-medium-font-size">उच्च शिक्षा की स्थिति में सुधार के लिए त्रि-आयामी दृष्टिकोण अपनाना होगा। सरकार को नीतिगत बदलाव कर औपचारिक शिक्षा के अंकों को प्रतियोगी परीक्षाओं में शामिल करना चाहिए। अभिभावकों को बच्चों के साथ संवाद स्थापित कर उन्हें डमी संस्कृति से दूर रखते हुए सर्वांगीण विकास के लिए प्रेरित करना होगा।</p>



<p class="has-vivid-red-color has-text-color has-link-color has-medium-font-size wp-elements-caf5e27e7e79c3b59cd9e7794e5ba4e5"><em>जब औपचारिक शिक्षा का सम्मान पुनः स्थापित होगा, तभी देश को वास्तव में योग्य, मानसिक रूप से सशक्त और चरित्रवान नागरिक मिल पाएंगे।</em></p>



<p class="has-black-color has-text-color has-link-color has-medium-font-size wp-elements-37346f2f898d78c8080d0b8707d69e26">(लेखक प्रख्यात शिक्षाविद और  कानपुर तथा गोरखपुर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति हैं  )</p>



<p></p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>पंजाब में आपरेशन लोटस : जनादेश नहीं तो षड्यंत्र सही  </title>
		<link>https://www.jubileepost.in/opration-in-punjab/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Utkarsh Sinha]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 25 Apr 2026 10:59:13 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Main Slider]]></category>
		<category><![CDATA[जुबिली डिबेट]]></category>
		<category><![CDATA[आपरेशन लोटस]]></category>
		<category><![CDATA[जुबिली पोस्ट]]></category>
		<category><![CDATA[राघव चड्ढा]]></category>
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					<description><![CDATA[उत्कर्ष सिन्हा &#8220;लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जनता द्वारा चुनी गई सत्ता, जब साजिशों और दल-बदल के हथकंडों से हथियाई जाती है, तो वह लोकतंत्र का अपमान मात्र नहीं, बल्कि स्वतंत्रता का गला घोंटने वाली तानाशाही का प्रारंभिक रूप बन जाती है।&#8221; &#8212; ब्रिटिश दार्शनिक जॉन स्टुअर्ट मिल पंजाब की राजनीतिक गलियारों &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p></p>



<p class="has-vivid-red-color has-text-color has-link-color has-medium-font-size wp-elements-7450e58fa7271d73aa4702fe8b80d9d7"><strong>उत्कर्ष सिन्हा</strong></p>



<p class="has-black-color has-text-color has-link-color has-medium-font-size wp-elements-a1bedc75e48ea0a5a2b9e645a1fc7c2f"><em><strong>&#8220;लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जनता द्वारा चुनी गई सत्ता, जब साजिशों और दल-बदल के हथकंडों से हथियाई जाती है, तो वह लोकतंत्र का अपमान मात्र नहीं, बल्कि स्वतंत्रता का गला घोंटने वाली तानाशाही का प्रारंभिक रूप बन जाती है।&#8221; &#8212; ब्रिटिश दार्शनिक जॉन स्टुअर्ट मिल </strong></em></p>



<p class="has-medium-font-size">पंजाब की राजनीतिक गलियारों में इन दिनों आये भूचाल के बाद यह कथन एक बार फिर सिद्ध हो रहा है &nbsp;। आम आदमी पार्टी (AAP) के प्रमुख नेता और राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने न केवल अपनी पार्टी से इस्तीफा दे दिया, बल्कि भाजपा का दामन थाम लिया है। उनके साथ संदीप &nbsp;पाठक, अशोक मित्तल और हर्भजन सिंह जैसे अन्य नेता भी भाजपा में शामिल हो चुके हैं। यह महज एक व्यक्तिगत विद्रोह नहीं, बल्कि भाजपा की लंबे समय से चली आ रही रणनीति का हिस्सा है – विपक्षी दलों को अंदर से कमजोर करना, विधायकों की खरीद-फरोख्त कर सत्ता हथियाना। पंजाब विधानसभा में AAP के पास अभी भी 91 विधायकों का मजबूत बहुमत है, जहां बहुमत का आंकड़ा 59 होता &nbsp;है, लेकिन खबरें हैं कि राघव चड्ढा के निशाने पर 63 AAP विधायक हैं। यह संख्या बड़ी है, क्योंकि यदि 32 विधायक भी पाला बदल लें, तो सरकार गिर सकती है।</p>



<p class="has-medium-font-size">भाजपा को अच्छी तरह पता है कि पंजाब की जनता ने 2022 में AAP को 92 सीटें देकर स्पष्ट जनादेश दिया था, और सीधे चुनाव लड़कर भाजपा को कभी पूर्ण बहुमत नहीं मिला। इसलिए,  भाजपा अब अपने पुराने रणनीति  – पार्टी तोड़ो, सरकार बनाओ की रह पर है ।</p>



<p class="has-medium-font-size">पंजाब विधानसभा का वर्तमान गणित फिलहाल स्पष्ट रूप से AAP के पक्ष में है। 117 सीटों वाली इस सभा में AAP के 91, कांग्रेस के 14, शिरोमणि अकाली दल (SAD) के 3, भाजपा के 1 और अन्य स्वतंत्रों के पास बाकी सीटें हैं। कुछ सीटें उपचुनावों या अन्य कारणों से खाली भी हैं। लेकिन भाजपा की नजर AAP विधायकों पर है। राघव चड्ढा का पंजाब से गहरा जुड़ाव रहा है – वे राज्यसभा सदस्य के रूप में यहां की राजनीति को अच्छी तरह समझते हैं। भाजपा ने जानबूझकर उन्हें चुना, ताकि वे AAP के असंतुष्ट विधायकों को लुभा सकें।</p>



