आया राम गया राम: विजाग स्टील में नेतृत्व का संकट

विवेक अवस्थी

सरकारी नियंत्रण वाली रायफल्स इंडियन नेशनल लौह और इस्पात लिमिटेड (RINL — विजाग स्टील) में हालिया नेतृत्व संकट और बार-बार पदस्थापना/तैनाती की घटनाओं ने “आया राम, गया राम” जैसी राजनीतिक शब्दावली को स्टील उद्योग के उच्चतम स्तर पर पुनर्जीवित कर दिया है।

प्रबंधन में इस प्रकार के उतार-चढ़ाव ने न केवल संगठनात्मक स्थिरता पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि तकनीकी परिचालन, कर्मचारी मनोबल और दीर्घकालीन रणनीतिक फैसलों पर भी असर डाला है।

RINL, जो विशाखापट्टनम में स्थापित एक प्रमुख स्टील निर्माता है और जिसे अक्सर रक्षा तथा अवसंरचना परियोजनाओं के लिए आवश्यक स्टील की आपूर्ति में अहम माना जाता है, पिछले कुछ वर्षों से नेतृत्व परिवर्तन के चक्र में फंसा हुआ दिख रहा है।

ऐसे समय में जब वैश्विक कच्चे माल की कीमतें, आपूर्ति शृंखलाओं की अस्थिरता और घरेलू मांग में विविधता जैसी चुनौतियाँ तेज हैं, किसी भी सार्वजनिक उपक्रम के लिए नेतृत्व का स्थिर होना निहायत आवश्यक है। लेकिन विजाग स्टील में लगातार अधिकारियों के स्थानांतरण और शीर्ष स्तर पर अस्थायी नियुक्तियों ने निर्णय लेने की गति और नीति-निरंतरता को प्रभावित किया है।

इस संकट की जड़ें कई प्रकार से देखी जा सकती हैं। एक ओर, मंत्रालयिक हस्तक्षेप और राजनीतिक तटस्थता की कमी ने प्रबंधन की बदहाली का मार्ग प्रशस्त किया है; दूसरी ओर, नियोजन और उत्तराधिकार की स्पष्ट नीतियों का अभाव भी इसका कारण रहा है।

विशेषज्ञ बताते हैं कि सार्वजनिक उपक्रमों में पदस्थापना‑संबंधी पारदर्शिता और दीर्घकालिक नियुक्ति-रूपरेखा न होने पर कोई भी संस्था कमजोर पड़ती है और परियोजनाएँ बीच में अटकीं रह जाती हैं, तकनीकी नवाचार रुकते हैं और कुशल कर्मियों के बीच असंतोष बढ़ता है।

यही संकट विजाग स्टील के संचालन पर भी दिखाई दे रहा है । परिचालन दक्षता के सूचकांक में गिरावट, बड़े पूंजीगत परियोजनाओं की देरी और अनुबंधों की समयसीमा में बदलाव साफ साफ दिख रहे हैं।

इस्पात मंत्रालय की भूमिका इस परिदृश्य में निर्णायक है। एक सक्रिय, समन्वित और पारदर्शी नियुक्ति नीति अपनाकर मंत्रालय RINL में स्थिरता लौटा सकता है।

इसके अतिरिक्त, आरआईएनएल को आंतरिक उत्तराधिकार योजना और ज्ञान प्रबन्धन तंत्र सुदृढ़ करना चाहिए ताकि जब भी किसी शिखर पदाधिकार में बदलाव आए, कार्यावली बाधित न हो। तकनीकी परियोजनाओं के लिए बहु-वर्षीय योजनाएँ और अनुबंधों में लचीलापन रखा जाना चाहिए ताकि अनपेक्षित नेतृत्व परिवर्तनों का प्रभाव कम से कम रहे।

अंततः, “आया राम, गया राम” जैसी मानसिकता सार्वजनिक उपक्रमों की कार्यक्षमता के साथ खिलवाड़ करती है। विजाग स्टील जैसा संस्थान राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और रणनीतिक जरूरतों के लिहाज़ से संवेदनशील है; इसलिए उसका संचालन राजनीति और प्रशासनिक अस्थिरता से ऊपर उठकर, दीर्घकालिक व्यावसायिक दायित्वों के अनुरूप होना चाहिए।

इस्पात मंत्रालय के पास अभी भी अवसर है कि वह त्वरित, पारदर्शी और स्थायी सुधार लागू करके RINL को फिर से निर्णायक और भरोसेमंद स्थिति में ला सके-वरना लगातार नियुक्ति‑उलटफेर का खमियाजा केवल कंपनी नहीं, देश की आधारभूत क्षमताएँ भी भुगतेंगी।

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