<p class="has-medium-font-size">दूसरी तरफ भगवंत मान सरकार पर किसान आंदोलन के बाद से कई मोर्चों पर दबाव है – बेरोजगारी, ड्रग्स समस्या, पानी विवाद और केंद्र से टकराव। इन मुद्दों का फायदा उठाकर भाजपा विधायकों को &#8216;विकास&#8217; और &#8216;केंद्र की योजनाओं&#8217; का प्रलोभन दे रही है।</p>



<p class="has-medium-font-size">यह वही पुरानी चाल है जो गोवा, मणिपुर और मध्य प्रदेश में चली, जहां जनादेश का धता बता कर सत्ता हथियाई गई। लोकतंत्र में जनता का फैसला सर्वोपरि होता है, लेकिन मोदी शाह की भाजपा की राजनीति में &#8216;ऑपरेशन लोटस&#8217; सर्वोपरि है।</p>



<p class="has-medium-font-size">गहराई से विश्लेषण करें तो भाजपा का यह आपरेशन &nbsp;पंजाब की 2027 विधानसभा चुनावों से ठीक एक साल पहले क्यों हो रहा है ? कारण साफ है – भाजपा का पंजाब में पारंपरिक वोटबैंक कमजोर है। हिंदू वोटों के एक हिस्से पर निर्भर यह पार्टी पंजाबी सिख बहुल राज्य में कभी मजबूत नहीं हुई। 2022 में उसे सिर्फ 2% वोट मिले थे। सीधे जनादेश से जीत असंभव लगती है, इसलिए &#8216;बायपास &#8216; रणनीति अपनाई जा रही है । चड्ढा जैसे युवा, पढ़े-लिखे चेहरे को आगे लाकर वे AAP के युवा वोटरों को लुभा सकते हैं।</p>



<p class="has-medium-font-size">भगवंत मान ने इसे &#8216;डिफेक्शन प्लॉट&#8217; कहा है, जो सही भी लगता है। AAP के 63 विधायकों के संपर्क में होने की अफवाहें मीडिया में हैं, और यदि यह सच साबित हुई, तो यह महाभियोग का आधार बनेगा। लेकिन भाजपा के पास संसाधन हैं – केंद्रीय एजेंसियों का दबाव, आर्थिक प्रलोभन और दिल्ली से निर्देश। अरविंद केजरीवाल को दिल्ली में ही ED-CBI का सामना करना पड़ रहा है; पंजाब में वैसा ही दबाव बन सकता है।</p>



<p class="has-medium-font-size">इस षड्यंत्र का ऐतिहासिक संदर्भ देखें तो भाजपा की यह राजनीति नई नहीं है । 2019 में कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन को तोड़कर सत्ता ली। मध्य प्रदेश में कमलनाथ सरकार ज्योतिरादित्य सिंधिया के 22 विधायकों के साथ गिरी। गोवा में भाजपा ने अल्पमत में आकर फिर बहुमत जुटाया। पंजाब में भी यही फॉर्मूला – पहले छोटे स्तर पर तोड़ो, फिर सरकार बनाओ। लेकिन पंजाब अलग है। यहां सिख समुदाय की मजबूत पहचान है, जो दल-बदल को धोखा मानता है। यदि विधायक भाजपा में गए, तो जनता का गुस्सा उमड़ेगा। कांग्रेस, हालाकि पहले से कमजोर है, फिर भी वह इस परिस्थिति&nbsp; का लाभ ले सकती है। नवजोत सिंह सिद्धू जैसे नेता फिर सक्रिय हो सकते हैं। शिरोमणि अकाली दल &nbsp;भी फिलहाल अलग-थलग पड़ी है।</p>



<p class="has-medium-font-size">कुल मिलाकर, भाजपा का लक्ष्य AAP को 50 सीटों के नीचे लाना है, ताकि गठबंधन या अल्पमत सरकार संभव हो। लेकिन गणितीय रूप से, 91 से 59 तक गिरावट के लिए 32 विधायकों का पलायन जरूरी है । क्या इतने विधायक इतने बेईमान हैं? यह सवाल पंजाब की जनता के सामने है।</p>



<p class="has-medium-font-size">गंभीर नजरिए से देखें तो इस तरह के षड्यंत्र भारतीय लोकतंत्र के लिए खतरा है। संविधान की &nbsp;दसवीं अनुसूची में दल-बदल विरोधी कानून है, लेकिन &#8216;मर्जर&#8217; के बहाने इसे तोड़ा जाता है। चड्ढा ने AAP के 7 राज्यसभा सांसदों को &#8216;मर्ज&#8217; कर लिया, जो दल-बदल नहीं माना जाएगा। भाजपा इसी खामी का फायदा उठाती है। पंजाब में यदि सरकार गिरी, तो राष्ट्रपति शासन लग सकता है, जो केंद्र (भाजपा) के हाथ में सत्ता दे देगा।</p>



<p class="has-medium-font-size">कुल मिला कर पंजाब की&nbsp; स्थिति पर अगले कुछ दिनों तक निगाह बनाये रखनी होगी.&nbsp; पंजाब विश्वविद्यालय &nbsp;में राजनीति विज्ञान विभाग के प्रमुख प्रो. अशविनी कुमार महाजन कहते हैं &#8211;&nbsp; &#8220;भाजपा का यह षड्यंत्रपूर्ण खेल पंजाब के लोकतंत्र के मूलभूत ताने-बाने को चुनौती दे रहा है, जहां जनादेश की जगह &#8216;ऑपरेशन लोटस&#8217; की साजिशें सत्ता का आधार बन रही हैं। यदि 63 AAP विधायकों का पलायन साकार हुआ, तो न केवल भगवंत मान सरकार खतरे में पड़ जाएगी, बल्कि पंजाब की राजनीति में स्थायी अविश्वास की संस्कृति जन्म लेगी।&#8221;</p>



<p></p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>गृहमंत्री सुडान गुरूंग के स्तीफे से असहज हुई बालेन सरकार</title>
		<link>https://www.jubileepost.in/home-minister-sudan-gurungs-resignation-leaves-balen-government-uneasy/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Syed Mohammad Abbas]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 24 Apr 2026 18:19:04 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Main Slider]]></category>
		<category><![CDATA[ओपिनियन]]></category>
		<category><![CDATA[जुबिली डिबेट]]></category>
		<category><![CDATA[Balen government crisis]]></category>
		<category><![CDATA[Nepal Home Minister resignation]]></category>
		<category><![CDATA[Nepal politics news]]></category>
		<category><![CDATA[Sudan Gurung resignation]]></category>
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					<description><![CDATA[यशोदा श्रीवास्तव नेपाल में दो मंत्रियों के रुखसती को &#8220;बालेन सरकार की उलटी गिनती&#8221; की दृष्टि से भले न देखा जाए लेकिन इस घटना से मात्र 26 दिन पूर्व सत्ता रूढ़ हुई बालेन सरकार के अनुभव और परिपक्वता को लेकर सवाल उठना लाजिमी है। मनी लांड्रिंग और विवादित व्यवसायी दीपक भट्ट से व्यवसायिक साझेदारी, संपत्ति &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="has-vivid-red-color has-text-color has-link-color has-medium-font-size wp-elements-89c0897f668c445c3bf10f2af1913c91"></p>



<figure class="wp-block-image size-full is-resized"><img fetchpriority="high" decoding="async" width="300" height="250" src="https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2026/04/image-113.png" alt="" class="wp-image-340776" style="width:127px;height:auto"/></figure>



<p class="has-vivid-red-color has-text-color has-link-color has-medium-font-size wp-elements-258749f2403c55ec98c811ff5c6b7b8d"><strong>यशोदा श्रीवास्तव</strong></p>



<p class="has-medium-font-size"> नेपाल में दो मंत्रियों के रुखसती को &#8220;बालेन सरकार की उलटी गिनती&#8221; की दृष्टि से भले न देखा जाए लेकिन इस घटना से मात्र 26 दिन पूर्व सत्ता रूढ़ हुई बालेन सरकार के अनुभव और परिपक्वता को लेकर सवाल उठना लाजिमी है। </p>



<p class="has-medium-font-size">मनी लांड्रिंग और विवादित व्यवसायी दीपक भट्ट से व्यवसायिक साझेदारी, संपत्ति अर्जन जैसे और भी आरोपों के खुलासे के बाद सुडान गुरूंग के खिलाफ विरोध और प्रदर्शन तेज हो गया था। </p>



<p class="has-vivid-red-color has-text-color has-link-color has-medium-font-size wp-elements-723ebac3ac2ebfcce1541363d8994868"><strong><em>उनके खिलाफ काठमांडू के नकसाल थाने में प्राथमिकी दर्ज कर गिरफ्तारी की मांग जोर पकड़ रही थी। सुडान गुरूंग ने हालांकि अपने शोसल मीडिया प्लेटफॉर्म पर स्तीफा न देने की बात कही थी लेकिन अचानक उन्होंने बुधवार को प्रधानमंत्री बालेन शाह को अपना स्तीफा सौंप दिया। नेपाल में 26 दिन के भीतर यह दूसरे मंत्री का स्तीफा है। </em></strong></p>



<p class="has-medium-font-size">कुछ दिन पूर्व जब श्रम मंत्री दीपक कुमार साह का स्तीफा हुआ था तब बालेन शाह की खूब वाहवाही हुई थी। दीपक कुमार साह पर अपनी पत्नी को स्वास्थ्य बोर्ड में सदस्य के पद पर स्थापित करने का आरोप था।</p>



<p class="has-medium-font-size">दीपक साह धोखाधड़ी के मामले में जेल भी जा चुके हैं। दीपक साह से स्तीफा लेने पर बालेन सरकार के स्वच्छ छवि के कसीदे पढ़े गए थे वहीं सुडान गुरूंग के स्तीफे को एक ऐसे मंत्री का स्तीफा माना जा रहा है जिसने सिर्फ ईमानदार होने का मुखौटा लगा रखा था।</p>



<p class="has-medium-font-size">सुडान गुरूंग की छवि जेन जी आंदोलन के जरिए ओली सरकार को अपदस्थ करने वाले नायक की उभरी थी। ओली सरकार पर भ्रष्टाचार के अनगिनत आरोप थे।</p>



<p class="has-vivid-red-color has-text-color has-link-color has-medium-font-size wp-elements-ce786ae1575614df7c9a5d0b86a32286"><strong><em> ओली ही क्यों, राजशाही खत्म होने के बाद नेपाल में जितनी भी सरकारें आईं उन सबसे जनता ऊब चुकी थी। जेन जी आंदोलन में ओली तो सेना के कैंप में भागकर मार पिटाई से बच गए थे, जबकि लगभग सभी पार्टियों के शीर्ष नेता, पूर्व प्रधानमंत्री,उनकी पत्नियां जेन जी के गुस्से का शिकार हुई थीं। </em></strong></p>



<p class="has-medium-font-size">जनता चूंकि उन सभी सरकारों से ऊबी हुई थी इसलिए ऐसे नेताओं के साथ हुए बर्बर व्यवहार से खुश थी। इस हिंसक आंदोलन में 76 युवाओं की जान गई थी और काठमांडू में महत्वपूर्ण सरकारी इमारतें,माल और हिल्टन जैसे अरबों रुपए के होटल आग के हवाले हो गए थे। बहरहाल राजनीतिक अफरातफरी के बीच उच्च न्यायालय की पूर्व जज सुशीला कार्की के नेतृत्व में अंतरिम सरकार का गठन हुआ। इस सरकार ने छः महीने के अंदर चुनाव कराकर चुनी हुई सरकार को सत्ता सौंप देने का वादा किया। अंतरिम सरकार के गठन और प्रधानमंत्री के चयन में भी सुडान गुरूंग की भूमिका खास थी।</p>



<p class="has-medium-font-size">छः महीने बाद जब चुनाव की तारीख नजदीक आई तो राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के रूप में एक मजबूत और युवाओं की पार्टी ने अपना विस्तार करना शुरू किया। इस पार्टी के अध्यक्ष पूर्व पत्रकार रवि लामी छाने हैं जिन्होंने पांच साल पहले इस पार्टी का गठन किया था।</p>



<p class="has-medium-font-size">वे पिछले चुनाव में पूर्वी नेपाल में पहली मर्तबा चुनाव लड़े और बीस सांसदों के साथ नेपाल प्रतिनिधि सभा में धमाके दार इंट्री की और ओली सरकार में उप प्रधानमंत्री के साथ गृहमंत्री भी बनें लेकिन अमेरिकी नागरिकता विवाद के चलते उन्हें उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप से मंत्री और प्रतिनिधि सभा से स्तीफा देना पड़ा।</p>



<p class="has-medium-font-size"> हालांकि बाद में इस विवाद के हल हो जाने पर वे फिर जीतकर प्रतिनिधि सभा में लौटे लेकिन मंत्री अथवा अन्य किसी सरकारी पद से दूर रहें। बतौर गृह मंत्री रवि लामी छाने की छवि काफी सख्त थी। </p>



<p class="has-medium-font-size">पहली मर्तबा उन्होंने ब्यूरोक्रेट्स और राजनीतिक भ्रष्टाचार पर प्रहार किया था। रवि लामी छाने के इस तेवर से खुद ओली सरकार हिल गई थी साथ ही अन्य राजनीतिक दलों के बड़े नेता भी कांप उठे थे क्योंकि सबके हाथ भ्रष्टाचार में सने हुए हैं। हालांकि रवि लामी छाने स्वयं एक बड़े घोटाले में न्यायालय का सामना कर रहे हैं।<br></p>



<p class="has-medium-font-size">नेपाल की राजनीति में रवि लामी छाने और उनकी पार्टी की छवि अन्य पार्टियों की अपेक्षा स्वच्छ थी।यही वजह रही कि काठमांडू के मेयर रहे बालेन शाह,हामी नेपाल सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के संचालक रहे सुडान गुरूंग और तमाम दूसरे पार्टियों के नेता बड़ी तेजी से इस पार्टी में शामिल हुए।</p>



<p class="has-medium-font-size"> रवि लामी छाने ने बालेन शाह को प्रधानमंत्री का चेहरा तय कर दिया। जनता चूंकि परिवर्तन के मूड में थी ही लिहाजा चुनाव हुआ तो पहाड़ से मैदान तक राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को एक तरफा जीत मिली। किसी एक पार्टी की ऐसी प्रचंड जीत पूर्व में किसी पार्टी को मिली हो, ऐसा कोई उदाहरण फिलहाल नेपाल की राजनीतिक इतिहास में नहीं है।</p>



<p class="has-medium-font-size">नेपाली जनता को इस युवा सरकार से बहुत उम्मीदें थीं। शपथ ग्रहण के बाद हर रोज सरकार के चकित करने वाले एक से एक फरमान से जनता उत्साहित थी और उसे परिवर्तन की अनुभूति की आश थी। गृहमंत्री पद पर रहते हुए सुडान गुरूंग ने पूर्व पीएम ओली और पूर्व गृहमंत्री रमेश लेखक को गिरफ्तार करने का आदेश देकर सुर्खियां बटोरी तो थी लेकिन अपनी ही पार्टी के अंदर खाने उनकी आलोचना भी होने लगी थी। उनका अन्य मंत्रालयों में दखल भी मंत्रियों को असहज कर रहा था।<br></p>



<p class="has-medium-font-size">मधेश के लोगों को बालेन शाह से कुछ अधिक उम्मीद थी क्योंकि उन्हें भ्रम था कि पहली मर्तबा नेपाल में मधेश का प्रधानमंत्री हुआ है। मधेशियों को मधेश की समस्याएं भी हल होने की उम्मीद कुछ अधिक थी।</p>



<p class="has-medium-font-size">जबकि सच यह है कि बालेन शाह के माता-पिता जरूर मधेश के थे लेकिन उनका जन्म और पालन पोषण काठमांडू में हुआ था और पढ़ाई लिखाई भारत में। राजशाही के जमाने में मधेश से दो प्रधानमंत्री हुए हैं। एक टंक बहादुर आचार्य और दूसरे तुलसी गिरी।<br></p>



<p class="has-medium-font-size">बालेन शाह के रूप में मधेशी प्रधानमंत्री की खुशी में फूले नहीं समा रहे मधेशियों को पहला झटका उनके चहेते प्रधानमंत्री से ही मिला। बालेन सरकार ने भारत सीमा से सटे भारतीय बाजारों से नेपाली नागरिकों के असीमित खरीददारी पर रोक लगा दिया है। भारतीय सीमा के बाजार नेपाल के मधेश से ही सटे हुए हैं।</p>



<p class="has-medium-font-size"> ये बाजार नेपाल के मधेश क्षेत्र के गरीब और मध्यमवर्गीय लोगों के लिए जीवन रेखा है। इन बाजारों से ये लोग रोजमर्रा के सामान,सूती कपड़े, चीनी आदि खरीदते थे। दोनों ओर से इन्हें कोई रोकता टोकता नहीं था। बालेन सरकार ने भारतीय बाजारों से नेपाली नागरिकों की खरीदारी पर अंकुश लगा दिया है।</p>



<p class="has-medium-font-size"> अब वे सौ रुपए से अधिक के सामान की खरीदारी किए तो उन्हें नेपाल सरकार को सीमा शुल्क अदा करना होगा। इसके पीछे बालेन सरकार की मंशा नेपाली बाजारों को सुदृढ़ करने की हो सकती है लेकिन जब यहां बाजार का रुख दो तरफा है तो इससे नेपाल के सीमावर्ती बाजारों को नुकशान कहां था? बालेन सरकार के इस फैसले से दोनों देशों के बीच सदियों पुराना रोटी बेटी के रिश्ते पर भी असर पड़ सकता है।</p>



<p class="has-medium-font-size">बालेन सरकार के इस फैसले से मधेश क्षेत्र में सरकार के खिलाफ गुस्सा बढ़ रहा है। इस गुस्से को नेपाली कांग्रेस भुनाने के प्रयास के तहत बालेन सरकार की न केवल निंदा की है,खत लिखकर अपने इस फैसले पर पुनर्विचार की अपील भी की है। </p>



<p class="has-medium-font-size">बालेन सरकार के और भी कुछ फैसले सामने आए हैं जिससे आम जनता का कोई सरोकार नहीं है लेकिन उससे सरकार की सख्त मिजाजी का संदेश जरूर जाता है। बालेन सरकार के अबतक के क्रियाकलापों का मूल्यांकन का वक्त आ ही रहा था कि इस सरकार के दूसरे नंबर के सख्त मिजाज गृहमंत्री का भांडा फूट गया।</p>



<p class="has-medium-font-size">गृहमंत्री सुडान गुरूंग के खिलाफ जेन जी का ही एक धड़ा मोर्चा खोल दिया है। इस घटना से बालेन सरकार का असहज होना स्वाभाविक है।</p>



<p class="has-medium-font-size">समझा जाता है कि यह धड़ा बालेन सरकार के छात्र संगठनों और उनकी सक्रिय राजनीति पर प्रतिबंध लगाने के फैसले से नाराज़ हैं।</p>



<p class="has-medium-font-size"> &#8220;जेन जी मूवमेंट&#8221; नेपाल नामक इस युवा संगठन का मानना है कि नेपाल में आज जो युवा नेतृत्व की सरकार सत्ता सीन हुई है वह युवा और छात्र राजनीति की ही देन है। चुनाव में सत्ता परिवर्तन का माहौल छात्र संगठन और युवा राजनीति ही बनाता है।</p>



<p>बालेन सरकार के इस फैसले से नाराज़ युवाओं का यह संगठन बालेन सरकार के खिलाफ मुखर हो रहा है।<br>सुडान गुरूंग के खिलाफ राजधानी के संवेदनशील क्षेत्र सिंह दरबार में प्रधानमंत्री एवं मंत्रिपरिषद कार्यालय के बाहर सुडान गुरुंग के इस्तीफे की मांग को लेकर जोरदार प्रदर्शन भी हुआ था।</p>



<p class="has-medium-font-size">“गृहमंत्री इस्तीफा दो” की गूंज से नेपाल का राजनीतिक माहौल गरमा गया था। नतीजा कल तक जो गृहमंत्री स्तीफा न देने की बात कर रहे थे उन्हें मजबूर होकर प्रधानमंत्री को स्तीफा सौंपना पड़ा। सुडान गुरूंग का स्तीफा होते ही राष्ट्रपति राम चंद्र पौडेल ने गृहमंत्री का पद प्रधानमंत्री बालेन शाह के हवाले कर दिया। मामला गृहमंत्री के स्तीफे तक ही सीमित नहीं है।</p>



<p class="has-medium-font-size"><br>जेन-ज़ी मूवमेंट, नेपाल” ने गृहमंत्री सुडान गुरुंग के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग करते हुए पुलिस मुख्यालय, नक्साल में औपचारिक रूप से शिकायत भी दर्ज कराई है।</p>



<p class="has-medium-font-size"> संगठन के प्रवक्ता विजय शाह ने अपने बयान में कहा कि सुडान गुरूंग पर लगे गंभीर आरोपों ने जनता के विश्वास को गहराई से प्रभावित किया है। “जेन-ज़ी मूवमेंट, नेपाल” ने गृहमंत्री पद पर रहते हुए सुडान गुरूंग पर राजनीतिक उद्देश्यों के लिए आंदोलनों के दुरुपयोग, आर्थिक लाभ प्राप्त करने और कथित अवैध गतिविधियों में संलिप्त होने जैसे आरोप भी लगाए हैं। बयान में यह भी कहा गया कि हालिया आंदोलन के दौरान हुए नुकसान और शहीदों के अपमान ने जनता की भावनाओं को गहराई से आहत किया है।<br></p>



<p class="has-medium-font-size">संगठन ने अपनी मांगों में स्पष्ट रूप से कहा है कि उन्हें गिरफ्तार कर निष्पक्ष और पारदर्शी जांच शुरू की जाए, और जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाए। सुडान गुरूंग के खिलाफ उठे आवाज से नेपाल सरकार अंतर्विरोधों के चक्रव्यूह में फंस गई है। </p>



<p class="has-medium-font-size">जिस तरह नेपाल की राजनीति में नया मोड़ आ रहा है उससे एक बात साफ है कि नेपाली जनता फिलहाल जहां की तहां है। अच्छे दिन की आश में उसने आंदोलन से उपजे युवा नेतृत्व पर भरोसा किया था लेकिन अब वे निराश और नाउम्मीद हो रहे हैं।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>तैंतीस प्रतिशत आरक्षण महिलाओं के लिए अभी भी एक सुनहरा स्वप्न</title>
		<link>https://www.jubileepost.in/33-reservation-for-women-still-a-golden-dream/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Supriya Singh]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 18 Apr 2026 11:20:32 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[ओपिनियन]]></category>
		<category><![CDATA[मोदी सरकार]]></category>
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					<description><![CDATA[कृष्णमोहन झा/ मोदी सरकार लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित करने के उद्देश्य से जो तीन विधेयक गत दिवस संसद में पेश किए थे उनमें संविधान संशोधन विधेयक को दो तिहाई बहुमत से पारित कराने में वह असफल रही। इसके बाद उसने परिसीमन और केंद्र शासित कानून संशोधन विधेयक भी &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p><br><strong>कृष्णमोहन झा/<br></strong></p>



<p class="has-medium-font-size">मोदी सरकार लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित करने के उद्देश्य से जो तीन विधेयक गत दिवस संसद में पेश किए थे उनमें संविधान संशोधन विधेयक को दो तिहाई बहुमत से पारित कराने में वह असफल रही। इसके बाद उसने परिसीमन और केंद्र शासित कानून संशोधन विधेयक भी वापिस ले लिए। यह कतई आश्चर्य का विषय नहीं है। दरअसल संविधान संशोधन विधेयक पारित न होने के बाद शेष दो विधेयकों पर मतदान का कोई औचित्य ही नहीं था क्योंकि ये दोनों विधेयक संविधान संशोधन विधेयक से ही जुड़े हुए थे। यद्यपि वर्तमान सदन में एनडीए के संख्या बल को देखते हुए मोदी सरकार को यह भलीभाँति मालूम था कि इस संविधान संशोधन विधेयक का यही हश्र होना तय है।</p>



<p class="has-medium-font-size"> फिर भी प्रधानमंत्री मोदी ने विपक्षी सदस्यों से अंतरात्मा की आवाज पर वोट करने की अपील करके विपक्ष की एकजुटता में सेंध लगाने की आखिरी कोशिश की थी परंतु विपक्ष टस से मस नहीं हुआ।सदन में 21 घंटे चली बहस के दौरान विपक्ष की ओर से यह तर्क दिया गया था कि सदन की वर्तमान सदस्य संख्या के आधार पर ही महिलाओं के लिए दो तिहाई आरक्षण सुनिश्चित करने के लिए सरकार तैयार हो जाए तो विपक्ष भी इसका समर्थन करने के लिए तैयार है परंतु सरकार को यह मंजूर नहीं था। दरअसल उसने जब 33 प्रतिशत आरक्षण को परिसीमन की शर्त से जोड दिया था तभी यह तय हो गया था कि यह ऐतिहासिक संविधान संशोधन विधेयक वर्तमान सदन में दो तिहाई बहुमत से पारित होना संभव नहीं है।</p>



<p class="has-medium-font-size"> सवाल यह उठता है कि सरकार लोकसभा की वर्तमान सदस्य संख्या की 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने के लिए तैयार क्यों नहीं हो रही है। राजनीतिक पंडितों के अनुसार इस सवाल का जवाब यह है कि वर्तमान लोकसभा की 543 सीटों में से अभी मात्र 74 सीटें महिलाओं के पास है जो 33 प्रतिशत से करीब 100 कम है ं। सरकार को डर है कि अगर लोकसभा की वर्तमान सदस्य संख्या की 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित कर दी जाती हैं तो बहुत से पुरुष सांसदों को अपनी सीटें छोड़ने के विवश करना पडेगा जो उनमें असंतोष पैदा कर सकता है इसलिए वह परिसीमन के माध्यम से लोकसभा की सदस्य संख्या 850 तक बढाकर उसकी 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करना चाहती है इसके लिए विपक्ष और विशेष रूप से दक्षिण के राज्य तैयार नहीं हैं जिन्हें परिसीमन से लोक सभा में अपना प्रतिनिधित्व कम होने की आशंका सता रही है।<br></p>



<p class="has-medium-font-size">बहरहाल, यह संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में आवश्यक बहुमत से पारित न होने के बाद सरकार और विपक्ष के बीच पुन: आरोप प्रत्यारोप का सिलसिला शुरू हो गया है। सरकार की ओर से विपक्ष पर महिला विरोधी होने का आरोप लगाया जा रहा है तो विपक्ष इसे राजनीतिक लाभ की मंशा से प्रेरित कदम बता कर इसे संविधान विरोधी बता रहा है। विपक्ष का सीधा आरोप है कि मोदी सरकार ने तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल विधानसभाओं के चुनाव में राजनीतिक लाभ लेने की मंशा से संसद का विशेष सत्र बुलाकर उसमें ये विधेयक पेश किए ताकि इन राज्यों के भाजपा विरोधी दलों के सांसदों को चुनाव प्रचार छोड़ कर तीन दिन दिल्ली में रहना पडे और इससे उन दलों की जीत की संभावनाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पडे।</p>



<p class="has-medium-font-size"> जाहिर सी बात है कि यह लड़ाई अब संसद से बाहर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु विधानसभाओं के चुनाव मैदान में भी देखने को मिलेगी। इन राज्यों की विधानसभाओं के लिए 23 और 29 अप्रैल को मतदान होना है। मोदी सरकार ने संसद का विशेष सत्र बुलाकर इन मुद्दे पर चर्चा इसीलिए करवाई ताकि वह उक्त दो राज्यों की महिला मतदाताओं को यह संदेश दे सके कि भाजपा और केंद्र सरकार उनकी सबसे बड़ी हितैषी है। इन दो राज्यों में चुनाव प्रचार की जो अवधि शेष है उनमें भाजपा और मोदी सरकार संविधान संशोधन विधेयक के विरोध को मुद्दा बना कर महिला मतदाताओं की सहानुभूति अर्जित करने का हर संभव प्रयास करेगी। इन राज्यों में सत्तारूढ़ दल इस मामले में अपना पक्ष किस तरह प्रस्तुत करते हैं यह उत्सुकता का विषय है लेकिन कुल मिलाकर यह तो निश्चित रूप से खेद का विषय है कि महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण अभी तो एक सुनहरा स्वप्न बनकर रह गया है।</p>



<p><strong>(लेखक राजनैतिक विश्लेषक है)</strong></p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>व्यंग्य : प्रिय शिक्षा को पत्र, कहां गुम हो तुम</title>
		<link>https://www.jubileepost.in/satire-letter-to-dear-education-where-are-you-lost/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Syed Mohammad Abbas]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 15 Apr 2026 14:14:11 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Main Slider]]></category>
		<category><![CDATA[ओपिनियन]]></category>
		<category><![CDATA[जुबिली डिबेट]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://www.jubileepost.in/?p=339966</guid>

					<description><![CDATA[प्रोफेसर अशोक कुमार प्रिय शिक्षा आज सुबह जब मैंने अखबार खोला, तो लगा कि शायद किसी बड़े अपराधी या किसी खोए हुए मासूम की तलाश के लिए इश्तहार होगा। लेकिन गौर से देखा तो पाया कि दरअसल वह तो &#8216;उच्च शिक्षा&#8217; का हुलिया था। शिक्षा, जो कभी मंदिरों और गुरुकुलों की पवित्रता से निकलकर हमारे &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="has-medium-font-size"><img decoding="async" width="140" height="140" class="wp-image-321691" style="width: 140px;" src="https://www.jubileepost.in/wp-content/uploads/2025/06/ashok-kumar-150x150-1.png" alt=""></p>



<p class="has-medium-font-size"><mark style="background-color:rgba(0, 0, 0, 0)" class="has-inline-color has-vivid-red-color"><strong>प्रोफेसर अशोक कुमार</strong></mark></p>



<p></p>



<p class="has-medium-font-size">प्रिय शिक्षा</p>



<p class="has-medium-font-size">आज सुबह जब मैंने अखबार खोला, तो लगा कि शायद किसी बड़े अपराधी या किसी खोए हुए मासूम की तलाश के लिए इश्तहार होगा।</p>



<p class="has-medium-font-size">लेकिन गौर से देखा तो पाया कि दरअसल वह तो &#8216;उच्च शिक्षा&#8217; का हुलिया था। </p>



<p class="has-medium-font-size">शिक्षा, जो कभी मंदिरों और गुरुकुलों की पवित्रता से निकलकर हमारे सरकारी महाविद्यालयों के गलियारों में गूँजती थी, आज वह किसी &#8216;वॉन्टेड&#8217; अपराधी की तरह लापता है।</p>



<p class="has-medium-font-size">प्रिय शिक्षा, तुम्हारा नया &#8216;पता&#8217; क्या है?  सुना है अब तुम साधारण डाक से नहीं मिलतीं, बल्कि &#8216;रजिस्टर्ड कॉरपोरेट कूरियर&#8217; बन गई हो।</p>



<p class="has-medium-font-size"> तुम्हारा नया स्थायी पता अब सरकारी महाविद्यालयों के वे टूटे हुए बेंच नहीं, बल्कि उन निजी विश्वविद्यालयों के शीशमहल हैं, जहाँ घुसते ही इंसान को अपने ज्ञान से ज्यादा अपनी जेब की गहराई का अहसास होता है। वहाँ तुम वातानुकूलित कमरों में बड़े करीने से सजाकर रखी गई हो। </p>



<p class="has-medium-font-size">लेकिन डर यह है कि कहीं तुम वहाँ केवल एक &#8216;डेकोरेटिव पीस&#8217; तो नहीं बन गई?या फिर तुम उन कोचिंग संस्थानों की तंग और अंधेरी गलियों में कैद हो गई हो? जहाँ तुम्हें &#8216;सफलता&#8217; के छोटे-छोटे पैकेटों में बंद किया जाता है और भारी किस्तों पर नीलाम किया जाता है। वहाँ तुम्हें पाने के लिए &#8216;जिज्ञासा&#8217; की नहीं, बल्कि &#8216;बैंक बैलेंस&#8217; की जरूरत होती है। तुमने अपना सरकारी चोला कब उतारकर यह &#8216;महंगा कॉरपोरेट सूट&#8217; पहन लिया, हमें पता ही नहीं चला।सरकारी महाविद्यालयों के बरामदे आज भी तुम्हें पुकारते हैं, लेकिन वहाँ तुम्हारी आहट कम और मकड़ियों के जाले ज्यादा मिलते हैं। </p>



<p class="has-medium-font-size">उन कमरों में जहाँ कभी तर्क-वितर्क की धारा बहती थी, आज सिर्फ पुरानी फाइलों पर जमी धूल और व्यवस्था की लाचारी का साम्राज्य है।</p>



<p class="has-medium-font-size">शिक्षण संस्थानों का दृश्य अब किसी भूतिया फिल्म के सेट जैसा हो गया है: </p>



<p class="has-medium-font-size"> उन्हें अच्छी तरह पता है कि कक्षाओं में तुम नहीं, बल्कि मकड़ियाँ उनका स्वागत करेंगी। उनके लिए शिक्षा अब एक &#8216;ज्ञानार्जन&#8217; की प्रक्रिया नहीं, बल्कि सिर्फ एक कागज़ का टुकड़ा यानी &#8216;डिग्री&#8217; पाने का जरिया है। </p>



<p class="has-medium-font-size">1. छात्रों का वनवास: महाविद्यालयों में छात्र अब &#8216;पढ़ने&#8217; नहीं आते, बल्कि वे एक &#8216;अदृश्य उपस्थिति&#8217; का हिस्सा हैं। वे आते हैं सिर्फ परीक्षा फॉर्म भरने, छात्रवृत्ति का जुगाड़ करने या फिर राजनीति के अखाड़े में हाथ आज़माने।</p>



<p class="has-medium-font-size">2. शिक्षकों का अकाल और &#8216;फाइल-पूजा&#8217;: हमने &#8216;गुरु बिन भवन सूना&#8217; की कहावत को बड़ी शिद्दत से सच कर दिखाया है। सालों से नियुक्तियाँ &#8216;प्रक्रिया&#8217; के नाम पर फाइलों में दफन हैं। जो इक्का-दुक्का बचे-खुचे शिक्षक हैं, उन्हें हमने इतना &#8216;बहुमुखी&#8217; बना दिया है कि वे पढ़ाने के अलावा सब कुछ कर रहे हैं—चाहे वह जनगणना हो, चुनाव ड्यूटी हो या फिर &#8216;स्मार्ट क्लास&#8217; के नाम पर कागज़ी घोड़े दौड़ाना। बेचारे शिक्षक तुम्हें किताबों में नहीं, बल्कि एम.आईएस. पोर्टल के पासवर्ड में ढूँढ रहे हैं।</p>



<p class="has-medium-font-size"> 3. स्टेकहोल्डर्स की कुंभकर्णी नींद: कुलपति से लेकर नीति-निर्माताओं तक, जो तुम्हारे रक्षक और संवर्धक होने चाहिए थे, वे अब &#8216;मैनेजर&#8217; की भूमिका में अधिक सहज हैं। वे &#8216;स्मार्ट क्लास&#8217; के ऑडिट सिस्टम और रैंकिंग के आंकड़ों में इतने उलझ गए हैं कि उन्हें यह भी याद नहीं रहा कि शिक्षा इंसानों के लिए होती है, एक्सेल शीट्स के लिए नहीं। उनकी चुप्पी साजिशन नहीं, बल्कि सुविधापूर्ण है। आखिर सिस्टम को सुलाने में ही तो शांति है!</p>



<p class="has-medium-font-size">प्रिय शिक्षा, क्या तुम्हें याद है जब तुम &#8216;प्रकाश&#8217; हुआ करती थी? आज तुम एक &#8216;उत्पाद&#8217; बन गई हो। बाज़ार ने तुम्हें इतनी खूबसूरती से &#8216;पैकेज&#8217; किया है कि तुम्हारी आत्मा कहीं खो गई है।</p>



<blockquote class="wp-block-quote is-layout-flow wp-block-quote-is-layout-flow">
<p class="has-medium-font-size"> <strong><mark style="background-color:rgba(0, 0, 0, 0)" class="has-inline-color has-vivid-red-color">इस &#8216;शिक्षा प्रदूषण&#8217; ने हमारे बौद्धिक वातावरण को इतना ज़हरीला बना दिया है कि अब यहाँ &#8216;मेधा&#8217; नहीं, बल्कि &#8216;मैनेजमेंट&#8217; जीतता है।निजी संस्थानों की ऊँची इमारतें और चमकते हुए विज्ञापन शायद तुम्हारी शान को बढ़ाते होंगे, लेकिन उन सरकारी स्कूलों की टपकती छतों और खाली ब्लैकबोर्ड्स का क्या, जहाँ देश का भविष्य आज भी तुम्हें फटे हुए बस्ते में ढूँढ रहा है?</mark></strong></p>
</blockquote>



<p class="has-medium-font-size"> क्या तुमने अपनी पहुँच केवल उन तक सीमित कर ली है जिनके पास &#8216;प्रवेश शुल्क&#8217; के साथ &#8216;सुविधा शुल्क&#8217; देने की सामर्थ्य है?यह एक व्यंग्य नहीं, बल्कि उन हज़ारों आँखों की पुकार है जो आज भी सरकारी कॉलेजों की देहरी पर खड़ी होकर तुम्हारा इंतज़ार कर रही हैं। </p>



<p class="has-medium-font-size">वे गरीब छात्र, जो बड़े-बड़े कोचिंगों की &#8216;ईएमआई&#8217; नहीं चुका सकते, उन्हें आज भी तुम्हारी जरूरत है।प्रिय शिक्षा, इन &#8216;स्टेकहोल्डर्स&#8217; के मौन को अपनी सक्रियता से तोड़ दो। फाइलों की धूल झाड़ो और फिर से उन कक्षाओं में वापस आओ जहाँ तुम्हारी सबसे ज्यादा जरूरत है। इससे पहले कि तुम पूरी तरह से एक &#8216;ब्रांड&#8217; बन जाओ और आम आदमी की पहुँच से बाहर हो जाओ, वापस एक &#8216;संस्कार&#8217; और &#8216;शक्ति&#8217; बनकर लौट आओ।</p>



<p class="has-medium-font-size">तुम्हारी प्रतीक्षा में, आज भी वह पुराना ब्लैकबोर्ड खड़ा है जिसे वर्षों से किसी &#8216;चाक&#8217; ने नहीं छुआ और वह छात्र खड़ा है जिसकी आँखों में अब भी उम्मीद का एक दीया जल रहा है। आ जाओ, कि तुम्हें ढूँढते-ढूँढते हमारी एक पूरी पीढ़ी &#8216;डिग्रीधारी अनपढ़&#8217; न बन जाए।</p>



<p>(लेखक कानपुर एवं गोरखपुर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति एवं प्रख्यात शिक्षाविद हैं)</p>



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